कर्नाटक

महंगाई की मार, सूखे से चावल की कीमतों में भारी उछाल, 30 रुपये किलो तक बढ़े दाम

Kavita2
8 Oct 2026 11:02 AM IST
महंगाई की मार, सूखे से चावल की कीमतों में भारी उछाल, 30 रुपये किलो तक बढ़े दाम
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बेंगलुरु। कर्नाटक में लगातार कम बारिश और गंभीर सूखे का असर अब आम लोगों की रसोई तक पहुंचने लगा है। राज्य में मॉनसून की बारिश में भारी कमी और जलाशयों का जलस्तर घटने से धान की खेती प्रभावित हुई है। इसका सीधा असर चावल की कीमतों पर दिखाई दे रहा है। पिछले तीन महीनों के दौरान चावल की प्रमुख किस्मों की कीमतों में 25 से 30 रुपये प्रति किलोग्राम तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। चावल उत्पादक प्रमुख राज्यों में शामिल कर्नाटक में इस वर्ष धान के उत्पादन में गिरावट की आशंका जताई जा रही है। व्यापारियों और कृषि क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि नवंबर में नई फसल की कटाई शुरू होने के बावजूद आने वाले महीनों में चावल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

तीन महीने में 30 रुपये किलो तक महंगा हुआ चावल

कर्नाटक में चावल की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। बाजार में प्रमुख किस्मों के दाम पिछले तीन महीनों के मुकाबले काफी अधिक हो गए हैं। इससे घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।

व्यापारियों के अनुसार, सोना मसूरी चावल की थोक कीमत पहले लगभग 50 रुपये प्रति किलोग्राम थी, जो अब बढ़कर 75 से 80 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है।

इसी तरह कोलम चावल की कीमत पहले लगभग 75 रुपये प्रति किलोग्राम थी, लेकिन अब यह करीब 100 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच रही है।

कृषि उपज बाजार समिति के सलाहकार रमेश चंद्र लाहोटी के अनुसार, चावल की औसत कीमत में 25 से 30 रुपये प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी हुई है।

आने वाले दिनों में 10 रुपये और बढ़ सकते हैं दाम

चावल कारोबारियों का अनुमान है कि आने वाले एक से डेढ़ महीने में कीमतें और बढ़ सकती हैं।

रमेश चंद्र लाहोटी ने आशंका जताई है कि बाजार की मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए अगले चार से छह सप्ताह में चावल के दाम लगभग 10 रुपये प्रति किलोग्राम और बढ़ सकते हैं।

हालांकि, यह व्यापारियों का अनुमान है। वास्तविक कीमतें बाजार में उपलब्ध स्टॉक, नई फसल की आवक और मांग पर निर्भर करेंगी।

व्यापारियों का कहना है कि धान की कम बुवाई के कारण आने वाले समय में नई फसल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

चार लाख हेक्टेयर से ज्यादा घटा धान का रकबा

कर्नाटक देश के प्रमुख चावल उत्पादक राज्यों में शामिल है। राज्य में सामान्य तौर पर लगभग 13 लाख हेक्टेयर भूमि पर धान की खेती की जाती है।

लेकिन इस साल गंभीर सूखे के कारण धान की खेती का रकबा चार लाख हेक्टेयर से अधिक घट गया है।

कावेरी और तुंगभद्रा नदी बेसिन में पानी की कमी के कारण कई किसानों ने धान की बुवाई नहीं की।

जून में बुवाई कम होने का असर नवंबर से शुरू होने वाली कटाई के समय सामने आने की आशंका है।

कृषि क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि खेती का रकबा घटने से इस वर्ष धान उत्पादन में कमी हो सकती है।

रायचूर और बेल्लारी में किसानों की परेशानी बढ़ी

राज्य के रायचूर और बेल्लारी जिलों में सूखे का गंभीर असर देखने को मिल रहा है।

स्थानीय किसानों के अनुसार, सामान्य वर्षों में उन्हें धान की दो फसलें मिल जाती थीं। पहली फसल की कटाई अप्रैल-मई में और दूसरी फसल की कटाई अक्टूबर-नवंबर में होती थी।

लेकिन इस वर्ष पानी की कमी इतनी गंभीर रही कि कुछ किसानों ने एक भी फसल की बुवाई नहीं की।

किसानों का कहना है कि आमतौर पर दक्षिण-पश्चिम मॉनसून कमजोर रहने पर उत्तर-पूर्वी मॉनसून से कुछ राहत मिल जाती थी।

इस बार अल नीनो के प्रभाव और बारिश में कमी ने खेती की परिस्थितियों को अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

कावेरी और तुंगभद्रा बेसिन में खेती प्रभावित

कर्नाटक में धान की खेती मुख्य रूप से कावेरी और तुंगभद्रा नदी बेसिन के क्षेत्रों में की जाती है।

रायचूर, कोप्पल, बेल्लारी, विजयनगर, मैसूर और मांड्या जिलों में धान की खेती महत्वपूर्ण कृषि गतिविधि है।

इसके अलावा मलनाड क्षेत्र के कुछ हिस्सों में भी धान का उत्पादन होता है।

इस वर्ष दोनों प्रमुख नदी बेसिन में कम बारिश और जलाशयों में पानी की कमी के कारण किसानों को सिंचाई संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ा है।

कर्नाटक में इस साल दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दौरान सामान्य से लगभग 35 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। इसे वर्ष 1971 के बाद सबसे गंभीर मॉनसूनी कमी बताया गया है।

धान की खरीद कीमत में भी भारी बढ़ोतरी

धान की कम उपलब्धता का असर चावल मिल संचालकों पर भी पड़ा है।

मिल मालिकों के अनुसार, कुछ महीने पहले धान की खरीद कीमत लगभग 3,000 रुपये प्रति क्विंटल थी, जो अब बढ़कर करीब 4,400 रुपये प्रति क्विंटल हो गई है।

इससे चावल तैयार करने की लागत में भी वृद्धि हुई है।

एक मिल संचालक के अनुसार, पहले वह तैयार चावल व्यापारियों को लगभग 4,600 से 5,300 रुपये प्रति क्विंटल में बेचता था। अब इसकी कीमत बढ़कर लगभग 7,500 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई है।

मिल मालिकों का कहना है कि कच्चे माल की लागत बढ़ने से बाजार में चावल के दाम बढ़ रहे हैं।

आम उपभोक्ताओं के घरेलू बजट पर असर

चावल की कीमतों में बढ़ोतरी से आम उपभोक्ताओं का मासिक खाद्य खर्च बढ़ सकता है।

कर्नाटक में चावल दैनिक भोजन का प्रमुख हिस्सा है। ऐसे में सोना मसूरी और कोलम जैसी लोकप्रिय किस्मों की कीमतें बढ़ने से परिवारों को अतिरिक्त राशि खर्च करनी पड़ रही है।

विशेष रूप से मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए खाद्य पदार्थों की महंगाई चिंता का विषय बन सकती है।

हालांकि, अलग-अलग बाजारों और दुकानों में चावल की कीमतों में अंतर संभव है। थोक और खुदरा कीमतें भी एक समान नहीं होतीं।

केंद्र सरकार से सूखा राहत की मांग

कर्नाटक सरकार ने गंभीर सूखे से प्रभावित क्षेत्रों के लिए केंद्र सरकार से आर्थिक सहायता मांगी है।

राज्य सरकार ने सूखे के कारण कृषि और अन्य क्षेत्रों में हुए नुकसान का हवाला देते हुए केंद्र से 7,142 करोड़ रुपये की सहायता का अनुरोध किया है।

सरकार का कहना है कि राहत राशि से किसानों को फसल नुकसान का मुआवजा देने, पेयजल व्यवस्था और अन्य आवश्यक राहत कार्यों में सहयोग मिलेगा।

नवंबर की कटाई पर टिकी व्यापारियों की नजर

कर्नाटक में नवंबर से धान की नई फसल की कटाई शुरू होने वाली है। ऐसे में चावल व्यापारियों और मिल संचालकों की नजर नई फसल की आवक पर बनी हुई है।

हालांकि, इस वर्ष खेती का रकबा घटने के कारण पर्याप्त मात्रा में धान उपलब्ध होने को लेकर अनिश्चितता है।

व्यापारियों का अनुमान है कि कम उत्पादन होने पर चावल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे कीमतों पर दबाव बना रहेगा।

फिलहाल कर्नाटक में चावल की कीमतों में 25 से 30 रुपये प्रति किलोग्राम तक बढ़ोतरी की खबर है। अब आने वाले महीनों में नई फसल की आवक और बाजार में आपूर्ति की स्थिति से ही स्पष्ट होगा कि चावल की कीमतों में राहत मिलेगी या महंगाई का दबाव और बढ़ेगा।

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