
बेंगलुरु। कर्नाटक में प्रस्तावित शरावती पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट (PSP) को लेकर विवाद एक बार फिर गहराता नजर आ रहा है। विशेषज्ञों की आपत्तियों और स्थानीय लोगों तथा पर्यावरण कार्यकर्ताओं के विरोध के बावजूद कर्नाटक पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (KPCL) ने परियोजना के लिए वन विभाग के समक्ष प्रस्ताव पेश किया है। इस कदम के बाद पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संगठनों और कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई है तथा परियोजना से जुड़े दावों और अनुमानों पर सवाल उठाए हैं।
प्रस्तावित परियोजना के लिए KPCL ने शरावती वैली लायन-टेल्ड मकाक सैंक्चुअरी में 131.81 एकड़ वन भूमि की मांग की है। परियोजना का उद्देश्य दो जलाशयों के बीच भूमिगत पावरहाउस स्थापित कर करीब 2000 मेगावाट बिजली उत्पादन करना है।
हालांकि, परियोजना को लेकर विशेषज्ञों की एक संयुक्त समिति पहले ही गंभीर आपत्तियां जता चुकी है। नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्डलाइफ (NBWL) के सदस्यों की अगुवाई वाली इस समिति ने परियोजना को व्यवहारिक नहीं माना था और इसे खारिज किए जाने की सिफारिश की थी।
2000 मेगावाट बिजली उत्पादन की योजना
KPCL की प्रस्तावित योजना के तहत दो जलाशयों के बीच एक भूमिगत पावरहाउस बनाया जाना है। इस पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट की क्षमता करीब 2000 मेगावाट बताई गई है।
पंप स्टोरेज परियोजनाओं में बिजली की मांग कम होने के समय पानी को ऊंचाई वाले जलाशय में पहुंचाया जाता है और बिजली की मांग बढ़ने पर उसी पानी को नीचे की ओर प्रवाहित कर टर्बाइन के जरिए बिजली पैदा की जाती है। इस तरह की परियोजनाओं को बिजली ग्रिड में मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए उपयोगी माना जाता है।
हालांकि, शरावती परियोजना को लेकर मुख्य चिंता यह है कि इसके लिए संरक्षित वन क्षेत्र का इस्तेमाल किया जाना प्रस्तावित है।
शरावती वैली सैंक्चुअरी में वन भूमि की मांग
KPCL ने शरावती वैली लायन-टेल्ड मकाक सैंक्चुअरी के अंतर्गत आने वाली 131.81 एकड़ वन भूमि के इस्तेमाल की अनुमति मांगी है। यह क्षेत्र जैव-विविधता और वन्यजीवों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है।
लायन-टेल्ड मकाक एक संकटग्रस्त प्राइमेट प्रजाति है और पश्चिमी घाट के घने जंगल इसके प्रमुख प्राकृतिक आवासों में शामिल हैं। ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट के निर्माण को लेकर पर्यावरणविद लगातार सवाल उठाते रहे हैं।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का तर्क है कि परियोजना से वन क्षेत्र में निर्माण गतिविधियां बढ़ेंगी और इसका असर स्थानीय पारिस्थितिकी तथा वन्यजीवों के आवास पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञ समिति ने उठाए सवाल
शरावती PSP को लेकर नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्डलाइफ के सदस्यों की अगुवाई में एक संयुक्त विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया था। समिति ने परियोजना के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करने के बाद इसके औचित्य और व्यवहार्यता पर सवाल उठाए।
समिति ने कथित तौर पर कहा था कि परियोजना में पर्याप्त दम नहीं है और इसे खारिज किया जाना चाहिए। विशेषज्ञों की इस राय के बावजूद KPCL द्वारा वन विभाग के समक्ष प्रस्ताव आगे बढ़ाए जाने पर अब विवाद और बढ़ गया है।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब विशेषज्ञ समिति ने परियोजना के खिलाफ गंभीर टिप्पणियां की हैं, तो फिर उसी परियोजना को आगे बढ़ाने की जरूरत और प्रक्रिया पर स्पष्टता होनी चाहिए।
एक्टिविस्ट्स ने जताई चिंता
KPCL की ओर से प्रस्ताव भेजे जाने की जानकारी सामने आने के बाद पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि शरावती घाटी का क्षेत्र पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील है और यहां बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियों के संभावित प्रभाव का गंभीरता से आकलन किया जाना चाहिए।
कार्यकर्ताओं ने परियोजना से जुड़े अनुमानों और दावों पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि बिजली उत्पादन और परियोजना की उपयोगिता के आकलन के साथ-साथ वन्यजीव, जल स्रोत, जैव-विविधता और स्थानीय पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।
स्थानीय विरोध भी बना चुनौती
परियोजना को लेकर स्थानीय स्तर पर भी विरोध की बात सामने आती रही है। स्थानीय लोगों और पर्यावरण समूहों की चिंता मुख्य रूप से वन क्षेत्र और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर है।
विरोध करने वाले समूहों का कहना है कि किसी भी परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले स्थानीय समुदायों की चिंताओं को सुना जाना चाहिए। खासतौर पर ऐसे क्षेत्र में जहां वन और वन्यजीव स्थानीय पर्यावरण के महत्वपूर्ण हिस्से हैं, वहां विकास परियोजना की योजना बनाते समय व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय अध्ययन जरूरी है।
भूमिगत निर्माण के बावजूद पर्यावरणीय सवाल
परियोजना के समर्थकों के लिए भूमिगत पावरहाउस एक महत्वपूर्ण पहलू हो सकता है, क्योंकि इसका बड़ा हिस्सा जमीन के नीचे बनाया जाना प्रस्तावित है। हालांकि, पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि भूमिगत निर्माण का मतलब यह नहीं है कि परियोजना का पर्यावरणीय प्रभाव सीमित ही होगा।
निर्माण के दौरान सड़क, सुरंग, सामग्री की आवाजाही, श्रमिकों की आवाजाही और अन्य बुनियादी ढांचे की जरूरत पड़ सकती है। इन गतिविधियों का असर जंगल और वन्यजीवों पर पड़ने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
वन विभाग के फैसले पर नजर
अब KPCL के प्रस्ताव के बाद वन विभाग की प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो गई है। प्रस्ताव की जांच के दौरान परियोजना की भूमि जरूरत, पर्यावरणीय प्रभाव और विशेषज्ञों की आपत्तियों सहित विभिन्न पहलुओं पर विचार किया जाना अपेक्षित है।
इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की आपत्तियों को प्रक्रिया में किस तरह शामिल किया जाता है।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की चुनौती
शरावती PSP का मामला कर्नाटक में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती को सामने लाता है। एक तरफ राज्य को बढ़ती बिजली जरूरतों और नवीकरणीय ऊर्जा के साथ ग्रिड संतुलन के लिए नई परियोजनाओं की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र में किसी भी बड़े निर्माण की पर्यावरणीय कीमत का आकलन भी जरूरी है।
2000 मेगावाट क्षमता वाली परियोजना राज्य की ऊर्जा जरूरतों में योगदान दे सकती है, लेकिन इसके लिए संरक्षित वन भूमि के इस्तेमाल का प्रस्ताव परियोजना को पर्यावरणीय जांच के दायरे में लाता है।
फिलहाल KPCL के वन विभाग के पास प्रस्ताव भेजने के बाद इस परियोजना को लेकर बहस फिर तेज हो गई है। विशेषज्ञों की आपत्ति, स्थानीय विरोध और पर्यावरणीय चिंताओं के बीच अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वन विभाग प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाता है और परियोजना के भविष्य को लेकर आगे की प्रक्रिया किस दिशा में बढ़ती है।





