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मध्य प्रदेश
सरकारी स्कूलों पर संकट देश में 8 हजार से ज्यादा स्कूल बंद MP में सबसे बड़ा असर
nidhi
2 Sept 2026 11:40 AM IST

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MP में आधे से ज्यादा बंद UDISE+ रिपोर्ट में खुलासा
भोपाल : देश में सरकारी स्कूलों की संख्या में कमी आई है। शिक्षा मंत्रालय की UDISE+ रिपोर्ट के आंकड़ों ने स्कूल शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक अहम तस्वीर सामने रखी है। रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में सरकारी स्कूलों की संख्या घटी है और इस गिरावट का बड़ा हिस्सा अकेले मध्य प्रदेश में दर्ज किया गया है। इससे सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों, शिक्षकों और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की पहुंच को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।
UDISE+ यानी Unified District Information System for Education Plus देश में स्कूली शिक्षा से जुड़ा एक प्रमुख डेटा सिस्टम है। इसके माध्यम से सरकारी और निजी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या, शिक्षकों, बुनियादी सुविधाओं और स्कूलों से जुड़े अन्य आंकड़ों को दर्ज किया जाता है। इसी रिपोर्ट के आंकड़ों में सरकारी स्कूलों की संख्या में आई कमी सामने आई है। देशभर में सरकारी स्कूलों की संख्या में कुल गिरावट दर्ज की गई। इनमें मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, देश में सरकारी स्कूलों की संख्या में हुई कुल कमी का आधे से ज्यादा हिस्सा मध्य प्रदेश में दर्ज हुआ है। राज्य में बड़ी संख्या में सरकारी स्कूलों की संख्या कम हुई है।
मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा गिरावट
मध्य प्रदेश में सरकारी स्कूलों की संख्या में इतनी बड़ी कमी कई कारणों से जुड़ी हो सकती है। कम छात्र संख्या वाले स्कूलों का विलय, स्कूलों का एकीकरण, प्रशासनिक पुनर्गठन और कुछ संस्थानों को दूसरे स्कूलों में मर्ज किया जाना इसके संभावित कारणों में शामिल हैं। हालांकि, स्कूलों की संख्या घटने का सीधा अर्थ यह नहीं है कि सभी स्कूल बंद कर दिए गए या विद्यार्थियों को शिक्षा से बाहर कर दिया गया। कई राज्यों में कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को पास के बड़े स्कूलों में मिलाने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। सरकारों का तर्क रहता है कि इससे संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है और विद्यार्थियों को एक ही स्थान पर बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं। लेकिन दूसरी ओर, ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में स्कूलों के विलय से बच्चों को अधिक दूरी तय करनी पड़ सकती है।
सरकारी स्कूलों की भूमिका अहम
भारत में सरकारी स्कूल विशेष रूप से ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए शिक्षा का प्रमुख माध्यम हैं। बड़ी संख्या में विद्यार्थी सरकारी संस्थानों में पढ़ते हैं। ऐसे में सरकारी स्कूलों की संख्या में बदलाव केवल शिक्षा विभाग के आंकड़ों तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि इसका असर लाखों परिवारों पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों की संख्या घटाने से पहले स्थानीय स्तर पर विद्यार्थियों की संख्या, स्कूल की दूरी, परिवहन सुविधा और क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है। यदि किसी गांव में स्कूल को दूसरे स्थान पर मर्ज किया जाता है और वहां तक पहुंचने के पर्याप्त साधन नहीं हैं, तो इसका असर बच्चों की नियमित पढ़ाई पर पड़ सकता है।
सिर्फ संख्या नहीं गुणवत्ता भी अहम
UDISE+ के आंकड़े शिक्षा व्यवस्था में हो रहे बदलावों को समझने का महत्वपूर्ण आधार हैं। स्कूलों की संख्या के साथ-साथ विद्यार्थियों की संख्या, शिक्षक-छात्र अनुपात, भवन, बिजली, पेयजल, शौचालय और डिजिटल सुविधाओं जैसे पहलुओं को भी देखना जरूरी है।
सरकार की ओर से समय-समय पर स्कूलों के एकीकरण और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल को लेकर कदम उठाए जाते हैं। इसका उद्देश्य कई बार कम नामांकन वाले स्कूलों में उपलब्ध संसाधनों को एक जगह केंद्रित करना होता है। लेकिन यह भी जरूरी है कि ऐसे फैसलों से शिक्षा की पहुंच प्रभावित न हो।
मध्य प्रदेश में सरकारी स्कूलों की संख्या में देश की कुल गिरावट का आधे से ज्यादा हिस्सा दर्ज होना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य में बड़ी ग्रामीण आबादी सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि स्कूलों की संख्या कम होने के बावजूद विद्यार्थियों की पहुंच और शिक्षा की गुणवत्ता में कितना सुधार होता है। UDISE+ रिपोर्ट के आंकड़े इस बहस को फिर सामने लाते हैं कि शिक्षा व्यवस्था में केवल स्कूलों की संख्या बढ़ाना या घटाना पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि हर बच्चे को उसके घर के आसपास गुणवत्तापूर्ण और सुलभ शिक्षा मिले।
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