
MANIPUR मणिपुर: फास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट नंबर 1 ने बुधवार को नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। विशेष जज आरके मेम्चा देवी की अध्यक्षता वाली अदालत ने सौतेले पिता मोइरांगथेम इबोचौ सिंह (58) को POCSO एक्ट की धारा 10 के तहत दोषी ठहराया। अदालत ने पाया कि इबोचौ सिंह ने अपनी नाबालिग सौतेली बेटी के साथ बार-बार यौन उत्पीड़न किया। अदालत ने कहा कि एक सौतेले पिता होने के नाते वह विश्वास की स्थिति में था, लेकिन उसने इस स्थिति का दुरुपयोग किया। इसके कारण आरोपी पर कानून के तहत सख्त कार्रवाई की गई। साथ ही, पीड़िता की मां मोइरांगथेम को भी POCSO एक्ट की धारा 21 के तहत दोषी पाया गया। अदालत ने माना कि मां को अपने पति द्वारा किए गए बार-बार के यौन उत्पीड़न की जानकारी थी, लेकिन उसने इसकी सूचना पुलिस को नहीं दी। अदालत ने इसे गंभीर अपराध माना और मां को भी दोषी करार दिया।
हालांकि, तीसरे आरोपी हवाइबम मंगलेजाओ सिंह (51) को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। अदालत ने उनके जमानत बांड को रद्द करने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सबूतों की कमी के कारण वह आरोपी को दोषी नहीं ठहरा सकती। इस फैसले के बाद पीड़िता और उसके परिवार को न्याय मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। अदालत ने बताया कि POCSO एक्ट के तहत ऐसे मामलों में विश्वास का दुरुपयोग गंभीर अपराध माना जाता है और दोषियों को कड़ी सजा दी जा सकती है।
मणिपुर की फास्ट-ट्रैक कोर्ट ने यह फैसला बच्चों के प्रति यौन अपराधों के मामलों में कानून की कठोरता को दर्शाने वाला बताया। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में समय पर कार्रवाई करना और दोषियों को सजा दिलाना समाज में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है। इस मामले में सौतेले पिता और मां के दोषी ठहराए जाने से यह संदेश गया है कि नाबालिग बच्चों के खिलाफ किए गए अपराधों में परिवार के सदस्यों की भूमिका भी जांच के दायरे में आती है। वहीं, सबूतों की कमी के कारण तीसरे आरोपी की बरी होने ने अदालत की निष्पक्षता और सबूतों के महत्व को भी स्पष्ट किया। POCSO एक्ट के तहत यह फैसला मणिपुर में बच्चों की सुरक्षा और यौन अपराधों के खिलाफ कानूनी कदमों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।





