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जंगपुरा में खास है ‘चौतारी
नई दिल्ली: दिल्ली के जंगपुरा में बना छोटा-सा ‘Chautari Cafe – The Sikkimese Kitchen’ सिर्फ मोमो, थुकपा या चाय परोसने की जगह नहीं है। यहां खाने की प्लेट के साथ सिक्किम, पूर्वोत्तर, पहचान, राजनीति, न्याय और घर से दूर रहने के अनुभवों पर बातचीत भी उसी सहजता से होती है। यही वजह है कि यह कैफे धीरे-धीरे दिल्ली में रहने वाले पूर्वोत्तर समुदाय के लोगों के लिए एक अलग तरह की सांस्कृतिक जगह बनता जा रहा है।
‘चौतारी’ शब्द खुद इस सोच को समझाता है। नेपाली और सिक्किमी परंपरा में चौतारी उस पत्थर के चबूतरे या विश्राम स्थल को कहा जाता है, जो पहाड़ी रास्तों में पेड़ के नीचे बना होता था। यात्री यहां कुछ देर रुकते, खाना खाते, खबरें साझा करते और स्थानीय घटनाओं तथा राजनीति पर बातचीत करते थे। कैफे ने इसी पुराने सामाजिक विचार को आधुनिक दिल्ली में दोबारा जीवित करने की कोशिश की है।
जंगपुरा मार्केट के ग्राउंड फ्लोर पर स्थित इस छोटे कैफे में सीमित सीटें हैं। मेन्यू में मोमो, श्याफाले, वाई-वाई सदेको, आलू चिउरा और थुकपा जैसे व्यंजन शामिल किए गए हैं। इसके साथ सिक्किम से आने वाले चुरपी, चाय, अचार और रोडोडेंड्रॉन जूस जैसे उत्पादों को भी जगह देने की सोच इसके शुरुआती मॉडल का हिस्सा रही है।
इस कैफे के पीछे एक लंबी व्यक्तिगत कहानी भी है। इसकी संस्थापक के परिवार का खानपान से जुड़ा अनुभव करीब तीन दशकों तक फैला हुआ है। उन्होंने पहले सिक्किम के मेलों में मोमो स्टॉल, सिक्किम यूनिवर्सिटी में कैंटीन और गंगटोक में पेइंग गेस्ट जैसी छोटी पहलों से काम किया। इन गतिविधियों ने परिवार की आय संभाली, लेकिन लंबे समय तक यह व्यवसाय औपचारिक आर्थिक व्यवस्था में दर्ज नहीं हो पाया।
बाद में दिल्ली में ‘चौतारी’ शुरू करने का विचार आया। मकसद केवल सिक्किमी खाना बेचना नहीं था, बल्कि ऐसा स्थान बनाना था जहां उस भोजन की सांस्कृतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि भी गायब न हो। कैफे की मूल अवधारणा यही रही कि पूर्वोत्तर का खाना उसकी पहचान और इतिहास से अलग करके सिर्फ ‘हिमालयी माहौल’ के रूप में न पेश किया जाए।
दिल्ली में पिछले कुछ वर्षों में हिमालयी और पूर्वोत्तर व्यंजनों वाले कैफे तथा रेस्टोरेंट तेजी से बढ़े हैं। मोमो, ज्होल, थुकपा और नूडल्स जैसे व्यंजन अब मुख्यधारा के शहरी खाने का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन ‘चौतारी’ का जोर इस बात पर है कि भोजन के साथ उन समुदायों की असल कहानियों के लिए भी जगह बनी रहे जिनसे ये व्यंजन आते हैं।
इसी कारण यहां होने वाली बातचीत कई बार सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं रहती। मौजूदा अनुभवों में लोग प्रदर्शन, सामाजिक आंदोलनों, पूर्वोत्तर की पहचान, भेदभाव, घर और दिल्ली में जीवन जैसे मुद्दों पर भी चर्चा करते दिखाई देते हैं। 6 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित एक फीचर में लेखक ने अपने अनुभव का जिक्र करते हुए बताया कि प्रदर्शन स्थल से लौटने के बाद दोस्तों के साथ यहीं बैठकर राजनीति, घर, न्याय और भविष्य को लेकर लंबी बातचीत हुई और पास की टेबल के लोग भी चर्चा में शामिल हो गए।
यही माहौल उस पारंपरिक चौतारी की याद दिलाता है, जहां अनजान लोग भी बातचीत में शामिल हो सकते थे। यहां टेबल सिर्फ खाना खाने की जगह नहीं रह जाती, बल्कि विचार साझा करने की छोटी सार्वजनिक जगह में बदल जाती है।
कैफे की आर्थिक सोच में सिक्किम के महिला स्वयं सहायता समूहों से जुड़े उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने और समुदाय आधारित पहलों को सहयोग देने की बात भी शामिल रही है। शुरुआती फंडरेजिंग मॉडल में निष्पक्ष वेतन और बची राशि को सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य तथा आजीविका से जुड़े कार्यों की ओर ले जाने का विचार रखा गया था।
आज जंगपुरा में ‘चौतारी’ की मौजूदगी यह दिखाती है कि किसी छोटे कैफे की पहचान सिर्फ उसके मेन्यू से तय नहीं होती। कभी-कभी एक प्लेट मोमो के आसपास बैठी बातचीत किसी क्षेत्र की संस्कृति, राजनीति और पहचान को समझने का जरिया भी बन सकती है।
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