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उत्तर प्रदेश
चंद्रशेखर के निशाने पर सपा नीले रंग को लेकर कसा तंज
Ratna Netam
19 Sept 2026 2:12 PM IST

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोटों को लेकर सियासी बयानबाजी एक बार फिर तेज हो गई है। आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सपा की ओर से दलित समाज को साधने की कोशिशों पर सवाल उठाते हुए कहा कि केवल रंग बदल लेने से किसी दल का राजनीतिक चरित्र नहीं बदल जाता। इसी दौरान उन्होंने बहुजन समाज पार्टी और मायावती को लेकर भी अपनी बात रखी।
चंद्रशेखर आजाद ने समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा, **“रंग नीला कर लिया, चरित्र कैसे बदलोगे?”** उनके इस बयान को उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति और बहुजन वोटों को लेकर चल रही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से जोड़कर देखा जा रहा है। नीला रंग लंबे समय से बहुजन आंदोलन और खासकर बसपा की राजनीति से जुड़ा रहा है। ऐसे में चंद्रशेखर का यह बयान सपा की दलित मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने की रणनीति पर सीधा राजनीतिक प्रहार माना जा रहा है।
चंद्रशेखर ने सवाल उठाया कि केवल प्रतीकों और रंगों को अपनाने से दलित समाज का विश्वास हासिल नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक किसी भी राजनीतिक दल का आकलन उसके पुराने राजनीतिक रिकॉर्ड, फैसलों और दलित-पिछड़े वर्गों से जुड़े मुद्दों पर उसके रुख के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि दलित समाज अब केवल नारों और प्रतीकों के आधार पर राजनीतिक निर्णय नहीं करता।
उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता लंबे समय से राजनीतिक दलों की रणनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। बसपा ने कांशीराम और मायावती के नेतृत्व में दलित राजनीति के जरिए प्रदेश की सत्ता तक का सफर तय किया। वहीं, हाल के वर्षों में समाजवादी पार्टी ने भी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक यानी पीडीए की राजनीति को प्रमुखता दी है। सपा नेतृत्व विभिन्न दलित नेताओं और सामाजिक समूहों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करता रहा है। इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में चंद्रशेखर आजाद का बयान सामने आया है।
आजाद समाज पार्टी भी उत्तर प्रदेश में दलितों, वंचितों और अन्य सामाजिक समूहों के बीच अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है। नगीना लोकसभा सीट से चंद्रशेखर आजाद की जीत के बाद उनकी राजनीतिक मौजूदगी को लेकर चर्चा बढ़ी है। इसके बाद से वे उत्तर प्रदेश की राजनीति से जुड़े कई मुद्दों पर लगातार अपनी स्थिति सामने रखते रहे हैं।
समाजवादी पार्टी को लेकर चंद्रशेखर के बयान में राजनीतिक प्रतीकों का मुद्दा भी प्रमुख रहा। उन्होंने कहा कि किसी पार्टी के कार्यक्रमों या मंचों पर नीले रंग की मौजूदगी भर से उसकी राजनीति को बहुजन हितैषी नहीं माना जा सकता। उन्होंने दलित समाज से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक दलों की नीतियों और उनके काम को देखने की बात कही।
इस दौरान मायावती को लेकर पूछे गए सवाल पर भी चंद्रशेखर आजाद ने प्रतिक्रिया दी। उत्तर प्रदेश में बसपा और आजाद समाज पार्टी दोनों दलित राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय हैं, इसलिए दोनों नेताओं को लेकर राजनीतिक चर्चाएं होती रहती हैं। चंद्रशेखर ने मायावती के राजनीतिक अनुभव और उनके लंबे सार्वजनिक जीवन के संदर्भ में अपनी बात रखी। साथ ही उन्होंने यह संकेत भी दिया कि उनकी पार्टी अपनी स्वतंत्र राजनीतिक दिशा और संगठन के विस्तार पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
मायावती उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं और बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। बसपा का राजनीतिक आधार लंबे समय तक दलित मतदाताओं, विशेषकर जाटव समुदाय के बीच मजबूत माना जाता रहा है। हालांकि पिछले कुछ चुनावों में पार्टी का चुनावी प्रदर्शन कमजोर हुआ है। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में बसपा की भूमिका और मायावती के प्रभाव को लेकर राजनीतिक बहस जारी रहती है।
दूसरी तरफ चंद्रशेखर आजाद ने भीम आर्मी के माध्यम से सामाजिक गतिविधियों से शुरुआत करते हुए बाद में आजाद समाज पार्टी का गठन किया। उनकी राजनीति में दलित अधिकार, सामाजिक न्याय, शिक्षा और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे प्रमुख रहे हैं। नगीना लोकसभा क्षेत्र में जीत के बाद उन्हें संसद में भी अपनी बात रखने का अवसर मिला और इसके साथ ही उत्तर प्रदेश में दलित नेतृत्व को लेकर नई राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की चर्चा तेज हुई।
समाजवादी पार्टी की पीडीए रणनीति भी इसी सामाजिक समीकरण के बीच महत्वपूर्ण है। सपा पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों को एक व्यापक राजनीतिक गठजोड़ के रूप में पेश करती रही है। पार्टी ने चुनावों में दलित और पिछड़े समुदायों के नेताओं को टिकट देने और संगठन में उनकी भागीदारी बढ़ाने की बात भी कही है। चंद्रशेखर आजाद की आलोचना इसी रणनीति के संदर्भ में सामने आई है।
चंद्रशेखर का तर्क है कि दलित समाज के बीच जगह बनाने के लिए राजनीतिक दलों को प्रतीकात्मक बदलाव से आगे बढ़कर उनके अधिकारों और प्रतिनिधित्व से जुड़े सवालों पर काम करना होगा। उनके बयान से यह भी साफ है कि आजाद समाज पार्टी खुद को उत्तर प्रदेश की बहुजन राजनीति में एक स्वतंत्र विकल्प के तौर पर स्थापित करने का प्रयास कर रही है।
उत्तर प्रदेश में आने वाले चुनावों को देखते हुए दलित मतदाताओं को लेकर राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने की संभावना है। सपा जहां पीडीए के जरिए अपने सामाजिक आधार का विस्तार करने में जुटी है, वहीं बसपा अपने पारंपरिक बहुजन आधार को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। आजाद समाज पार्टी भी संगठन विस्तार और जनसंपर्क के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है।
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