उत्तराखंड

उत्तराखंड में बड़े भूकंप का खतरा बढ़ा

Rajeshwari Nishad
18 Oct 2026 10:41 PM IST
उत्तराखंड में बड़े भूकंप का खतरा बढ़ा
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देहरादून। उत्तराखंड हिमालय के नीचे धरती की परतों में लंबे समय से जमा हो रही ऊर्जा को लेकर वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण आकलन प्रस्तुत किया है। अध्ययन के अनुसार, इस क्षेत्र में हर 100 साल में इतनी ऊर्जा जमा होने का अनुमान है, जो रिक्टर पैमाने पर 8.1 तीव्रता के भूकंप के बराबर हो सकती है। यह आकलन हिमालयी क्षेत्र में बड़े भूकंप की संभावनाओं को समझने और आपदा प्रबंधन की तैयारियों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस अध्ययन का शोध सार 2 अक्टूबर को यूरोपीय भूविज्ञान संघ (European Geosciences Union) की ओर से ऑनलाइन प्रकाशित किए जाने की जानकारी दी गई है। वैज्ञानिकों के इस आकलन ने उत्तराखंड और आसपास के हिमालयी क्षेत्रों में भूकंप से जुड़े जोखिमों पर चर्चा को फिर महत्वपूर्ण बना दिया है। हालांकि, ऊर्जा जमा होने का अनुमान यह नहीं बताता कि भूकंप किसी निश्चित तारीख या वर्ष में आएगा।
हिमालय में क्यों जमा होती है ऊर्जा?
हिमालय दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में शामिल है। इसका प्रमुख कारण भारतीय टेक्टोनिक प्लेट का यूरेशियाई प्लेट की ओर लगातार बढ़ना और उसके नीचे दबाव का बनना है। इन प्लेटों की आपसी गति से धरती की ऊपरी परतों में तनाव पैदा होता है। जब चट्टानों और भ्रंशों के बीच यह तनाव लंबे समय तक जमा रहता है, तो कुछ परिस्थितियों में अचानक फिसलन हो सकती है। इससे भूकंप पैदा होता है।
उत्तराखंड हिमालय में भी भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों की परस्पर क्रिया के कारण भूगर्भीय तनाव बना रहता है। कई स्थानों पर प्लेटों के बीच की हलचल सतह पर लगातार दिखाई नहीं देती। इसके बावजूद चट्टानों और धरती की परतों में तनाव जमा हो सकता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक हिमालय के नीचे होने वाली गतिविधियों का लगातार अध्ययन करते हैं।
8.1 तीव्रता के भूकंप के बराबर ऊर्जा का क्या मतलब?
अध्ययन में हर 100 साल में 8.1 तीव्रता के भूकंप के बराबर ऊर्जा जमा होने का अनुमान सामने आया है। इसे समझना जरूरी है। भूकंप की तीव्रता से जुड़ी संख्या उसके दौरान निकलने वाली ऊर्जा के परिमाण को दर्शाती है। तीव्रता के पैमाने में थोड़ी-सी बढ़ोतरी भी ऊर्जा में बड़ा अंतर पैदा करती है।
हालांकि, ऊर्जा जमा होने और भूकंप आने के बीच सीधा समय-संबंध मान लेना सही नहीं होगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर 100 साल में ठीक 8.1 तीव्रता का भूकंप आएगा। इसी तरह, यह भी जरूरी नहीं कि जमा हुई पूरी ऊर्जा एक ही भूकंप में निकले। ऊर्जा का उत्सर्जन अलग-अलग भूकंपीय घटनाओं में हो सकता है और वास्तविक स्थिति क्षेत्र की भूगर्भीय संरचना पर निर्भर करती है।
इसलिए वैज्ञानिक आकलन को संभावित खतरे को समझने के एक संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि किसी निश्चित भूकंप की भविष्यवाणी के तौर पर।
उत्तराखंड के लिए क्यों अहम है यह अध्ययन?
उत्तराखंड का बड़ा हिस्सा पहाड़ी भूभाग में स्थित है। यहां देहरादून, उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़ और अन्य जिलों में पर्वतीय ढलान, संकरी घाटियां तथा कई स्थानों पर भूस्खलन की आशंका जैसी चुनौतियां मौजूद हैं। बड़े भूकंप की स्थिति में इमारतों, सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है। पहाड़ी इलाकों में भूकंप के बाद भूस्खलन और सड़क संपर्क बाधित होने जैसी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं।
राज्य में चारधाम यात्रा के प्रमुख मार्ग, सुरंगें, जलविद्युत परियोजनाएं और तेजी से विकसित हो रहे शहरी क्षेत्र भी आपदा जोखिम के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में भूकंपीय गतिविधियों को समझना केवल वैज्ञानिक शोध का विषय नहीं है, बल्कि निर्माण योजनाओं और आपदा प्रबंधन से भी जुड़ा हुआ है।
हालांकि, किसी खास जिले या शहर में संभावित नुकसान का आकलन करने के लिए स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों, आबादी, भवनों की गुणवत्ता और बुनियादी ढांचे की स्थिति का अलग-अलग अध्ययन जरूरी होता है।
भूकंप से बचाव के लिए तैयारी जरूरी
विशेषज्ञों के लिए ऐसे अध्ययन का एक प्रमुख उद्देश्य भूकंप के जोखिम को बेहतर ढंग से समझना और उसके प्रभाव को कम करने के उपायों को मजबूत करना है। इसके लिए भूकंपीय निगरानी केंद्रों का विस्तार, भूगर्भीय सर्वेक्षण, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और भवन निर्माण मानकों का पालन महत्वपूर्ण है।
भूकंपरोधी तकनीक से भवनों का निर्माण और पुरानी इमारतों को जरूरत के अनुसार मजबूत करना भी नुकसान कम करने में मदद कर सकता है। स्कूलों, अस्पतालों, सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर नियमित मॉक ड्रिल तथा
आपातकालीन
निकासी की व्यवस्था उपयोगी साबित हो सकती है।
आम लोगों को भी भूकंप के दौरान सुरक्षित व्यवहार की जानकारी होनी चाहिए। झटके महसूस होने पर मजबूत मेज के नीचे आश्रय लेना, सिर और गर्दन को ढकना तथा खिड़कियों और भारी वस्तुओं से दूर रहना जरूरी है। झटके रुकने के बाद सुरक्षित रास्ते से खुले स्थान की ओर जाना चाहिए और क्षतिग्रस्त इमारतों में दोबारा प्रवेश करने से बचना चाहिए।
वैज्ञानिक निगरानी से ही बेहतर आकलन संभव
उत्तराखंड हिमालय के नीचे ऊर्जा जमा होने का यह अनुमान क्षेत्र में भूकंपीय खतरे को गंभीरता से लेने की जरूरत को रेखांकित करता है। फिर भी, उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसी बड़े भूकंप के आने का समय, उसका सटीक केंद्र या उससे होने वाले नुकसान की निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।
अध्ययन के निष्कर्षों को सही संदर्भ में समझने के लिए शोध की पूरी जानकारी, अपनाई गई पद्धति और क्षेत्रीय आंकड़ों का विस्तृत परीक्षण आवश्यक है। वैज्ञानिक निगरानी, सुरक्षित निर्माण और प्रभावी आपदा प्रबंधन के जरिए भूकंप के संभावित नुकसान को कम किया जा सकता है।
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