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टैक्सपेयर्स के पैसे से नहीं होंगे राजनीतिक विज्ञापन
नई दिल्ली: अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन को सरकारी धन से चलाए जा रहे राजनीतिक प्रचार वाले विज्ञापनों के मामले में अदालत से झटका लगा है। न्यूयॉर्क की संघीय अदालत ने 11 अक्टूबर 2026 को ट्रंप प्रशासन को करदाताओं के पैसे से वित्तपोषित ऐसे टेलीविजन विज्ञापनों को प्रसारित करने पर अस्थायी रोक लगाने का आदेश दिया। अदालत का यह फैसला आगामी मध्यावधि चुनावों से पहले आया है। इन विज्ञापनों को लेकर सवाल उठाए गए थे कि क्या सरकारी धन का इस्तेमाल राष्ट्रपति की राजनीतिक छवि और उनके एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है।
अदालत ने 14 दिनों के लिए लगाई अस्थायी रोक
अमेरिकी जिला न्यायाधीश जेनिफर एल. रोचोन ने ट्रंप प्रशासन और होमलैंड सिक्योरिटी विभाग को करदाताओं के पैसे से पक्षपातपूर्ण राजनीतिक विज्ञापन बनाने और प्रसारित करने से रोकने के लिए अस्थायी आदेश जारी किया। यह रोक 14 दिनों के लिए लगाई गई है। मामला सरकारी धन के कथित अनुचित इस्तेमाल से जुड़ा है और अदालत के सामने इस पर आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रह सकती है।
इस मामले में कॉमन कॉज समेत कई संगठनों और एक राजनीतिक उम्मीदवार ने कानूनी चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि विज्ञापनों के जरिए सरकार के संसाधनों का इस्तेमाल राजनीतिक संदेशों को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है। उनका कहना था कि कांग्रेस ने जिन उद्देश्यों के लिए धन आवंटित किया था, उसका इस्तेमाल उससे अलग राजनीतिक प्रचार के लिए नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने इस चुनौती पर सुनवाई करते हुए अस्थायी रोक लगाने का फैसला किया।
विज्ञापनों पर खर्च किए गए करोड़ों डॉलर
इस विवाद के केंद्र में अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी विभाग की विज्ञापन मुहिम है। रिपोर्टों के अनुसार, इस अभियान के लिए विभाग ने 2 करोड़ डॉलर का बजट निर्धारित किया था। विज्ञापनों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी नीतियों को प्रमुखता से दिखाया गया। आलोचकों ने सवाल उठाया कि इन विज्ञापनों का उद्देश्य आम नागरिकों को सरकारी सेवाओं की जानकारी देना था या राष्ट्रपति के राजनीतिक संदेश को आगे बढ़ाना। इन विज्ञापनों के प्रसारण को लेकर राजनीतिक स्तर पर भी आलोचना हुई। विवाद बढ़ने के बाद ट्रंप ने कहा था कि भविष्य में ऐसे विज्ञापनों के लिए सरकारी धन के बजाय उनके राजनीतिक संगठन से जुड़ी राशि का इस्तेमाल किया जाएगा। हालांकि, पहले खर्च किए जा चुके सरकारी धन की वापसी को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हुई थी।
ट्रंप प्रशासन ने क्या दिया तर्क?
ट्रंप प्रशासन की ओर से विज्ञापनों को जनहित और सरकार की नीतियों के प्रचार से जुड़ा बताया गया। प्रशासन का पक्ष रहा कि इस तरह के विज्ञापन सरकारी नीतियों और उपलब्धियों के बारे में जनता को जानकारी देने के लिए हैं। दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि इन विज्ञापनों की भाषा और प्रस्तुति सामान्य जनहित विज्ञापनों के बजाय राजनीतिक प्रचार जैसी थी। यही विवाद अदालत में मुख्य मुद्दा बना। सवाल यह है कि सरकारी संसाधनों से तैयार विज्ञापन किस सीमा तक सरकारी नीतियों की जानकारी दे सकते हैं और कब वे राजनीतिक प्रचार के दायरे में आ जाते हैं। अदालत का मौजूदा आदेश अस्थायी है। इसे अंतिम फैसले या पूरे मामले के निपटारे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
मध्यावधि चुनाव से पहले बढ़ा विवाद
अमेरिका में आगामी मध्यावधि चुनावों से पहले यह मामला राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है। ऐसे चुनावों में प्रतिनिधि सभा और सीनेट की सीटों के लिए मुकाबला होता है। याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई कि सरकारी धन से प्रसारित राजनीतिक संदेश चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। अदालत के आदेश से फिलहाल संबंधित सरकारी विज्ञापनों के प्रसारण पर अस्थायी रोक लगी है। आगे की कानूनी कार्यवाही में यह तय किया जा सकता है कि विज्ञापन अभियान के लिए सरकारी धन का इस्तेमाल संबंधित कानूनों और कांग्रेस द्वारा निर्धारित बजट संबंधी नियमों के अनुरूप था या नहीं। इस फैसले ने सरकारी संचार और राजनीतिक प्रचार के बीच की सीमा को लेकर एक बार फिर बहस तेज कर दी है। फिलहाल अदालत का आदेश अस्थायी है और मामले का अंतिम कानूनी निष्कर्ष आगे की कार्यवाही पर निर्भर करेगा।
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