विश्व
LGBTIQ अधिकारों पर व्यापक हमला UN मानवाधिकार प्रमुख का बड़ा बयान
Ratna Netam
23 Sept 2026 9:29 PM IST

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न्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क ने दुनियाभर में LGBTIQ+ लोगों के खिलाफ बढ़ते भेदभाव, कानूनी पाबंदियों और कार्रवाई को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि पिछले वर्षों में समान अधिकारों की दिशा में हुई प्रगति के खिलाफ अब एक गहरी और समन्वित प्रतिक्रिया दिखाई दे रही है। तुर्क ने इसे LGBTIQ+ लोगों के अधिकारों पर एक व्यापक हमला बताते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मानवाधिकारों की रक्षा के लिए मजबूत कदम उठाने की अपील की।न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान आयोजित कार्यक्रम में तुर्क ने कहा कि मानवाधिकारों की प्रगति हमेशा एक सीधी रेखा में नहीं हुई है। उनके मुताबिक वर्तमान स्थिति में LGBTIQ+ लोगों के खिलाफ उत्पीड़न चिंताजनक गति से बढ़ रहा है और पहले हासिल किए गए अधिकारों पर भी दबाव दिखाई दे रहा है।
तुर्क ने समान अधिकारों के आंदोलन को व्यापक मानवाधिकार आंदोलन का अभिन्न हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन का इतिहास साहस, गरिमा और एकजुटता से जुड़ा रहा है और इसे मानवाधिकारों की दूसरी लड़ाइयों से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए।उनके मुताबिक LGBTIQ+ समुदायों ने केवल अपने अधिकारों के लिए संघर्ष नहीं किया बल्कि समाज में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति के दायरे को बढ़ाने में भी योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि इन आंदोलनों ने कई सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दी और अधिक खुले तथा समावेशी समाज की दिशा में बदलाव को बढ़ावा दिया।
कई देशों में बढ़ते खतरों का जिक्र
इस महीने की शुरुआत में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 63वें सत्र में भी तुर्क ने LGBTIQ+ लोगों के सामने बढ़ते खतरों का उल्लेख किया था। उन्होंने बुर्किना फासो, नाइजर और सेनेगल में बढ़ते खतरों, किर्गिस्तान में भेदभावपूर्ण कानूनों के तहत कार्रवाई और पुर्तगाल, ब्रिटेन तथा अमेरिका में ट्रांसजेंडर लोगों के समान अधिकारों से संबंधित कुछ प्रतिबंधों या प्रस्तावों का जिक्र किया था।तुर्क की चिंता ऐसे समय सामने आई है जब अलग-अलग देशों में यौन अभिविन्यास और लैंगिक पहचान से जुड़े कानूनों तथा नीतियों पर बहस तेज हुई है। हालांकि हर देश की कानूनी और राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं और विभिन्न सरकारें अपने कदमों के लिए अलग-अलग तर्क देती हैं।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय लंबे समय से कहता रहा है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ उसके यौन अभिविन्यास या लैंगिक पहचान के आधार पर हिंसा और भेदभाव मानवाधिकार संबंधी गंभीर चिंता है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद भी देशों से ऐसे भेदभावपूर्ण कानूनों और नीतियों की समीक्षा करने तथा हिंसा की घटनाओं की प्रभावी जांच सुनिश्चित करने की अपील कर चुकी है।
तुर्की में हाल की कार्रवाई पर भी चिंता
LGBTIQ+ अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय बहस के बीच तुर्की में हाल में हुई कार्रवाई भी चर्चा में रही है। सितंबर में तुर्की के कई शहरों में अधिकारियों ने LGBTIQ+ कार्यकर्ताओं और संगठनों से जुड़े लोगों के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान चलाया। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने गिरफ्तारियों और हिरासत की रिपोर्टों पर चिंता जताई और मनमाने तरीके से हिरासत में लिए गए लोगों को रिहा करने की अपील की।तुर्की सरकार ने इन कार्रवाइयों को परिवार और बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी अपनी नीतियों के संदर्भ में उचित ठहराया है। वहीं मानवाधिकार संगठनों और कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि इन कदमों का इस्तेमाल LGBTIQ+ संगठनों और अधिकारों की वकालत करने वाले लोगों पर दबाव बढ़ाने के लिए किया जा रहा है।
यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की चिंता को संबंधित सरकारों के आधिकारिक तर्कों से अलग समझना जरूरी है। मानवाधिकार संगठनों का आकलन और सरकारों द्वारा अपनी नीतियों के लिए दिए गए कारण कई मामलों में एक-दूसरे से अलग हैं।
अभिव्यक्ति और संगठन की स्वतंत्रता का सवाल
LGBTIQ+ अधिकारों को लेकर चिंता केवल समलैंगिक संबंधों को अपराध घोषित करने वाले कानूनों तक सीमित नहीं है। संयुक्त राष्ट्र ने उन प्रतिबंधों पर भी सवाल उठाए हैं जो अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सभा और संगठन बनाने की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकते हैं।संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने पहले भी कहा है कि कुछ देशों में समान अधिकारों की वकालत करने वाले संगठनों पर प्रतिबंध, स्कूलों में यौन और लैंगिक विविधता से जुड़ी चर्चा पर रोक तथा मीडिया सामग्री पर सेंसरशिप जैसे कदम सामने आए हैं।तुर्क के मुताबिक मानवाधिकारों की रक्षा का मतलब केवल कुछ समूहों को अधिकार देना नहीं बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जिसमें सभी लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाए।
भेदभाव को लेकर व्यापक चिंता
वोल्कर तुर्क ने सितंबर में मानवाधिकार परिषद को संबोधित करते हुए वैश्विक स्तर पर व्यवस्थित भेदभाव की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी चिंता जताई थी। उनके भाषण में LGBTIQ+ लोगों के अलावा महिलाओं, नस्लीय और जातीय अल्पसंख्यकों, प्रवासियों, शरणार्थियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव का भी उल्लेख था।उन्होंने कहा कि राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में कुछ समुदायों को सामूहिक खतरे के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति मानवाधिकारों के लिए चुनौती पैदा करती है। तुर्क के मुताबिक ऐसी परिस्थितियों में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार व्यवस्था की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है।
मजबूत अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया की मांग
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख ने सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से LGBTIQ+ लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए अधिक सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया। उनका जोर इस बात पर है कि यौन अभिविन्यास या लैंगिक पहचान के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ हिंसा, मनमानी गिरफ्तारी या भेदभाव को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।तुर्क ने यह भी संकेत दिया कि अधिकारों की रक्षा केवल कानूनों तक सीमित नहीं रह सकती। सामाजिक स्तर पर भेदभाव, नफरत और रूढ़ियों से निपटना भी जरूरी है।उनका कहना है कि मानवाधिकारों की अवधारणा सभी लोगों पर समान रूप से लागू होती है। इसी आधार पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय आने वाले वर्षों में हाशिये पर मौजूद समुदायों के साथ अपना काम बढ़ाने की बात कर रहा है। इनमें LGBTIQ+ लोग, मूल निवासी समुदाय, नस्लीय अल्पसंख्यक, धार्मिक अल्पसंख्यक, प्रवासी, शरणार्थी और राज्यविहीन लोग शामिल हैं।वोल्कर तुर्क का ताजा बयान ऐसे समय आया है जब कई देशों में LGBTIQ+ अधिकारों को लेकर कानून, अदालतों के फैसले और सरकारी नीतियां सार्वजनिक बहस का विषय बनी हुई हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पहले हासिल किए गए मानवाधिकारों को कमजोर होने से रोकने और सभी लोगों के लिए समानता तथा सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में काम करने का आह्वान किया है।
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