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यरुशलम। इजरायल की राजनीति में नई सरकार के गठन को लेकर हलचल तेज हो गई है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को उस समय बड़ा राजनीतिक झटका लगा, जब उनके लंबे समय से सहयोगी रहे अति-रूढ़िवादी यहूदी राजनीतिक गठबंधन यूनाइटेड तोराह जूडाइज्म (UTJ) ने प्रधानमंत्री पद के लिए उनका नाम प्रस्तावित करने से इनकार कर दिया। गुरुवार, 5 नवंबर 2026 को राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग के साथ हुई परामर्श प्रक्रिया के दौरान पार्टी ने किसी भी उम्मीदवार का समर्थन नहीं करने का निर्णय लिया। इस घटनाक्रम ने इजरायल में नई सरकार के गठन को लेकर राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ा दी है।यूनाइटेड तोराह जूडाइज्म का यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह पार्टी लंबे समय से नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी और धार्मिक राजनीतिक गठबंधन का हिस्सा रही है। हालांकि, पार्टी ने अभी विपक्षी नेता का समर्थन करने की भी घोषणा नहीं की है। उसने फिलहाल प्रधानमंत्री पद के लिए किसी का नाम प्रस्तावित नहीं करने का रास्ता चुना है।
राष्ट्रपति हर्ज़ोग के सामने समर्थन देने से इनकार
इजरायल में 27 अक्टूबर को हुए संसदीय चुनाव के बाद नई सरकार बनाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर रहे हैं, ताकि यह तय किया जा सके कि किस नेता को सरकार बनाने का पहला अवसर दिया जाए।इसी प्रक्रिया के तहत यूनाइटेड तोराह जूडाइज्म के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति से मुलाकात की। इस दौरान पार्टी ने स्पष्ट किया कि वह प्रधानमंत्री पद के लिए किसी उम्मीदवार की सिफारिश नहीं करेगी।इजरायल की संसद नेसेट में यूनाइटेड तोराह जूडाइज्म के सात सदस्य हैं। ऐसे में पार्टी का यह फैसला सरकार गठन के लिए जरूरी राजनीतिक समर्थन के समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
धार्मिक नेताओं के निर्देश पर लिया फैसला
यूनाइटेड तोराह जूडाइज्म दो प्रमुख धार्मिक राजनीतिक गुटों से मिलकर बना गठबंधन हैपहला गुट डेगेल हातोराह है, जो लिथुआनियाई परंपरा के अति-रूढ़िवादी यहूदियों का प्रतिनिधित्व करता है। इसके पास संसद में चार सीटें हैं।दूसरा गुट अगुदात यिसरायल है, जो हसीदिक यहूदी समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है और इसके पास तीन सीटें हैं।दोनों गुटों ने अपने धार्मिक नेताओं के निर्देशों के बाद प्रधानमंत्री पद के लिए किसी भी उम्मीदवार का समर्थन नहीं करने का निर्णय लिया।पार्टी के इस रुख को नेतन्याहू के साथ उसके राजनीतिक संबंधों में आई दूरी का संकेत माना जा रहा है।
सैन्य सेवा से छूट को लेकर बढ़ा विवाद
यूनाइटेड तोराह जूडाइज्म और नेतन्याहू के बीच मतभेदों की प्रमुख वजह अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय के धार्मिक छात्रों को सैन्य सेवा से छूट देने से संबंधित कानून है।पार्टी लंबे समय से मांग कर रही है कि येशिवा यानी यहूदी धार्मिक शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट देने के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था बनाई जाए।इजरायल में सैन्य सेवा का मुद्दा काफी संवेदनशील है। देश के अधिकांश यहूदी नागरिकों के लिए निर्धारित शर्तों के तहत सैन्य सेवा अनिवार्य है, जबकि अति-रूढ़िवादी धार्मिक छात्रों की छूट को लेकर लंबे समय से राजनीतिक और कानूनी विवाद चलता रहा है।यूनाइटेड तोराह जूडाइज्म का आरोप है कि नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन ने इस संबंध में अपेक्षित कानून पारित नहीं कराया।पार्टी ने राष्ट्रपति के साथ बातचीत में भी स्पष्ट किया कि भविष्य की किसी सरकार को उसका समर्थन मिलना धार्मिक छात्रों की सैन्य सेवा से छूट सुनिश्चित करने वाले कानून पर निर्भर करेगा।
विपक्षी नेता गादी आइजनकोट को बढ़त
इस राजनीतिक घटनाक्रम से विपक्षी नेता गादी आइजनकोट की स्थिति मजबूत होती दिखाई दे रही है।आइजनकोट याशार पार्टी के नेता हैं और नई सरकार बनाने की दौड़ में नेतन्याहू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में सामने आए हैं।राष्ट्रपति के साथ चल रहे परामर्श के दौरान विभिन्न दलों की घोषित सिफारिशों के आधार पर आइजनकोट को 56 सांसदों का समर्थन प्राप्त होने की जानकारी सामने आई है।वहीं यूनाइटेड तोराह जूडाइज्म के समर्थन से पीछे हटने के बाद नेतन्याहू के पक्ष में सिफारिश करने वाले सांसदों की संख्या 46 बताई गई है।अरब समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली राआम पार्टी के आठ सांसदों ने भी आइजनकोट के पक्ष में सिफारिश करने का फैसला लिया है।हालांकि, राष्ट्रपति के सामने किसी नेता की सिफारिश करना और संसद में उसकी सरकार का समर्थन करना दो अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए आइजनकोट को अधिक सिफारिशें मिलने का अर्थ यह नहीं है कि उनके पास सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत सुनिश्चित हो गया है।
120 सदस्यीय संसद में 61 सीटें जरूरी
इजरायल की संसद नेसेट में कुल 120 सदस्य होते हैं। किसी सरकार को स्थिर बहुमत दिलाने के लिए सामान्यतः कम से कम 61 सांसदों का समर्थन आवश्यक होता है।अक्टूबर में हुए चुनाव में नेतन्याहू के दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों के गठबंधन को कुल 53 सीटें मिली थीं। इनमें यूनाइटेड तोराह जूडाइज्म की सात सीटें भी शामिल हैं।वहीं आइजनकोट के नेतृत्व से जुड़े विपक्षी दलों को 48 सीटें मिलीं। अरब प्रतिनिधित्व वाले दो प्रमुख राजनीतिक समूहों के पास कुल 19 सीटें हैं।ऐसी स्थिति में नई सरकार का गठन विभिन्न दलों के बीच समझौते और गठबंधन पर निर्भर करेगा।
क्या नेतन्याहू से पूरी तरह अलग हो जाएगी पार्टी?
यूनाइटेड तोराह जूडाइज्म के मौजूदा फैसले को नेतन्याहू से पूर्ण राजनीतिक अलगाव के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।पार्टी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि भविष्य की सरकार को समर्थन देने का निर्णय उसकी प्रमुख धार्मिक मांगों के आधार पर किया जाएगाइससे संकेत मिलता है कि वह सरकार गठन की बातचीत में अपनी मांगों को लेकर दबाव बनाए रखना चाहती है।पिछले सप्ताह ऐसी खबरें भी सामने आई थीं कि पार्टी आइजनकोट के नेतृत्व वाली अल्पमत सरकार को बाहर से समर्थन देने के विकल्प पर विचार कर सकती है।हालांकि, यह अभी संभावना भर है और पार्टी ने इस संबंध में कोई अंतिम घोषणा नहीं की है।दूसरी ओर आइजनकोट और उनके सहयोगी दल अति-रूढ़िवादी यहूदी पुरुषों की सैन्य भर्ती को महत्वपूर्ण मुद्दा मानते हैं। ऐसे में दोनों पक्षों के बीच समझौता आसान नहीं होगा।
राष्ट्रपति के फैसले पर टिकी निगाहें
इजरायल के कानून के अनुसार, राष्ट्रपति को उस सांसद को सरकार बनाने का अवसर देना होता है, जिसके सफल होने की संभावना सबसे अधिक दिखाई देती है।यह जरूरी नहीं कि राष्ट्रपति सबसे बड़ी पार्टी के नेता को ही सरकार गठन का पहला मौका देंसरकार बनाने की जिम्मेदारी मिलने वाले नेता को प्रारंभ में 28 दिनों का समय मिलता है। निर्धारित परिस्थितियों में इस अवधि को अधिकतम 14 दिन बढ़ाया जा सकता है।फिलहाल राष्ट्रपति हर्ज़ोग विभिन्न दलों के साथ परामर्श कर रहे हैं। बातचीत पूरी होने के बाद वह तय करेंगे कि नेतन्याहू या आइजनकोट में से किसे नई सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाए।
इजरायल में नए राजनीतिक समीकरणों के संकेत
यूनाइटेड तोराह जूडाइज्म का फैसला इजरायल की गठबंधन राजनीति में महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।नेतन्याहू के लिए अपने पुराने सहयोगियों का भरोसा दोबारा हासिल करना चुनौती बन गया है। वहीं आइजनकोट को समर्थन देने वाले दलों की संख्या बढ़ने से उन्हें सरकार बनाने का पहला अवसर मिलने की संभावना मजबूत हुई है।अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि धार्मिक दल अपनी मांगों को लेकर कितनी नरमी दिखाते हैं और विपक्षी दल उनके साथ किस प्रकार का राजनीतिक समझौता कर पाते हैं।फिलहाल इजरायल में अगली सरकार का नेतृत्व कौन करेगा, इस पर अंतिम फैसला होना बाकी है। राष्ट्रपति हर्ज़ोग की आगामी घोषणा देश की राजनीतिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
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