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ग्रीनलैंड पर अमेरिका डेनमार्क में बड़ा सुरक्षा समझौता

Ratna Netam
22 Sept 2026 10:07 PM IST
ग्रीनलैंड पर अमेरिका डेनमार्क में बड़ा सुरक्षा समझौता
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न्यूयॉर्क। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन और ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक निल्सन के साथ आर्कटिक और उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में सुरक्षा सहयोग मजबूत करने वाले समझौते पर हस्ताक्षर किए। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान हुए इस समझौते को ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच महीनों से चले आ रहे राजनयिक तनाव को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।समझौते के तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य मौजूदगी का विस्तार करने की अनुमति मिलेगी। हालांकि ग्रीनलैंड की संप्रभुता और संवैधानिक स्थिति में बदलाव नहीं होगा। डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने स्पष्ट किया है कि समझौता किंगडम ऑफ डेनमार्क की संप्रभुता और ग्रीनलैंड के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता देता है।
UN महासभा के दौरान हुआ समझौता
डेनमार्क के प्रधानमंत्री कार्यालय ने हस्ताक्षर से पहले पुष्टि की थी कि तीनों देशों के नेता 22 सितंबर को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे। इसका उद्देश्य आर्कटिक और उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र की साझा सुरक्षा मजबूत करना है।समझौते पर हस्ताक्षर करते समय ट्रंप ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि तीनों पक्षों के बीच मजबूत और सुरक्षित संबंध विकसित होंगे। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था पर लंबे समय से काम किया जा रहा था।नया समझौता जरूरी घरेलू संसदीय प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद प्रभावी होगा।
अमेरिका की सैन्य मौजूदगी बढ़ाने का रास्ता साफ
समझौते का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी के विस्तार से जुड़ा है। अमेरिका पहले से ग्रीनलैंड में पिटुफिक स्पेस बेस संचालित करता है, जो मिसाइल चेतावनी, अंतरिक्ष निगरानी और उत्तरी क्षेत्र की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।नई व्यवस्था अमेरिकी सेना को ग्रीनलैंड में अपनी गतिविधियों और सुरक्षा ढांचे का विस्तार करने का अधिक अवसर देगी। रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका अतिरिक्त सुविधाओं का इस्तेमाल कर सकेगा और उसकी सैन्य पहुंच बढ़ेगी।आर्कटिक में रूस की सैन्य गतिविधियों और चीन की आर्थिक तथा रणनीतिक रुचि को देखते हुए अमेरिका लंबे समय से ग्रीनलैंड को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानता रहा है।
ट्रंप ने कहा था ‘इनफिनिट लाइफ’ समझौता
औपचारिक हस्ताक्षर से पहले ट्रंप ने इस व्यवस्था को लंबे समय तक लागू रहने वाला समझौता बताया था। उन्होंने दावा किया था कि अमेरिका को ग्रीनलैंड की सुरक्षा से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने की स्थायी क्षमता मिलेगी। उन्होंने इसे ऐसी व्यवस्था के रूप में पेश किया जिसकी कोई तय समाप्ति अवधि नहीं होगी।हालांकि ट्रंप की “परमानेंट कंट्रोल” वाली भाषा और डेनमार्क-ग्रीनलैंड की आधिकारिक व्याख्या में महत्वपूर्ण अंतर है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने स्पष्ट किया है कि समझौते से अमेरिका को ग्रीनलैंड की संप्रभुता नहीं मिलती और द्वीप की क्षेत्रीय स्थिति नहीं बदलती।इसलिए समझौते को ग्रीनलैंड पर अमेरिकी स्वामित्व या राजनीतिक नियंत्रण के बजाय विस्तारित सुरक्षा और सैन्य पहुंच की व्यवस्था के रूप में देखना अधिक सटीक है।
डेनमार्क ने संप्रभुता पर दिया जोर
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि यह ग्रीनलैंड, डेनमार्क, अमेरिका और व्यापक पश्चिमी गठबंधन की सुरक्षा मजबूत करेगा।उन्होंने विशेष रूप से कहा कि समझौता किंगडम ऑफ डेनमार्क की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के साथ ग्रीनलैंड के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता देता है। उनके मुताबिक यह NATO और यूरोप की सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है।ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक निल्सन ने भी कहा कि समझौता ग्रीनलैंड के हितों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में उसकी भूमिका को स्वीकार करता है।
विरोधियों की सैन्य मौजूदगी रोकना चाहता है अमेरिका
समझौते का एक उद्देश्य अमेरिकी विरोधियों को ग्रीनलैंड में सैन्य ठिकाने स्थापित करने से रोकना भी है। ट्रंप प्रशासन विशेष रूप से रूस और चीन की आर्कटिक गतिविधियों को लेकर चिंता जताता रहा है।समझौते से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार रणनीतिक रूप से संवेदनशील विदेशी निवेश पर भी कड़ी निगरानी रखी जाएगी। अमेरिका नहीं चाहता कि उसके रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी ग्रीनलैंड में महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे, खनिज संसाधनों या सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रों में ऐसी स्थिति हासिल करें जिससे अमेरिकी या NATO सुरक्षा प्रभावित हो।
ग्रीनलैंड इतना महत्वपूर्ण क्यों?
ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है और भौगोलिक रूप से उत्तरी अमेरिका तथा यूरोप के बीच महत्वपूर्ण स्थान पर स्थित है। आर्कटिक क्षेत्र में इसकी स्थिति इसे सैन्य निगरानी, मिसाइल चेतावनी और उत्तरी अटलांटिक सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है।ग्रीनलैंड में महत्वपूर्ण खनिज संसाधन भी मौजूद हैं। इसके अलावा आर्कटिक में बर्फ घटने से भविष्य में नए समुद्री मार्गों और संसाधनों तक पहुंच की संभावना बढ़ रही है। इसी कारण अमेरिका, रूस और चीन के बीच इस क्षेत्र का रणनीतिक महत्व बढ़ा है।
महीनों से चल रहा था विवाद
ट्रंप के दूसरे राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान ग्रीनलैंड का मुद्दा अमेरिका और डेनमार्क के संबंधों में तनाव की बड़ी वजह बना। ट्रंप कई बार कह चुके थे कि अमेरिका को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड पर अधिक नियंत्रण चाहिए।डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं ने राजनीतिक नियंत्रण या अमेरिकी अधिग्रहण की संभावना का विरोध किया था और कहा था कि ग्रीनलैंड के भविष्य का फैसला वहां के लोगों को करना है।नया समझौता ट्रंप की पहले की ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाने की मांग से काफी अलग है। इसमें अमेरिका को विस्तारित सुरक्षा और सैन्य पहुंच मिलती है लेकिन ग्रीनलैंड डेनमार्क के साम्राज्य के भीतर स्वशासित क्षेत्र बना रहता है।
NATO के लिए भी अहम समझौता
ग्रीनलैंड और डेनमार्क NATO सुरक्षा ढांचे का हिस्सा हैं। आर्कटिक क्षेत्र में रूस की बढ़ती सैन्य क्षमताओं के कारण गठबंधन पिछले कुछ वर्षों से उत्तरी क्षेत्र की सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान दे रहा है।नई व्यवस्था से अमेरिका की आर्कटिक सैन्य क्षमता मजबूत हो सकती है और उत्तरी अटलांटिक में NATO की निगरानी तथा प्रतिक्रिया क्षमता का विस्तार हो सकता है। डेनमार्क की सरकार ने भी समझौते को NATO और यूरोप के लिए लाभकारी बताया है।
सुरक्षा सहयोग पर बनी सहमति
मंगलवार के हस्ताक्षर ने अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच लंबे समय से जारी तनाव को एक नई सुरक्षा व्यवस्था में बदल दिया है। ट्रंप इसे अमेरिकी सुरक्षा हितों की बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रहे हैं, जबकि डेनमार्क और ग्रीनलैंड इस बात पर जोर दे रहे हैं कि उनकी संप्रभुता और आत्मनिर्णय के अधिकार सुरक्षित हैं।अब समझौते के व्यावहारिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेंगे कि अमेरिकी सैन्य मौजूदगी किस स्तर तक बढ़ती है, संवेदनशील विदेशी निवेश को नियंत्रित करने की व्यवस्था कैसे लागू होती है और तीनों पक्ष आर्कटिक में अपने साझा सुरक्षा हितों के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं।
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