नई दिल्ली : मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और वैश्विक अनिश्चितताओं का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। साल 2026 में अब तक घरेलू शेयर बाजार के प्रमुख इंडेक्स निफ्टी 50 में करीब 8.26 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की जा चुकी है। बाजार में लगातार उतार-चढ़ाव के बीच निवेशकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मौजूदा गिरावट के समय शेयर बाजार में पैसा लगाना सही फैसला होगा या अभी इंतजार करना बेहतर रहेगा।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि गिरावट का दौर निवेशकों के लिए चिंता का कारण जरूर बन सकता है, लेकिन लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यही समय अवसर भी लेकर आता है। इतिहास के आंकड़े बताते हैं कि जिन निवेशकों ने बाजार में बड़ी गिरावट के समय धैर्य बनाए रखा और जल्दबाजी में अपने निवेश को नहीं निकाला, उन्हें लंबे समय में अच्छा रिटर्न मिला है।
FundsIndia के एक अध्ययन के अनुसार, साल 2000 के बाद भारतीय शेयर बाजार में आई सात बड़ी गिरावटों के दौरान भी धैर्य रखने वाले निवेशकों को अंत में फायदा मिला। इन गिरावटों में डॉट-कॉम बबल का फटना, साल 2004 का चुनावी झटका, 2006 में वैश्विक ब्याज दरों के कारण आई गिरावट, 2008 का ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस, यूरोपीय कर्ज संकट, 2015 का चीनी युआन संकट और 2020 का कोरोना महामारी के कारण आया बाजार क्रैश शामिल हैं।
इन सभी घटनाओं के दौरान बाजार में भारी गिरावट देखने को मिली थी और उस समय निवेशकों के बीच डर का माहौल था। कई लोगों ने घबराकर अपने शेयर बेच दिए थे, लेकिन जिन निवेशकों ने लंबी अवधि का नजरिया रखा, उन्हें बाजार में सुधार के बाद बेहतर रिटर्न हासिल हुआ।
विशेषज्ञों का कहना है कि शेयर बाजार में निवेश करते समय केवल मौजूदा स्थिति को देखकर फैसला नहीं लेना चाहिए। बाजार में गिरावट एक सामान्य प्रक्रिया है और समय-समय पर वैश्विक घटनाओं, आर्थिक नीतियों और कंपनियों के प्रदर्शन के कारण उतार-चढ़ाव आता रहता है। ऐसे में निवेशकों को अपने वित्तीय लक्ष्य, जोखिम क्षमता और निवेश अवधि को ध्यान में रखकर फैसला लेना चाहिए।
मौजूदा समय में मिडिल ईस्ट तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक बाजारों में कमजोरी जैसी कई चुनौतियां भारतीय शेयर बाजार को प्रभावित कर रही हैं। हालांकि, भारत की आर्थिक वृद्धि, कंपनियों के मजबूत फंडामेंटल और घरेलू निवेशकों की बढ़ती भागीदारी बाजार के लिए सकारात्मक संकेत माने जा रहे हैं।
जानकारों के अनुसार, जो निवेशक लंबी अवधि के लिए निवेश करते हैं, उनके लिए बाजार की गिरावट धीरे-धीरे निवेश बढ़ाने का मौका दे सकती है। हालांकि, एक साथ बड़ी रकम लगाने के बजाय चरणबद्ध तरीके से निवेश करना ज्यादा बेहतर रणनीति हो सकती है। म्यूचुअल फंड में सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) जैसी योजनाएं बाजार के उतार-चढ़ाव के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती हैं।
निवेशकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि शेयर बाजार में कोई भी निवेश पूरी तरह जोखिम मुक्त नहीं होता। केवल पुराने प्रदर्शन के आधार पर भविष्य के रिटर्न की गारंटी नहीं दी जा सकती। इसलिए किसी भी निवेश से पहले कंपनी की स्थिति, बाजार की परिस्थितियों और अपनी आर्थिक जरूरतों का मूल्यांकन करना जरूरी है।
फिलहाल बाजार में कमजोरी जरूर है, लेकिन इतिहास यह संकेत देता है कि बड़े संकटों के बाद बाजार ने समय के साथ वापसी की है। ऐसे में लंबी अवधि की सोच रखने वाले निवेशकों के लिए मौजूदा गिरावट डर के बजाय अवसर भी साबित हो सकती है। हालांकि, निवेश का फैसला अपनी वित्तीय स्थिति और जोखिम क्षमता को ध्यान में रखकर ही लेना चाहिए।