महुआ मोइत्रा मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर अभिजीत दीपके की तीखी प्रतिक्रिया
नई दिल्ली : कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने सुप्रीम कोर्ट की एक हालिया टिप्पणी पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए न्यायपालिका की टिप्पणी पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट कर कहा कि क्या अब सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि हर कोई गोलियां खाए? उनका यह बयान उस समय सामने आया है जब सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने नफरत फैलाने वाले भाषण से जुड़े मामले में पुलिस के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश होने के कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक और कानूनी हलकों में नई बहस छेड़ दी है।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने महुआ मोइत्रा की याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि वह कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती। अदालत ने कहा कि महुआ मोइत्रा को पुलिस जांच में सहयोग करना चाहिए और निर्धारित तिथि पर पुलिस के समक्ष उपस्थित होना चाहिए। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि एक जनप्रतिनिधि होने के नाते उन्हें अंडे फेंके जाने जैसी घटनाओं से डरकर कानूनी प्रक्रिया से बचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा, "आप सांसद हैं। राजनीति में आने के बाद आपको अंडों से डर लगता है? हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने सीने पर गोलियां खाईं। ऐसी याचिकाएं इस अदालत के समक्ष आनी ही नहीं चाहिए।" सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद महुआ मोइत्रा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।
इसी टिप्पणी को लेकर अभिजीत दीपके ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने एक्स पर लिखा, "क्या अब सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि हर कोई गोलियां खाए? जब सुप्रीम कोर्ट के जज विपक्षी नेताओं के खिलाफ इस तरह की टिप्पणियां करते हैं तो आम आदमी के लिए आखिर क्या उम्मीद बचती है?" दीपके ने अप्रत्यक्ष रूप से न्यायपालिका की निष्पक्षता और संवेदनशीलता पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस तरह की टिप्पणियां लोकतांत्रिक व्यवस्था में गलत संदेश देती हैं। उनका यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया और समर्थकों तथा विरोधियों के बीच बहस का विषय बन गया।
महुआ मोइत्रा की ओर से अदालत में पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि कानून के अनुसार उनकी मुवक्किल को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पुलिस के समक्ष पेश होने का अधिकार प्राप्त है। उन्होंने अदालत को बताया कि पिछली बार जब महुआ अपने निर्वाचन क्षेत्र में पुलिस जांच के सिलसिले में गई थीं, तब उन्हें विरोध और हमले का सामना करना पड़ा था। वकील ने कहा कि उन्हें पहले धमकी दी गई थी कि उन पर अंडे फेंके जाएंगे और बाद में वास्तव में उनके साथ ऐसी घटना हुई भी थी। इसलिए उन्होंने अदालत से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने की अनुमति देने का अनुरोध किया था।
गौरतलब है कि यह मामला कथित नफरत फैलाने वाले भाषण से जुड़ा है। इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट ने महुआ मोइत्रा को अंतरिम राहत देते हुए 5 अक्टूबर तक उनके खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई थी। हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि वह जांच में पूरा सहयोग करें और पुलिस के समक्ष उपस्थित हों। महुआ मोइत्रा लगातार यह दावा करती रही हैं कि उनके खिलाफ दर्ज मामला राजनीतिक कारणों से प्रेरित है और लगाए गए आरोप पूरी तरह मनगढ़ंत हैं।
दूसरी ओर, अभिजीत दीपके की प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब वह खुद भी राष्ट्रीय राजनीति में लगातार सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। हाल के दिनों में उन्होंने शिक्षा, युवाओं और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े कई मुद्दों पर केंद्र और विभिन्न संस्थाओं के खिलाफ खुलकर अपनी राय रखी है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर उनका बयान भी उसी क्रम का हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि न्यायपालिका की ओर से दीपके की टिप्पणी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।
इस पूरे घटनाक्रम ने न्यायपालिका की टिप्पणियों, राजनीतिक नेताओं की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जांच एजेंसियों के समक्ष पेश होने की कानूनी प्रक्रिया को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। जहां एक ओर सुप्रीम कोर्ट ने कानून के समक्ष सभी नागरिकों की समान जिम्मेदारी पर जोर दिया, वहीं दूसरी ओर अभिजीत दीपके ने अदालत की टिप्पणी को लेकर असहमति जताते हुए इसे लोकतांत्रिक मूल्यों और विपक्षी नेताओं के अधिकारों से जोड़कर सवाल उठाए हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना रह सकता है।