Delhi दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक झगड़ों से जुड़े आपराधिक मामलों में बदला लेने के लिए ससुराल वालों को घसीटने और एक-दूसरे को बदनाम करने के लिए बच्चों का इस्तेमाल करने पर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने एक नाबालिग की बुआ के खिलाफ दर्ज POCSO केस को रद्द कर दिया है, जिसके माता-पिता के बीच कड़वा वैवाहिक विवाद चल रहा है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस नज़रिए से असहमति जताई, जिसने रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों की जांच किए बिना केस रद्द करने से इनकार कर दिया था।
बेंच ने 23 जुलाई के अपने आदेश में कहा, "यह आम बात है, बल्कि एक चलन बन गया है कि वैवाहिक झगड़ों से जुड़े मामलों में बदला लेने के लिए ससुराल वालों को घसीटा जाता है और अक्सर बच्चों का इस्तेमाल एक-दूसरे को बदनाम करने के लिए किया जाता है। लेकिन हम तलाकशुदा मां द्वारा लगाए गए इन आरोपों से हैरान हैं कि उसके बेटे का उसकी बुआ (पिता की बहन) द्वारा लगातार यौन उत्पीड़न किया जाता है।"
कोर्ट ने गौर किया कि यह FIR, तलाकशुदा पिता द्वारा बच्चे की मौसी (मां की बहन) के खिलाफ दर्ज कराई गई FIR के जवाब में दर्ज कराई गई थी, जिसमें भी इसी तरह का चौंकाने वाला आरोप लगाया गया था। आपसी सहमति से सितंबर 2023 में जारी तलाक के आदेश को देखने के बाद, बेंच ने कहा कि अपीलकर्ता उन जुड़वां बच्चों की बुआ है जो उसके भाई की शादी से पैदा हुए थे, जिसका अब तलाक हो चुका है। बच्चे पिता की कस्टडी में थे और मां को उनसे मिलने का अधिकार था। मां ने आरोप लगाया कि यौन उत्पीड़न की शिकायत उसके बेटे ने तब भी की थी जब वह ससुराल में थी, और उसने ऐसी एक घटना खुद देखी भी थी। कोर्ट ने कहा कि तलाक के समय ऐसा कोई आरोप नहीं लगाया गया था, और न ही 17 मार्च 2024 को FIR दर्ज होने से पहले कभी कोई शिकायत की गई थी—यह FIR पिता द्वारा ठीक वैसी ही FIR दर्ज कराने के कुछ ही घंटों बाद दर्ज की गई थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि FIR को पढ़ने पर ही उस पर भरोसा नहीं होता।