मोदी सरकार का बड़ा कदम ट्रिब्यूनल के लिए नया आयोग

Update: 2026-08-10 12:03 GMT
नई दिल्ली : विभिन्न न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। लोकसभा में सोमवार को न्यायाधिकरण सुधार विधेयक 2026 पारित कर दिया गया। विधि और न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने यह विधेयक सदन में पेश किया। विपक्षी सांसदों के हंगामे और नारेबाजी के बीच विधेयक पर विस्तृत चर्चा नहीं हो सकी और इसे सीधे सदन से पारित कर दिया गया।
विपक्षी सदस्य अयोध्या राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी और छात्रों पर पुलिस कार्रवाई समेत विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकार से जवाब की मांग कर रहे थे। इस दौरान सदन में लगातार हंगामा और नारेबाजी होती रही। इसके बावजूद सरकार ने न्यायाधिकरण सुधार विधेयक को पारित कराने की प्रक्रिया पूरी की।
विधि एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने विधेयक को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में किए जा रहे सुधारों का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित कानून का उद्देश्य न्यायाधिकरणों के अधिकार क्षेत्र में बदलाव करना नहीं है। इसका मुख्य मकसद अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना है। सरकार के अनुसार, नई व्यवस्था में दक्षता, स्वतंत्रता, पारदर्शिता और समान पात्रता नियम सुनिश्चित करने पर जोर दिया जाएगा।
विधेयक में **राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग** के गठन का प्रावधान किया गया है। इस आयोग का मुख्यालय नई दिल्ली में होगा। आयोग में कुल पांच सदस्य होंगे, जिनमें एक अध्यक्ष के अलावा चार अन्य सदस्य शामिल होंगे। इन चार सदस्यों में दो न्यायिक और दो तकनीकी सदस्य होंगे। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या किसी हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश को आयोग का अध्यक्ष बनाए जाने का प्रावधान रखा गया है।
सरकार की ओर से पेश किए गए विधेयक में न्यायाधिकरणों की नियुक्ति प्रक्रिया को संस्थागत रूप देने पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विभिन्न न्यायाधिकरणों में अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति के लिए एक समान और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जा सके। इससे नियुक्तियों को लेकर उठने वाले सवालों को कम करने और पूरी प्रक्रिया में पेशेवर विशेषज्ञता बढ़ाने की कोशिश की जाएगी।
सरकार ने विधेयक की जरूरत के पीछे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का भी उल्लेख किया है। विधेयक के मसौदे के मुताबिक, शीर्ष अदालत ने न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम 2021 के कुछ प्रावधानों को रद्द कर दिया था। अदालत ने इन प्रावधानों को शक्तियों के बंटवारे और न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना था।
मसौदे के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों के लिए एक स्वतंत्र राष्ट्रीय आयोग की आवश्यकता पर भी जोर दिया था। आयोग में पेशेवर विशेषज्ञता रखने वाले लोगों को शामिल करने और नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की जरूरत बताई गई थी। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन का प्रावधान करते हुए नया विधेयक तैयार किया है।
नए कानून के लागू होने के बाद न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम 2021 को समाप्त कर दिया जाएगा। सरकार का मानना है कि नई व्यवस्था से विभिन्न न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों की प्रक्रिया ज्यादा व्यवस्थित और भरोसेमंद हो सकेगी। आयोग के गठन के जरिए नियुक्तियों में एकरूपता लाने की कोशिश भी की जाएगी।
न्यायाधिकरण देश की न्यायिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े मामलों की सुनवाई और निपटारे के लिए कई न्यायाधिकरण काम करते हैं। ऐसे में इन संस्थाओं में अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया का पारदर्शी और स्वतंत्र होना महत्वपूर्ण माना जाता है।
हालांकि, विधेयक पर लोकसभा में विस्तृत चर्चा नहीं हो सकी। विपक्षी सांसदों के लगातार विरोध और हंगामे के बीच इसे पारित किया गया। विपक्ष जिन मुद्दों को लेकर सरकार से जवाब मांग रहा था, उनमें अयोध्या राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी और छात्रों पर पुलिस कार्रवाई जैसे विषय शामिल रहे।
फिलहाल लोकसभा से विधेयक पारित होने के बाद इसकी आगे की संसदीय प्रक्रिया पूरी होना बाकी है। यदि यह कानून लागू होता है तो राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के जरिए विभिन्न न्यायाधिकरणों में अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति के लिए नई संस्थागत व्यवस्था अस्तित्व में आएगी। सरकार इसे न्यायाधिकरण प्रणाली में सुधार और नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में अहम कदम बता रही है।
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