New Delhi नई दिल्ली : जून 2019 से अब तक राज्यसभा की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। विपक्षी दलों के कई सांसदों ने या तो भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया या फिर इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव लड़ते हुए भाजपा और उसके सहयोगी दलों के समर्थन से उच्च सदन में वापसी की। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह बदलाव केंद्र सरकार की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य राज्यसभा में अपनी स्थिति मजबूत करना था।
लोकसभा में बहुमत होने के बावजूद मोदी सरकार को कई मौकों पर राज्यसभा में विपक्षी दलों के विरोध का सामना करना पड़ा था। ऐसे में उच्च सदन में संख्या बल बढ़ाना सरकार की प्रमुख राजनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल रहा है।
जानकारी के मुताबिक, जून 2019 से अब तक कुल 25 विपक्षी सांसदों ने अपना राजनीतिक रुख बदला है। इनमें से अधिकतर सांसद भाजपा में शामिल हुए हैं, जबकि कुछ ने इस्तीफा देकर NDA समर्थित उम्मीदवार के रूप में दोबारा राज्यसभा में प्रवेश किया।
इन 25 सांसदों में से 24 सांसदों ने या तो भाजपा की सदस्यता ग्रहण की या राज्यसभा से इस्तीफा देकर अपने बचे हुए कार्यकाल के लिए फिर से चुनाव लड़ा। वहीं, एक सांसद ने भाजपा की जगह NDA की सहयोगी तेलुगु देशम पार्टी (TDP) का रास्ता चुना।
इस बदलाव में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कुछ नेताओं का नाम भी शामिल है। इनमें सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश बड़ाइक जैसे नेता शामिल हैं। बताया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद इन नेताओं के पार्टी नेतृत्व से मतभेद सामने आए थे, जिसके बाद उन्होंने अलग राजनीतिक रास्ता अपनाया।
राज्यसभा में दल बदलने वाले नेताओं में अलग-अलग राज्यों और दलों के सांसद शामिल रहे हैं। इनमें कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों से जुड़े नेता शामिल हैं। इन बदलावों ने विपक्षी दलों की संख्या और रणनीति दोनों को प्रभावित किया है।
राज्यसभा में किसी भी सरकार के लिए बहुमत हासिल करना आसान नहीं होता, क्योंकि यहां लोकसभा की तरह सीधे चुनाव नहीं होते। राज्यसभा सदस्य राज्यों की विधानसभाओं के जरिए चुने जाते हैं और सदन में संख्या बढ़ाने के लिए लंबी राजनीतिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की है। इसका असर राज्यसभा की संरचना पर भी पड़ा है। विपक्षी दलों के कुछ नेताओं के भाजपा में शामिल होने से पार्टी को उच्च सदन में अतिरिक्त समर्थन मिला है।
इसके अलावा, आंध्र प्रदेश की राजनीति से जुड़ा एक मामला भी सामने आया। वाईएसआर कांग्रेस के एक राज्यसभा सांसद ने पद से इस्तीफा देकर TDP का दामन थाम लिया। हालांकि, उन्हें दोबारा उपचुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं मिला।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यसभा में संख्या बढ़ाने की कोशिशें किसी भी केंद्र सरकार के लिए महत्वपूर्ण होती हैं, क्योंकि कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए दोनों सदनों में समर्थन जरूरी होता है।
हालांकि, विपक्षी दलों ने कई बार भाजपा पर राजनीतिक दबाव और सत्ता के इस्तेमाल के आरोप लगाए हैं। विपक्ष का कहना है कि नेताओं का दल बदलना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। वहीं, भाजपा नेताओं का तर्क है कि नेता अपनी राजनीतिक विचारधारा और जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेते हैं।
राज्यसभा में इन बदलावों का असर आने वाले समय में महत्वपूर्ण विधायी फैसलों पर भी दिखाई दे सकता है। केंद्र सरकार को कई मुद्दों पर अब पहले की तुलना में अधिक समर्थन मिलने की संभावना है।
दूसरी ओर, विपक्षी दलों के सामने अपने संगठन को मजबूत करने और नेताओं को साथ बनाए रखने की चुनौती बढ़ गई है। राज्यसभा में संख्या बल की लड़ाई अब भी जारी है और आने वाले चुनावों के साथ इसमें और बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
कुल मिलाकर, जून 2019 के बाद राज्यसभा की राजनीतिक तस्वीर में बड़ा बदलाव आया है। विपक्षी खेमे से NDA की ओर हुए इन राजनीतिक बदलावों ने उच्च सदन में सत्ता पक्ष की स्थिति को मजबूत करने में भूमिका निभाई है।