हर अपशब्द अश्लीलता नहीं, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

Update: 2026-07-18 14:50 GMT

New Delhi नई दिल्ली :   क्या किसी व्यक्ति द्वारा दूसरे को मां-बहन की गाली देना कानून की नजर में अपराध है? क्या केवल गाली देने के आधार पर किसी व्यक्ति को जेल भेजा जा सकता है? इन सवालों पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि हर तरह की गाली-गलौज को आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के लिए अपमानजनक या भद्दी भाषा का इस्तेमाल गलत हो सकता है, लेकिन हर स्थिति में इसे अश्लीलता के कानून के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अश्लीलता के लिए यह जरूरी है कि शब्दों या व्यवहार में कामुकता या वासना उत्पन्न करने वाला तत्व मौजूद हो। केवल गाली-गलौज या अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल अपने आप में अश्लीलता की श्रेणी में नहीं आता। कोर्ट ने यह टिप्पणी तमिलनाडु के एक पुराने जमीन विवाद मामले की सुनवाई के दौरान की।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंजोली की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि समाज में गाली-गलौज और अभद्र भाषा को भले ही खराब व्यवहार माना जाता है, लेकिन हर बार इसे आपराधिक कानून के दायरे में नहीं लाया जा सकता। अदालत ने कहा कि कानून में अश्लीलता का अर्थ केवल भद्दे या अपमानजनक शब्द नहीं है, बल्कि उसमें एक विशेष प्रकार का तत्व होना जरूरी है।

मामले में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने उसे और उसके परिवार को बेहद आपत्तिजनक गालियां दी थीं। शिकायतकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि आरोपी ने मां-बहन से जुड़ी गालियों के अलावा कई अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल ऐसे शब्दों का प्रयोग अश्लीलता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गाली देना सामाजिक रूप से आपत्तिजनक और अपमानजनक व्यवहार हो सकता है, लेकिन इसे हर परिस्थिति में अपराध नहीं माना जा सकता। अगर शब्दों में कामुकता या अश्लील भावना पैदा करने वाला तत्व नहीं है, तो केवल गाली देने के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

यह मामला वर्ष 2017 में तमिलनाडु में हुए जमीन विवाद से जुड़ा था। आरोप था कि जमीन को लेकर हुए विवाद के दौरान आरोपी ने शिकायतकर्ता के साथ गाली-गलौज की और बाद में हंसिया से हमला कर दिया। हमले में शिकायतकर्ता के माथे और नाक पर गंभीर चोटें आईं और उसकी नाक की हड्डी टूट गई।

सुप्रीम कोर्ट ने गाली देने के आरोप में आरोपी को राहत देते हुए उसे इस आधार पर दोषी नहीं माना, लेकिन मारपीट और चोट पहुंचाने के मामले में उसकी सजा बरकरार रखी। हालांकि अदालत ने सजा को कम करते हुए उसे केवल कोर्ट उठने तक की कैद की सजा दी और 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाने का आदेश दिया।

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से यह स्पष्ट हुआ है कि किसी भी आपत्तिजनक भाषा को सीधे तौर पर अश्लीलता का अपराध नहीं माना जा सकता। अपराध तय करने के लिए घटना की परिस्थितियों, इस्तेमाल किए गए शब्दों के उद्देश्य और उनके प्रभाव को भी देखा जाएगा। अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य हर तरह के अपमानजनक व्यवहार को अपराध घोषित करना नहीं, बल्कि वास्तविक आपराधिक कृत्यों पर कार्रवाई करना है।

Tags:    

Similar News