नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बदलती वैश्विक व्यवस्था और संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली को लेकर महत्वपूर्ण बयान दिया है। गुरुवार, 22 अक्टूबर को नई दिल्ली में आयोजित एनडीटीवी वर्ल्ड समिट 2026 को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया तेजी से बदल रही है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इन बदलावों के अनुरूप खुद को ढालने में पीछे रह गई हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था आज की जटिल चुनौतियों का प्रभावी समाधान देने में संघर्ष कर रही है। ऐसे में दुनिया को नई सोच, मजबूत अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और बेहतर सहयोग की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने जोर दिया कि भविष्य की वैश्विक व्यवस्था में विकासशील देशों की आवाज को अधिक महत्व मिलना चाहिए और भारत इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

संयुक्त राष्ट्र की सीमाओं पर पीएम मोदी ने उठाए सवाल

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में संयुक्त राष्ट्र के गठन और उसके ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया को यह समझ आया था कि केवल सैन्य शक्ति और राष्ट्रीय हितों के आधार पर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था नहीं चलाई जा सकती।

उस समय देशों के बीच बातचीत, सहयोग और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की आवश्यकता महसूस की गई। इसी सोच ने संयुक्त राष्ट्र के गठन की नींव रखी।

प्रधानमंत्री ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र ने दशकों तक वैश्विक शांति और सहयोग को बढ़ावा देने में भूमिका निभाई है। हालांकि, समय के साथ दुनिया की परिस्थितियां बदल गई हैं।

नई आर्थिक शक्तियां उभरी हैं, तकनीक का विस्तार हुआ है और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियां पहले से अधिक जटिल हुई हैं। इसके बावजूद कई वैश्विक संस्थाओं की निर्णय लेने की व्यवस्था पुरानी बनी हुई है।

बदलती दुनिया के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे संस्थान

प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां पुरानी वैश्विक व्यवस्था बदल रही है, लेकिन नई व्यवस्था अभी पूरी तरह आकार नहीं ले पाई है।

उन्होंने इस स्थिति को वर्ल्ड बिटवीन ऑर्डर्स यानी दो वैश्विक व्यवस्थाओं के बीच का दौर बताया।

मोदी ने कहा कि जब दुनिया की वास्तविक परिस्थितियां बदल जाती हैं, लेकिन फैसले लेने के तरीके पुराने ही बने रहते हैं, तो संस्थाओं और वास्तविक जरूरतों के बीच दूरी बढ़ने लगती है।

उनके अनुसार, वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में यही समस्या दिखाई दे रही है।

उन्होंने कहा कि नई शक्तियां अपना स्थान बना रही हैं और नए देश वैश्विक निर्णयों में अधिक प्रभावी भूमिका चाहते हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को बदलते समय के अनुरूप सुधार करना होगा।

व्यापार और तकनीक के इस्तेमाल पर जताई चिंता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वैश्वीकरण के दौर में व्यापार, तकनीक और समुद्री मार्गों को देशों के बीच सहयोग बढ़ाने का माध्यम माना जाता था।

लेकिन बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों में इन्हीं माध्यमों का इस्तेमाल दबाव बनाने और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के लिए किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि व्यापारिक प्रतिबंध, तकनीकी नियंत्रण और आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़े विवाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि दुनिया को ऐसी व्यवस्था की जरूरत है, जिसमें शक्तिशाली देश अपनी ताकत का इस्तेमाल कमजोर देशों के हितों को नुकसान पहुंचाने के लिए न कर सकें।

इसके लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों और संस्थाओं को अधिक प्रभावी बनाना आवश्यक है।

चाणक्य के सिद्धांत का किया उल्लेख

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में प्राचीन भारतीय विचारक चाणक्य के सिद्धांत का भी उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि जब नियम और न्यायपूर्ण व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है, तब शक्तिशाली पक्ष कमजोर पक्ष पर हावी होने लगता है।

इस संदर्भ में उन्होंने मत्स्य न्याय की अवधारणा का जिक्र किया, जिसका आशय ऐसी स्थिति से है, जहां बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है।

मोदी ने कहा कि वैश्विक व्यवस्था का उद्देश्य ऐसी परिस्थितियों को रोकना होना चाहिए।

उन्होंने जोर दिया कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की विश्वसनीयता तभी मजबूत होगी, जब वे छोटे और बड़े सभी देशों के हितों का ध्यान रखें।

ग्लोबल साउथ को मिले अधिक प्रतिनिधित्व

प्रधानमंत्री ने विकासशील देशों की भूमिका को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही।

उन्होंने कहा कि दुनिया की नई व्यवस्था में ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों की आवाज को अधिक प्रभावी स्थान मिलना चाहिए।

एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक देशों की आर्थिक तथा रणनीतिक भूमिका लगातार बढ़ रही है।

ऐसे में वैश्विक निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व भी वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए।

प्रधानमंत्री ने कहा कि नई वैश्विक व्यवस्था में सभी देशों की भागीदारी जरूरी है।

उन्होंने ऐसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता बताई, जो संकट के समय केवल घोषणाओं तक सीमित न रहे, बल्कि वास्तविक सहायता उपलब्ध कराए।

कोरोना महामारी के दौरान की परिस्थितियां याद दिलाईं

प्रधानमंत्री मोदी ने कोविड-19 महामारी के दौरान दुनिया के सामने आई चुनौतियों का भी उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि महामारी के समय वैश्विक सहयोग की बड़ी आवश्यकता थी, लेकिन कई देशों ने अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी।

इससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में भरोसे की कमी सामने आई।

प्रधानमंत्री ने याद दिलाया कि उन्होंने वर्ष 2020 में ही मानव कल्याण को केंद्र में रखकर नई वैश्विक व्यवस्था बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया था।

उनका कहना था कि दुनिया को ऐसी व्यवस्था चाहिए, जो संकट के समय देशों को एक-दूसरे से जोड़ने का काम करे।

उन्होंने कहा कि वैश्विक सहयोग का वास्तविक अर्थ कठिन समय में एक-दूसरे की सहायता करना है।

भारत की भूमिका को लेकर जताया भरोसा

प्रधानमंत्री ने कहा कि बदलती दुनिया में भारत अपनी क्षमताओं को लगातार मजबूत कर रहा है।

उन्होंने बताया कि भारत अब केवल दूसरे देशों को सेवाएं प्रदान करने वाला राष्ट्र नहीं रह गया है, बल्कि नवाचार, तकनीकी विकास और नए समाधान तैयार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

मोदी ने कहा कि पहले भारत को दुनिया का बैक ऑफिस कहा जाता था, लेकिन अब भारत वैश्विक स्तर पर नई तकनीकों और विचारों के विकास में योगदान दे रहा है।

उन्होंने भारत की डिजिटल प्रगति, तकनीकी क्षमता और आर्थिक विकास का उल्लेख करते हुए कहा कि देश दुनिया के साथ साझेदारी को और मजबूत करना चाहता है।

प्रधानमंत्री ने विकसित भारत के संकल्प को वैश्विक कल्याण से भी जोड़ा।

नई वैश्विक व्यवस्था में मानव कल्याण हो प्राथमिकता

प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया को ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की जरूरत है, जिसमें मानव कल्याण को प्राथमिकता दी जाए।

उन्होंने मजबूत वैश्विक संस्थाओं, विकासशील देशों को उचित प्रतिनिधित्व और संकट के समय प्रभावी अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भविष्य की व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बताया।

मोदी ने कहा कि केवल पुरानी संस्थाओं को बनाए रखना पर्याप्त नहीं है। उन्हें वर्तमान चुनौतियों के अनुरूप अधिक प्रभावी और समावेशी बनाना भी जरूरी है।

उन्होंने विश्वास जताया कि भारत अपनी आर्थिक, तकनीकी और मानवीय क्षमताओं के माध्यम से वैश्विक विकास में योगदान दे सकता है।

संयुक्त राष्ट्र सुधार पर भारत का पुराना रुख

भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र और विशेष रूप से सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग करता रहा है।

भारत का तर्क है कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में विकासशील देशों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है।

सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों पर आधारित है। ऐसे में इसमें बदलाव की मांग कई वर्षों से उठती रही है।

प्रधानमंत्री मोदी का ताजा बयान इसी व्यापक बहस के संदर्भ में देखा जा रहा है।

उन्होंने संयुक्त राष्ट्र को समाप्त करने की बात नहीं कही, बल्कि बदलती परिस्थितियों में वैश्विक संस्थाओं को अधिक मजबूत और प्रभावी बनाने की जरूरत बताई।

वैश्विक सहयोग के लिए नए समाधान जरूरी

प्रधानमंत्री के संबोधन का प्रमुख संदेश यह रहा कि दुनिया की बदलती चुनौतियों से निपटने के लिए पुरानी व्यवस्थाओं में आवश्यक सुधार करना होगा।

तकनीकी बदलाव, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, अंतरराष्ट्रीय संघर्ष और वैश्विक असमानता जैसी समस्याओं से निपटने के लिए देशों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।

मोदी ने कहा कि भारत अपने विकास को दुनिया की प्रगति से जोड़कर देखता है और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।

प्रधानमंत्री के इस बयान ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार, विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व और भविष्य की वैश्विक व्यवस्था को लेकर जारी चर्चा को एक बार फिर प्रमुखता दी है।

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