नई दिल्ली : लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने भारत की विदेश नीति को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने विदेश नीति को विदेशी नेताओं से मिलने और गले लगने तक सीमित कर दिया है। राहुल ने दावा किया कि ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष को समाप्त कराने की दिशा में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता था, लेकिन केंद्र सरकार ने इस अवसर का लाभ नहीं उठाया।
रचनात्मक कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन के समापन समारोह को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि ईरान भारत का पुराना मित्र है, जबकि अमेरिका और रूस के साथ भी देश के अच्छे संबंध रहे हैं। इन संबंधों का इस्तेमाल दोनों पक्षों के बीच संवाद शुरू कराने और तनाव कम करने के लिए किया जा सकता था। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत के सक्रिय नहीं होने के कारण पाकिस्तान ने मध्यस्थता की भूमिका में अपनी जगह बना ली।
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर तंज कसते हुए कहा कि विदेशी नेताओं से गले मिलना ही विदेश नीति नहीं होती। उन्होंने कहा कि किसी देश की विदेश नीति उसके राष्ट्रीय हितों, वैश्विक प्रभाव और संकट के समय निभाई गई कूटनीतिक भूमिका के आधार पर तय होती है। कांग्रेस नेता के मुताबिक भारत के पास इस संघर्ष के दौरान अपनी अंतरराष्ट्रीय स्थिति मजबूत करने का बड़ा अवसर था।
इंदिरा गांधी के नेतृत्व का किया उल्लेख
राहुल गांधी ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि उनके जैसा नेतृत्व होता तो भारत इस परिस्थिति का बेहतर तरीके से इस्तेमाल करता। उन्होंने कहा कि ईरान भारत का पुराना मित्र है और अमेरिका तथा रूस के साथ भी नई दिल्ली के संबंध हैं। ऐसी स्थिति में भारत संघर्षरत पक्षों के बीच बातचीत कराने का प्रयास कर सकता था।
उन्होंने कहा कि मजबूत नेतृत्व भारत को केवल दर्शक की भूमिका में नहीं रहने देता। उनके मुताबिक देश अपने पुराने संबंधों और कूटनीतिक प्रभाव के सहारे शांति स्थापना में सक्रिय भूमिका निभा सकता था। राहुल ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान ने भारत की संभावित भूमिका अपने हाथ में ले ली और प्रधानमंत्री मोदी देखते रह गए।
कांग्रेस नेता ने कहा कि भारत को अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए सभी प्रमुख देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने चाहिए। किसी एक शक्ति समूह के करीब जाने के बजाय स्वतंत्र विदेश नीति के माध्यम से देश को अपनी भूमिका तय करनी चाहिए।
सरकार की प्राथमिकताओं पर उठाए सवाल
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार का ध्यान वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका मजबूत करने के बजाय घरेलू राजनीति और अपने समर्थक कारोबारी समूहों से आर्थिक सहयोग लेने पर केंद्रित है। उन्होंने कहा कि मजबूत राजनीतिक और लोकतांत्रिक संरचना के बिना विदेश नीति को प्रभावी नहीं बनाया जा सकता।
उनका कहना था कि भारत के पास अलग-अलग वैश्विक शक्तियों के साथ संबंध होने का लाभ है। इस स्थिति का उपयोग शांति, व्यापार और रणनीतिक हितों के लिए किया जाना चाहिए। राहुल ने केंद्र से यह स्पष्ट करने की मांग की कि संघर्ष के दौरान भारत ने मध्यस्थता या तनाव घटाने के लिए क्या प्रयास किए।
संघर्ष के बीच भारत ने बनाए रखे संबंध
ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष 28 फरवरी को उस समय शुरू हुआ, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की। इससे पश्चिम एशिया में व्यापक तनाव पैदा हुआ और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली जहाजों की आवाजाही भी प्रभावित हुई।
महीनों की लड़ाई के बाद अप्रैल में वाशिंगटन और तेहरान के बीच अस्थायी संघर्षविराम हुआ। इसमें पाकिस्तान की मध्यस्थता की भूमिका का दावा किया गया। हालांकि, इसके बाद शांति वार्ता दोबारा शुरू करने के प्रयास आगे नहीं बढ़ सके। ईरान और अमेरिका के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं।
भारत इस संघर्ष में सीधे तौर पर शामिल नहीं हुआ और न ही उसने औपचारिक मध्यस्थ की भूमिका निभाई। हालांकि, नई दिल्ली ने दोनों पक्षों के साथ कूटनीतिक संपर्क बनाए रखा और लगातार बातचीत तथा तनाव कम करने की अपील की। भारत ने संघर्ष के समाधान के लिए शांतिपूर्ण संवाद को जरूरी बताया।
राहुल गांधी ने कहा कि केवल सभी पक्षों से बातचीत की अपील करना पर्याप्त नहीं था। उनके मुताबिक भारत को अपने कूटनीतिक संबंधों का इस्तेमाल करके सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए थी। उन्होंने दावा किया कि ऐसा करने से पश्चिम एशिया में भारत का प्रभाव बढ़ता और वैश्विक स्तर पर उसकी स्थिति अधिक मजबूत होती।