नई दिल्ली। सरकारी अस्पतालों में कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का उपचार करा रहे मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा चिंताजनक मामला सामने आया है। दिल्ली के दिलशाद गार्डन स्थित दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (डीएससीआई) से कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाले चार महंगे इंजेक्शन गायब हो गए हैं। अस्पताल प्रशासन की शिकायत पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। इस घटना ने अस्पतालों में महंगी दवाओं की सुरक्षा, उनके रखरखाव और वितरण व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। खास बात यह है कि दिल्ली पुलिस पहले ही नकली और अवैध तरीके से हासिल की गई कैंसर की दवाओं के
अंतरराज्यीय
नेटवर्क का खुलासा कर चुकी है। हालांकि, डीएससीआई से गायब इंजेक्शन उसी नेटवर्क से जुड़े हैं या नहीं, इसकी अभी पुष्टि नहीं हुई है।
जानकारी के अनुसार, दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट के कीमो डे केयर विभाग में रखे चार इंजेक्शन संदिग्ध परिस्थितियों में गायब पाए गए। ये इंजेक्शन निमोटुजुमैब दवा के थे, जिसका उपयोग कुछ प्रकार के कैंसर के उपचार में किया जाता है। प्रत्येक इंजेक्शन में 50 मिलीग्राम दवा थी।
निमोटुजुमैब एक लक्षित कैंसर उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवा है। इसका उपयोग विशेष रूप से सिर और गर्दन के कुछ प्रकार के कैंसर के उपचार में किया जाता है। इस दवा की कीमत अधिक होने के कारण इसके रखरखाव और सुरक्षित वितरण का विशेष महत्व है।
अस्पताल के फार्मेसी प्रभारी डॉ. पंकज त्यागी की शिकायत के अनुसार, तीन अक्टूबर को कीमोथेरेपी प्रक्रिया के बाद दवा के चार इंजेक्शन विभाग के रेफ्रिजरेटर में रखे गए थे। पांच अक्टूबर को ये इंजेक्शन गायब पाए गए। इसके बाद अस्पताल प्रबंधन ने मामले को गंभीरता से लिया।
नौ अक्टूबर को संबंधित मामले में पुलिस को शिकायत दी गई। इसके आधार पर जीटीबी एन्क्लेव थाने में एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि अस्पताल के भीतर रखे गए इंजेक्शन आखिर किन परिस्थितियों में गायब हुए।
इस मामले में इंजेक्शन की कीमत को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। स्वास्थ्य विभाग से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, एक इंजेक्शन की अनुमानित कीमत करीब 35 हजार से 55 हजार रुपये के बीच बताई गई है। हालांकि, इसकी वास्तविक खरीद कीमत और कुल आर्थिक नुकसान का निर्धारण संबंधित खरीद रिकॉर्ड की जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा।
चार महंगे इंजेक्शन गायब होने की घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि कैंसर का इलाज कराने वाले मरीजों के लिए कई दवाओं की नियमित उपलब्धता आवश्यक होती है। निर्धारित उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवा समय पर उपलब्ध नहीं होने से मरीजों और उनके परिजनों की चिंता बढ़ सकती है।
अस्पताल से दवा गायब होने की इस घटना के बाद दवाओं के भंडारण और स्टॉक रिकॉर्ड पर भी सवाल उठ रहे हैं। किसी सरकारी अस्पताल में महंगी दवा की खरीद, उपलब्धता और उपयोग का रिकॉर्ड रखना महत्वपूर्ण होता है।
जांच में यह पता लगाना जरूरी होगा कि इंजेक्शन किसके पास सुरक्षित रखे गए थे, उनकी निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी और दवाओं के स्टॉक का अंतिम सत्यापन कब किया गया था।
इसी बीच अस्पताल से हेपेटाइटिस सी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली सोफोसबुविर दवा की कुछ मात्रा गायब होने की आशंका भी सामने आई है। हालांकि, शुरुआती पुलिस शिकायत में इस दवा का उल्लेख नहीं था। ऐसे में इसकी वास्तविक स्थिति की अलग से पुष्टि होना बाकी है।
दिल्ली में महंगी कैंसर दवाओं का मामला केवल इंजेक्शन गायब होने तक सीमित नहीं है। इससे पहले अगस्त 2026 में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने कैंसर की नकली और अवैध रूप से हासिल की गई दवाओं के एक बड़े अंतरराज्यीय रैकेट का पर्दाफाश किया था।
उस कार्रवाई में पुलिस ने 17 आरोपियों को गिरफ्तार किया था। आरोपियों के कब्जे से करीब नौ करोड़ रुपये मूल्य की संदिग्ध कैंसर दवाएं और अन्य सामग्री बरामद होने की जानकारी सामने आई थी। पुलिस के अनुसार, यह नेटवर्क विभिन्न शहरों तक फैला हुआ था।
जांच में सामने आया था कि आरोपी कथित तौर पर अस्पतालों और अधिकृत आपूर्ति व्यवस्था से दवाएं हासिल कर उन्हें अवैध बाजार में पहुंचाते थे। कुछ मामलों में नकली दवाओं की आपूर्ति और दवाओं की पैकेजिंग में हेरफेर करने के आरोप भी सामने आए थे।
इस नेटवर्क में अस्पतालों से जुड़े कर्मचारी, बिचौलिए और दवाओं के कारोबार से जुड़े लोगों की कथित भूमिका की जांच की गई। पुलिस ने दिल्ली-एनसीआर के अलावा हरियाणा, मुंबई और हैदराबाद तक फैले संपर्कों का पता लगाया था।
जांच एजेंसियों के सामने यह भी सामने आया था कि कुछ दवाएं उन मरीजों के लिए निर्धारित थीं, जिन तक वे अधिकृत व्यवस्था के जरिए पहुंचनी चाहिए थीं। लेकिन कथित अवैध आपूर्ति नेटवर्क के जरिए उन्हें दूसरे मरीजों को बेचा गया।
इससे मरीजों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा हुई। जिन मरीजों ने ऐसी दवाएं खरीदीं, उनमें से कई को कथित अनियमितताओं की जानकारी नहीं थी।
अक्टूबर की शुरुआत तक की जांच में लगभग 100 कैंसर मरीजों तक अवैध रूप से दूसरी जगह से लाई गई दवाएं पहुंचने की बात सामने आई थी। हालांकि, यह पहले सामने आए अंतरराज्यीय रैकेट से संबंधित जांच थी और इसे डीएससीआई के मौजूदा मामले का सिद्ध हिस्सा नहीं माना जा सकता।
नकली कैंसर दवाओं का कारोबार मरीजों के जीवन के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। कैंसर के उपचार में दवा की गुणवत्ता, उसकी वास्तविक मात्रा और सुरक्षित भंडारण बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। यदि किसी मरीज को निर्धारित दवा के स्थान पर नकली या मिलावटी उत्पाद दिया जाता है, तो उपचार प्रभावित हो सकता है।
ऐसे मामलों में मरीज और उनके परिवार को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। कैंसर का इलाज पहले ही कई परिवारों के लिए बड़ी आर्थिक चुनौती होता है। महंगी दवा खरीदने के बाद उसके असली होने पर संदेह पैदा होना मरीजों के लिए अतिरिक्त परेशानी का कारण बन सकता है।
राजस्थान से जुड़े एक मामले में भी अगस्त 2026 में सरकारी स्वास्थ्य योजना के तहत आपूर्ति की गई कैंसर दवाओं से संबंधित संदिग्ध इंजेक्शन बरामद हुए थे। उस समय दवाओं के साथ छेड़छाड़ और उनमें पानी भरे जाने के आरोपों की जांच सामने आई थी। इसके बाद संबंधित राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने भी जांच के निर्देश दिए थे।
इन घटनाओं ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली महंगी दवाओं की आपूर्ति व्यवस्था की निगरानी को महत्वपूर्ण मुद्दा बना दिया है।
दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट से गायब चार इंजेक्शन के मामले में अभी कई सवालों के जवाब मिलना बाकी हैं। इनमें यह पता लगाना शामिल है कि दवाएं अस्पताल परिसर से बाहर कैसे पहुंचीं, क्या स्टॉक रिकॉर्ड में कोई गड़बड़ी हुई और घटना के पीछे किसी व्यक्ति या संगठित नेटवर्क की भूमिका थी या नहीं।
फिलहाल पुलिस की जांच जारी है। किसी कर्मचारी, अधिकारी या बाहरी व्यक्ति की संलिप्तता को लेकर अभी अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है। साथ ही डीएससीआई के मरीजों को गायब इंजेक्शन के स्थान पर नकली दवा दिए जाने की भी पुष्टि नहीं हुई है।
इस मामले में जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इंजेक्शन गायब होने के पीछे चोरी, रिकॉर्ड संबंधी अनियमितता या किसी अन्य कारण की भूमिका थी।
बहरहाल, कैंसर जैसे गंभीर रोग से जूझ रहे मरीजों के उपचार के लिए रखी गई महंगी दवाओं का अस्पताल से गायब होना गंभीर चिंता का विषय है। इस घटना ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों में दवाओं की सुरक्षा, स्टॉक की निगरानी और मरीजों तक सही दवाएं पहुंचाने की व्यवस्था को मजबूत बनाने की जरूरत सामने रखी है।
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