गुवाहाटी। असम के तामुलपुर और बक्सा जिलों में इंसानों और जंगली हाथियों के बीच बढ़ते संघर्ष ने वन्यजीव संरक्षण को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। पिछले डेढ़ महीने के दौरान दो वयस्क हाथियों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत और एक व्यक्ति की जान जाने की घटनाओं के बाद वन्यजीव संरक्षण संगठन 'आरण्यक' (Aaranyak) ने तत्काल कदम उठाए हैं। संगठन ने असम वन विभाग के सहयोग से प्रभावित गांवों में जागरूकता और सामुदायिक परामर्श कार्यक्रम शुरू किए हैं, ताकि हाथियों तथा स्थानीय लोगों के बीच टकराव की घटनाओं को कम किया जा सके।
दो हाथियों की मौत, बिजली का करंट देने की आशंका
जानकारी के अनुसार, 18 सितंबर 2026 को तामुलपुर जिले में एक वयस्क हाथी की मौत हुई थी। इसके बाद 6 अक्टूबर को पड़ोसी बक्सा जिले में एक अन्य वयस्क हाथी मृत पाया गया। दोनों घटनाओं में आशंका जताई गई कि हाथियों को जानबूझकर बिजली का करंट देकर मारा गया।हालांकि, दोनों हाथियों की मौत के वास्तविक कारणों और परिस्थितियों का अंतिम निर्धारण जांच के आधार पर ही किया जा सकता है।इसी बीच 25 सितंबर को तामुलपुर जिले में एक अकेले जंगली हाथी से सामना होने के दौरान एक व्यक्ति की मौत हो गई। इन घटनाओं ने स्थानीय ग्रामीणों की सुरक्षा और वन्यजीव संरक्षण की चुनौती को सामने ला दिया है।
फसल कटाई के मौसम में बढ़ा हाथियों का खतरा
पश्चिमी असम के कई ग्रामीण इलाकों में फसल कटाई का मौसम शुरू होने के साथ इंसानों और हाथियों के बीच टकराव की घटनाएं बढ़ रही हैं। खेतों में तैयार फसल की मौजूदगी हाथियों को आबादी वाले क्षेत्रों की ओर आकर्षित कर सकती है।कई गांव जंगलों और हाथियों के पारंपरिक आवागमन वाले रास्तों के आसपास स्थित हैं। ऐसे में भोजन की तलाश में हाथियों के खेतों में पहुंचने से किसानों की फसलों को नुकसान होता है।फसलों की सुरक्षा के लिए ग्रामीणों को रात में खेतों की निगरानी करनी पड़ती है, जिससे हाथियों के साथ अचानक सामना होने का जोखिम भी बढ़ जाता है।
चार गांवों के लोगों के साथ जागरूकता कार्यक्रम
इन परिस्थितियों को देखते हुए आरण्यक ने 9 अक्टूबर 2026 को तामुलपुर जिले में दो सामुदायिक परामर्श कार्यक्रम आयोजित किए। शांतिपुर और अभयपुर गांवों में आयोजित इन बैठकों में चार परियोजना गांवों के निवासियों ने भाग लिया।कार्यक्रमों में करीब 110 ग्रामीण शामिल हुए। इस दौरान स्थानीय लोगों ने हाथियों से होने वाली समस्याओं, खेतों की सुरक्षा और रात के समय आवाजाही से जुड़े खतरों पर चर्चा की।ग्रामीणों ने हाथियों के साथ टकराव कम करने वाले उपकरण लगाने के लिए संभावित स्थान भी सुझाए। साथ ही उन परिवारों की पहचान की गई, जिन्हें अंधेरे में सुरक्षित आवाजाही और सामुदायिक खेतों की निगरानी के लिए सर्चलाइट की आवश्यकता हो सकती है।
अंतरराष्ट्रीय संस्था के सहयोग से चल रही पहल
आरण्यक द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम 'IUCN SSC सेंटर फॉर स्पीशीज सर्वाइवल एशियन एलिफेंट रैपिड रिस्पॉन्स 2026 ग्रांट' के सहयोग से संचालित किया गया।इस पहल में असम राज्य वन विभाग ने भी सहयोग प्रदान किया। कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य स्थानीय समुदायों को हाथियों के व्यवहार के बारे में जानकारी देना और संघर्ष की स्थिति में सुरक्षित उपाय अपनाने के लिए जागरूक करना था।संरक्षण विशेषज्ञों के अनुसार, मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के लिए ग्रामीणों की भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। केवल प्रशासनिक उपायों से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
हाथियों और ग्रामीणों की सुरक्षा पर विशेष जोर
आरण्यक लंबे समय से असम के विभिन्न जिलों में मानव-हाथी संघर्ष कम करने के लिए काम कर रहा है। संगठन सामुदायिक जागरूकता, सौर ऊर्जा से संचालित बाड़ और निगरानी संबंधी व्यवस्थाओं के माध्यम से ग्रामीणों की मदद करता रहा है।इसके अलावा संगठन ने पहले भी संघर्ष प्रभावित इलाकों में निगरानी टावर, सौर लाइट और अन्य सुरक्षा उपाय उपलब्ध कराने की पहल की है। इन प्रयासों का उद्देश्य किसानों की आजीविका सुरक्षित रखते हुए हाथियों के संरक्षण को बढ़ावा देना है।
ग्रामीणों की भागीदारी से संघर्ष कम करने की कोशिश
तामुलपुर और बक्सा जिलों में हुई घटनाओं ने स्पष्ट किया है कि मानव-हाथी संघर्ष केवल वन्यजीवों की सुरक्षा का मामला नहीं है, बल्कि ग्रामीण परिवारों की जान और आजीविका से भी जुड़ा है।आरण्यक और वन विभाग का प्रयास है कि स्थानीय समुदायों को संघर्ष रोकने के उपायों से जोड़ा जाए। ग्रामीणों को हाथियों की गतिविधियों के प्रति सतर्क रहने, सुरक्षित दूरी बनाए रखने और जोखिमपूर्ण परिस्थितियों में वन विभाग की सहायता लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।संगठन का मानना है कि स्थानीय लोगों के अनुभव, वैज्ञानिक संरक्षण उपाय और वन विभाग के समन्वय से इंसानों तथा हाथियों के बीच शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को मजबूत बनाया जा सकता है।
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