दीपावली की तैयारियों के बीच कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल ने दिया स्वच्छता, सद्भाव और मानवता का संदेश
रायपुर: दीपावली का त्योहार केवल घरों को दीपों से रोशन करने का अवसर नहीं, बल्कि मन के अंधकार को मिटाकर प्रेम, सद्भाव और खुशियां बांटने का भी पर्व है। इसी भाव को रायपुर की कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल ने अपनी काव्य रचना ‘तैयारी त्योहार की’ में खूबसूरती से प्रस्तुत किया है। ‘सुषमा के स्नेहिल सृजन’ के अंतर्गत लिखी गई इस घनाक्षरी छंद की रचना में दीपावली की तैयारियों के साथ सामाजिक जिम्मेदारी, स्वच्छता, संस्कार और जरूरतमंदों की सहायता का संदेश दिया गया है।
घरों के साथ मन की स्वच्छता पर दिया जोर
कवयित्री ने अपनी रचना के माध्यम से बताया कि दीपावली के अवसर पर घरों की साफ-सफाई जितनी आवश्यक है, उतना ही जरूरी अपने मन को स्वच्छ और निर्मल रखना भी है। उन्होंने लोगों से आपसी प्रेम बढ़ाने, मनमुटाव दूर करने और सदाचार को जीवन में अपनाने का आह्वान किया है। कविता में दीपों की रोशनी के माध्यम से समाज में फैले अज्ञान, नकारात्मकता और भेदभाव के अंधकार को दूर करने की भावना व्यक्त की गई है।
मिट्टी के दीये बनाने वालों को प्रोत्साहित करने की अपील
कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल ने अपनी रचना में स्थानीय कारीगरों और मिट्टी के दीये बनाने वाले परिवारों के प्रति संवेदनशीलता दिखाई है। उन्होंने लोगों से अपील की है कि दीपावली पर मिट्टी के दीये खरीदकर उन परिवारों की आजीविका को प्रोत्साहित करें, जिनकी रोजी-रोटी पारंपरिक हस्तशिल्प से जुड़ी हुई है।
इसके साथ ही उन्होंने गरीबों की कुटिया में भी खुशियों का उजाला पहुंचाने और जरूरतमंदों को सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र एवं अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने का संदेश दिया है।
मिलावट वाली मिठाइयों और दिखावे से बचने की सीख
कविता में त्योहार के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों का भी उल्लेख किया गया है। कवयित्री ने बाजारों में बढ़ती भीड़भाड़ के बीच सतर्क रहने और नकली एवं मिलावटी मिठाइयों से बचने की सलाह दी है। उन्होंने घरों में शुद्ध और पारंपरिक पकवान बनाने के महत्व पर भी जोर दिया है।
इसके अलावा दीपावली के अवसर पर अनावश्यक दिखावे और फिजूलखर्ची से दूर रहकर जरूरतमंदों की सहायता करने की प्रेरणा दी है।
परिवार में प्रेम, संस्कार और सुख-शांति का संदेश
रचना में भगवान गणेश, माता लक्ष्मी, मां सरस्वती और कुबेर की आराधना के साथ परिवार में प्रेम, संस्कार और सद्भाव बनाए रखने की कामना की गई है। कवयित्री ने बताया कि वास्तविक समृद्धि केवल धन-संपत्ति में नहीं, बल्कि परिवार की एकता, बच्चों के अच्छे संस्कार और आपसी विश्वास में भी निहित है।
कविता के अंतिम हिस्से में उन्होंने सभी के चेहरों पर मुस्कान, परिवारों में प्रेम और समाज में सुख-शांति बने रहने की मंगलकामना की है।
पूरी कविता
आने वाली दीपावली, तैयारी में नर-नारी,
व्यस्तता है बड़ी भारी,
नजदीक है त्योहार।
दीप जले द्वार-द्वार, मिटे मन अँधियार,
प्रेम सुधा बाँटकर,
महकाएँगे संसार।
सफाई के साथ-साथ, हृदय भी साफ़ रख,
पावन निर्मल तन,
साथ रहे सदाचार।
धन लक्ष्मी पूजा हेतु, उत्साह उमंग भर,
दीवाली में व्यसनों का,
करेंगे जी प्रतिकार।
आशीष गणेश लक्ष्मी, शारदे कुबेर सदा,
दिल में हों प्यार तभी,
मिले धन अधिकार।
सद्भावों से सजा रहे, मंगल कलश सजे,
सुख-शांति बनी रहे,
संतानों मे हों संस्कार।
गरीबों की कुटिया भी, जगमग करे सदा,
पुण्य कार्य सेवा भाव,
रखें नेक व्यवहार।
रोजी रोटी वाले हाथ, माटी के बनाते दीये,
प्रोत्साहित करें उन्हें,
खुशियाँ हों घर-द्वार।
रहना है सावधान, आए नहीं व्यवधान,
बाजारों में भीड़-भाड़,
पहले से हों तैयार।
बच कर रहना है, नक़ली मिठाइयों से,
खीर बने हर घर,
शुद्धता ही है आधार।
कपड़ों की ढेरी लगा, दिखावे की दुनियाँ से,
दूर रहकर बाँटें,
वस्त्र साम्यर्थानुसार।
सबका आशीष मिले, मुखड़े मुस्कान खिले,
‘सुषमा’ सुंदर गृह,
प्रेम रहे परिवार।