Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने शिक्षाकर्मी से नियमित सरकारी सेवा में आए कर्मचारियों की पूर्व सेवा को पेंशन लाभ के लिए गिने जाने से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने 31 शिक्षकों की ओर से दायर रिट अपील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर पहले ही राज्य बनाम राजेंद्र प्रसाद पटेल मामले में निर्णय दिया जा चुका है और मौजूदा प्रकरण में अलग दृष्टिकोण अपनाने का कोई आधार नहीं है। मामले में जांजगीर-चांपा जिले में पदस्थ शिक्षक और व्याख्याता शामिल हैं। इन कर्मचारियों ने शिक्षाकर्मी के रूप में दी गई अपनी पूर्व सेवा को पेंशन संबंधी लाभ के लिए गणना में शामिल करने का मुद्दा उठाया था। उन्होंने एकल पीठ की ओर से 23 जनवरी 2026 को पारित आदेश के खिलाफ डिवीजन बेंच में रिट अपील दायर की थी।
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने स्वीकार किया कि शिक्षाकर्मी के रूप में दी गई पूर्व सेवा को पेंशन के लिए गिने जाने से संबंधित समान कानूनी मुद्दा पहले भी हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के समक्ष आ चुका है। इसके बाद कोर्ट ने 23 अप्रैल 2026 को राज्य बनाम राजेंद्र प्रसाद पटेल मामले में दिए गए फैसले का उल्लेख किया। डिवीजन बेंच ने कहा कि पूर्व में शिक्षाकर्मी के रूप में काम कर चुके और बाद में नियमित सरकारी सेवा में समाहित हुए कर्मचारियों की प्री-अब्जॉर्प्शन सेवा को पेंशन के लिए किस सीमा तक गिना जाना चाहिए, यह केवल किसी एक कर्मचारी या व्यक्तिगत प्रकरण से जुड़ा विषय नहीं है।
इसमें कर्मचारियों की सेवा की निरंतरता, उनके कार्य की प्रकृति, प्रशासनिक नियंत्रण और समानता से संबंधित संवैधानिक प्रावधान जैसे कई महत्वपूर्ण पहलू जुड़े हैं। संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता से संबंधित प्रश्नों पर भी इस विषय में विचार किया जाना आवश्यक है। कोर्ट ने पूर्व के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि यह व्यापक और नीतिगत विषय है। ऐसे में राज्य सरकार को सभी पहलुओं पर विचार करने और तर्कसंगत नीतिगत निर्णय लेने का अवसर दिया जाना उचित है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सिंगल बेंच की ओर से दिया गया निर्देश किसी कर्मचारी को सीधे पेंशन लाभ देने का आदेश नहीं था।
सिंगल बेंच के आदेश का उद्देश्य राज्य सरकार को इस पूरे मुद्दे पर विचार कर निर्णय लेने के लिए कहना था। डिवीजन बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायालय ने राज्य सरकार की मौजूदा नीति में बदलाव करने का कोई सीधा निर्देश नहीं दिया था और न ही किसी कर्मचारी को स्वतः पेंशन लाभ का हकदार घोषित किया गया था। राज्य सरकार इस विषय पर फैसला लेते समय वित्तीय प्रभाव, सेवा अवधि, देरी और अन्य कानूनी एवं प्रशासनिक पहलुओं पर विचार कर सकती है। इस कारण शिक्षाकर्मियों की पूर्व सेवा को पेंशन के लिए गिने जाने के प्रश्न पर अंतिम नीतिगत निर्णय सरकार के स्तर पर महत्वपूर्ण रहेगा। मौजूदा 31 शिक्षकों की अपील में भी डिवीजन बेंच ने तथ्यों और कानूनी प्रश्नों को पहले से तय मामले के समान पाया। कोर्ट ने कहा कि जब समान मुद्दे पर डिवीजन बेंच पहले ही अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर चुकी है तो मौजूदा मामले में अलग आदेश पारित करने का कोई कारण नहीं है। इसी आधार पर चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने 31 शिक्षकों की रिट अपील खारिज कर दी। इस फैसले के बाद शिक्षाकर्मी के रूप में दी गई पूर्व सेवा की पेंशन गणना का मामला राज्य सरकार के नीतिगत निर्णय से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है।
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