जगदलपुर: भारत की सांस्कृतिक विविधता में छत्तीसगढ़ का बस्तर अपनी अनूठी पहचान रखता है। यहां की लोक परंपराएं, जनजातीय जीवनशैली, धार्मिक मान्यताएं और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत देश-दुनिया को आकर्षित करती हैं। इसी विरासत का सबसे भव्य और जीवंत स्वरूप है विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा, जो केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, सामाजिक समरसता, सामूहिक सहभागिता और सांस्कृतिक गौरव का अनुपम उत्सव है।
देश के अधिकांश हिस्सों में दशहरा भगवान श्रीराम की रावण पर विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, लेकिन बस्तर में इसकी परंपरा बिल्कुल अलग है। यहां न तो रावण का पुतला दहन इस उत्सव की मुख्य पहचान है और न ही राम-रावण युद्ध का मंचन। बस्तर दशहरा आदिशक्ति मां दंतेश्वरी की आराधना, स्थानीय देवी-देवताओं के सम्मान और जनजातीय परंपराओं के संरक्षण को समर्पित है।
करीब 75 दिनों तक चलने वाला यह ऐतिहासिक पर्व अपने विशिष्ट पूजा-विधानों, विशाल काष्ठ रथ, पारंपरिक वाद्ययंत्रों, देवी-देवताओं की यात्राओं और ग्रामीण समुदायों की सक्रिय भागीदारी के कारण अलग पहचान रखता है। वर्ष 2026 में भी इस उत्सव को पारंपरिक गरिमा और भव्यता के साथ मनाया जा रहा है। इसकी शुरुआत 12 अगस्त को पाट जात्रा से हुई और निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 27 अक्टूबर को मावली माता की डोली की विदाई के साथ इसका समापन होगा।
सदियों पुराना इतिहास, बस्तर की पहचान से जुड़ा गौरवशाली पर्व
बस्तर दशहरा का इतिहास बस्तर की पुरानी राजपरंपराओं और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। इस पर्व की प्राचीनता को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक और लोक मान्यताएं प्रचलित हैं। बस्तर जिला प्रशासन के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, बस्तर के चालुक्य शासक पुरुषोत्तम देव ने जगन्नाथपुरी की तीर्थयात्रा की थी।
मान्यता है कि इस यात्रा के दौरान उन्हें 'रथपति' की उपाधि प्राप्त हुई। इसके बाद बस्तर में रथयात्रा की परंपरा को विशेष महत्व मिला। समय के साथ यही परंपरा बस्तर दशहरा के प्रमुख आकर्षणों में शामिल हो गई।
इस ऐतिहासिक पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि बदलते समय के बावजूद इसके मूल धार्मिक अनुष्ठान और सामुदायिक परंपराएं आज भी जीवित हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी समाज के विभिन्न वर्ग अपने पारंपरिक दायित्वों का निर्वहन करते आए हैं।
बस्तर दशहरा का इतिहास केवल राजाओं और राजमहलों तक सीमित नहीं रहा। इसमें वनांचल के गांवों, पारंपरिक पुजारियों, मांझी-चालकी, कारीगरों और स्थानीय जनजातीय समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यही सामूहिक भागीदारी इसे वास्तव में जन-जन का उत्सव बनाती है।
मां दंतेश्वरी के प्रति अटूट आस्था
बस्तर दशहरा का आध्यात्मिक केंद्र मां दंतेश्वरी हैं, जिन्हें बस्तर अंचल की आराध्य देवी माना जाता है। दंतेवाड़ा स्थित प्राचीन दंतेश्वरी मंदिर स्थानीय लोगों की गहरी धार्मिक आस्था का केंद्र है।
इस पर्व के विभिन्न अनुष्ठानों में मां दंतेश्वरी के प्रति श्रद्धा प्रमुख रूप से दिखाई देती है। देवी के पवित्र छत्र और डोली का पारंपरिक सम्मान, देवी-देवताओं का आमंत्रण और विशेष पूजा-विधान उत्सव को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करते हैं।
बस्तर के लोगों के लिए मां दंतेश्वरी केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता और सामुदायिक पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक भी हैं। पर्व के दौरान दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों से श्रद्धालु और पारंपरिक प्रतिनिधि जगदलपुर पहुंचते हैं। इस अवसर पर लोक आस्था और जनजातीय परंपराओं का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
पाट जात्रा: जिस अनुष्ठान से शुरू होती है 75 दिनों की यात्रा
बस्तर दशहरा का शुभारंभ हरेली अमावस्या के अवसर पर पाट जात्रा पूजा विधान से होता है। यह आयोजन विशेष रूप से रथ निर्माण की परंपरा से जुड़ा है। इसमें रथ निर्माण के लिए उपयोग किए जाने वाले काष्ठ और औजारों का पारंपरिक विधि से पूजन किया जाता है।
पाट जात्रा केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रकृति, लकड़ी, शिल्पकला और श्रम के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति है। विशाल रथ बनाने वाले पारंपरिक कारीगरों का योगदान इस उत्सव के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
वर्ष 2026 में 12 अगस्त को पाट जात्रा के साथ बस्तर दशहरा की शुरुआत हुई। इसके बाद डेरी गड़ाई, काछनगादी और अन्य पूजा-विधानों का क्रम आगे बढ़ा।
काछनगादी: एक बालिका से ली जाती है दशहरा मनाने की अनुमति
बस्तर दशहरा की सबसे अनोखी परंपराओं में काछनगादी पूजा का विशेष स्थान है। यह अनुष्ठान स्थानीय देवी काछनदेवी से अनुमति प्राप्त करने की प्राचीन मान्यता पर आधारित है। इस रस्म में पारंपरिक रूप से चयनित एक बालिका को देवी का स्वरूप माना जाता है। बेल के कांटों से बने आसन या झूले से जुड़ी इस पूजा में देवी की अनुमति प्राप्त करने की परंपरा निभाई जाती है।
यह अनुष्ठान बस्तर की लोक आस्था और स्त्री शक्ति के प्रति धार्मिक सम्मान को प्रकट करता है। यहां उत्सव की अनुमति लेने की परंपरा स्थानीय समाज की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को दर्शाती है। वर्ष 2026 में काछनगादी पूजा विधान 10 अक्टूबर को निर्धारित था।
जोगी बिठाई: नौ दिनों तक तपस्या की अनूठी परंपरा
बस्तर दशहरा का एक और महत्वपूर्ण अनुष्ठान जोगी बिठाई है। इस परंपरा में एक निर्धारित व्यक्ति विशेष स्थान पर नौ दिनों तक धार्मिक साधना करता है। इस तपस्या का उद्देश्य बस्तर दशहरा के सभी अनुष्ठानों का निर्विघ्न संपन्न होना माना जाता है।
जोगी बिठाई की परंपरा जगदलपुर के सिरासार भवन से जुड़ी है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, साधना करने वाला व्यक्ति पर्व की सफलता और क्षेत्र की मंगलकामना के लिए विशेष धार्मिक अनुशासन का पालन करता है।
यह अनुष्ठान बस्तर दशहरा के आध्यात्मिक पक्ष को उजागर करता है। श्रद्धा, संयम और सामुदायिक कल्याण की भावना इसके मूल में दिखाई देती है।
विशाल रथयात्रा: जब हजारों हाथ एक साथ खींचते हैं आस्था का रथ
बस्तर दशहरा की सबसे भव्य और आकर्षक पहचान इसकी ऐतिहासिक रथयात्रा है। विशाल लकड़ी के रथ का निर्माण पारंपरिक कारीगरों द्वारा किया जाता है। रथ के अलग-अलग हिस्सों को तैयार करने से लेकर उसकी सजावट और परिक्रमा तक अनेक समुदायों की भूमिका होती है।
रथ को खींचने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र होते हैं। नगाड़ों की गूंज, पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि, देवी के जयकारे और विशाल जनसमूह की सहभागिता पूरे वातावरण को उत्सवमय बना देती है।
यह रथ केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि सामूहिक श्रम और पारंपरिक तकनीकी कौशल की अद्भुत मिसाल भी है। भारी-भरकम रथ का निर्माण और उसका संचालन बताता है कि बस्तर के पारंपरिक कारीगरों के पास पीढ़ियों से संचित विशेष ज्ञान और अनुभव है।
रथ परिक्रमा के दौरान जगदलपुर की सड़कें सांस्कृतिक उत्सव के रूप में दिखाई देती हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले लोगों के लिए यह अनुभव बस्तर की समृद्ध लोक संस्कृति को करीब से जानने का अवसर बनता है।
मावली परघाव: जब देवी के आगमन से भक्तिमय हो उठता है जगदलपुर
बस्तर दशहरा में मावली परघाव एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है। इस अवसर पर दंतेवाड़ा से आने वाली मां दंतेश्वरी की डोली और पवित्र छत्र का पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ स्वागत किया जाता है। इस अनुष्ठान में बस्तर की ऐतिहासिक राजपरंपरा और जनजातीय धार्मिक आस्था एक साथ दिखाई देती हैं। पारंपरिक वेशभूषा, वाद्ययंत्रों और पूजा-विधानों के बीच देवी का स्वागत किया जाता है।
मावली परघाव का आयोजन यह दर्शाता है कि बस्तर के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित देवी-देवताओं और स्थानीय धार्मिक परंपराओं के बीच कितना गहरा संबंध है। वर्ष 2026 में यह अनुष्ठान 20 अक्टूबर को निर्धारित है।
भीतर रैनी और बाहर रैनी: रथ से जुड़ी अद्भुत परंपरा
बस्तर दशहरा की भीतर रैनी और बाहर रैनी रस्में अपनी विशिष्टता के कारण विशेष आकर्षण का केंद्र रहती हैं। इन दोनों अनुष्ठानों का संबंध विशाल रथ की परिक्रमा और उससे जुड़ी पारंपरिक मान्यताओं से है।
बाहर रैनी की रस्म में रथ को प्रतीकात्मक रूप से ले जाने और बाद में वापस लाने की परंपरा प्रसिद्ध है। इस अनुष्ठान में स्थानीय समुदायों की विशेष भूमिका रहती है। यह परंपरा बस्तर के धार्मिक इतिहास और सामुदायिक संबंधों को जीवंत बनाए रखती है।
वर्ष 2026 में 21 अक्टूबर को भीतर रैनी और 22 अक्टूबर को बाहर रैनी के पूजा-विधान निर्धारित किए गए हैं।
मुरिया दरबार: जहां जनजातीय समाज की आवाज को मिलता है मंच
बस्तर दशहरा का मुरिया दरबार केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जनसंवाद की एक ऐतिहासिक परंपरा है। इसमें बस्तर के पारंपरिक प्रतिनिधि, मांझी-चालकी और विभिन्न समुदायों के प्रमुख शामिल होते हैं। ऐतिहासिक रूप से यह दरबार राजसत्ता और जनजातीय समाज के बीच संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। समय के साथ इसका स्वरूप बदला, लेकिन समाज के प्रतिनिधियों की भागीदारी की परंपरा बनी रही।
मुरिया दरबार बस्तर की सामुदायिक व्यवस्था, सामाजिक संबंधों और पारंपरिक नेतृत्व प्रणाली को समझने का विशेष अवसर भी प्रदान करता है। यही कारण है कि इसका महत्व धार्मिक आयोजन से कहीं अधिक व्यापक है।
वर्ष 2026 का मुरिया दरबार विशेष महत्व रखता है। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 23 अक्टूबर को जगदलपुर में मुरिया दरबार आयोजित होगा। छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के निमंत्रण पर इस आयोजन में शामिल होने का आमंत्रण स्वीकार किया है। उनकी प्रस्तावित उपस्थिति से बस्तर की ऐतिहासिक संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान मिलने की उम्मीद है।
जनजातीय समाज की भागीदारी ही पर्व की सबसे बड़ी शक्ति
बस्तर दशहरा की वास्तविक पहचान इसकी सामूहिक सहभागिता है। इस आयोजन में मांझी-चालकी, मेम्बर-मेम्बरीन, पुजारी, गायता, पटेल, नाईक-पाईक, कारीगर और सेवादार अपनी निर्धारित पारंपरिक भूमिकाएं निभाते हैं।
पर्व के विभिन्न अनुष्ठानों में अलग-अलग समुदायों की सहभागिता बस्तर की सामाजिक संरचना की विशेषता को सामने लाती है। कोई रथ निर्माण में योगदान देता है, कोई पूजा-विधान संपन्न कराता है, तो कोई देवी-देवताओं के पारंपरिक स्वागत और यात्राओं की जिम्मेदारी निभाता है।
यहां लोक संस्कृति केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि लोगों के दैनिक जीवन, सामाजिक दायित्व और सामुदायिक रिश्तों का हिस्सा है। बस्तर दशहरा का आयोजन इसी जीवंत परंपरा का उदाहरण है।
वर्ष 2026 में भव्य आयोजन के लिए विशेष तैयारियां
विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा को पारंपरिक गरिमा के साथ आयोजित करने के उद्देश्य से प्रशासन और दशहरा समिति ने इस वर्ष विशेष तैयारियों पर जोर दिया है। 8 सितंबर 2026 को कलेक्टोरेट के प्रेरणा कक्ष में बस्तर सांसद एवं दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप की अध्यक्षता में महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इसमें बस्तर राजपरिवार के कमलचंद भंजदेव, कलेक्टर आकाश छिकारा, पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा, पारंपरिक प्रतिनिधियों, पुजारियों और संबंधित अधिकारियों ने हिस्सा लिया।
बैठक में पूजा स्थलों की व्यवस्था, स्वच्छता, पेयजल, प्रकाश, सुरक्षा, यातायात प्रबंधन और श्रद्धालुओं की सुविधाओं को लेकर चर्चा की गई। आयोजन की ऐतिहासिक परंपराओं को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक सुविधाओं के बेहतर समन्वय पर जोर दिया गया।
यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर सूची में स्थान दिलाने की पहल
बस्तर दशहरा के सांस्कृतिक महत्व को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक पहचान दिलाने की दिशा में भी पहल की जा रही है। सितंबर 2026 में हुई दशहरा समिति की बैठक में इस ऐतिहासिक उत्सव को यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल कराने का संकल्प सामने आया।
इस पहल का महत्व इसलिए भी है क्योंकि बस्तर दशहरा केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। इसमें लोक परंपराएं, मौखिक इतिहास, शिल्प कौशल, पारंपरिक सामाजिक संस्थाएं और जनजातीय समुदायों का सांस्कृतिक ज्ञान शामिल है। हालांकि यूनेस्को की सूची में शामिल किए जाने का संकल्प और वास्तविक मान्यता मिलना दो अलग प्रक्रियाएं हैं। फिलहाल इसे सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में प्रस्तावित प्रयास के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने बताया जनजातीय संस्कृति की अनुपम विरासत
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने बस्तर दशहरा को छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति, आस्था और सामूहिक सहभागिता की अनुपम विरासत बताया है। 8 अक्टूबर 2026 को मुख्यमंत्री निवास में बस्तर सांसद महेश कश्यप के नेतृत्व में बस्तर दशहरा समिति के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से मुलाकात की और उन्हें आयोजन में शामिल होने का आमंत्रण दिया।मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर दशहरा सदियों पुरानी आस्था, समृद्ध जनजातीय संस्कृति और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। उन्होंने इस सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन के प्रति राज्य सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। इस अवसर पर प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री को पारंपरिक पागा पहनाकर सम्मानित भी किया।
सांस्कृतिक पर्यटन और स्थानीय पहचान को मिलती है मजबूती
बस्तर दशहरा स्थानीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार के साथ पर्यटन की संभावनाओं को भी मजबूत करता है। इस अवसर पर बस्तर की लोककला, पारंपरिक वेशभूषा, वाद्ययंत्रों और स्थानीय शिल्प को व्यापक पहचान मिलती है।
देश-दुनिया से आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं को यहां की सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक पूजा पद्धतियों और सामुदायिक जीवन को करीब से देखने का अवसर मिलता है। विशेष रूप से स्थानीय कारीगरों और परंपरागत शिल्प से जुड़े समुदायों के लिए यह पर्व अपनी कला को सामने लाने का महत्वपूर्ण माध्यम बनता है। साथ ही नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों की परंपराओं से परिचित कराने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
केवल उत्सव नहीं, छत्तीसगढ़ की जीवंत सांस्कृतिक विरासत
बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहां आस्था और सामाजिक सहभागिता एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। देवी की पूजा के साथ प्रकृति के प्रति सम्मान, पारंपरिक कारीगरों के कौशल, ग्रामीण समाज की भूमिका और जनजातीय संस्कृति का गौरव इस उत्सव में समाहित है।
आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव और बदलती जीवनशैली के बीच भी बस्तर के लोगों ने अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखा है। पाट जात्रा से लेकर काछनगादी, जोगी बिठाई, रथयात्रा, मावली परघाव और मुरिया दरबार तक हर अनुष्ठान अपनी अलग पहचान और ऐतिहासिक महत्व रखता है।
बस्तर दशहरा केवल 75 दिनों का धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों की आस्था, सामूहिक श्रम, सांस्कृतिक स्मृतियों और जनजातीय अस्मिता की जीवंत अभिव्यक्ति है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहरों में इसका स्थान अत्यंत विशिष्ट है। यह पर्व आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने और विश्व के सामने बस्तर की समृद्ध पहचान प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है।