Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए पति की तलाक याचिका स्वीकार कर ली है। हाईकोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के बीच लगातार झगड़े, गंभीर अविश्वास, अपमानजनक व्यवहार और पारिवारिक संबंधों में तनाव को समग्र रूप से देखने पर मानसिक क्रूरता का मामला बन सकता है। जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने जगदलपुर फैमिली कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए पति को मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक की मंजूरी दे दी।
जानकारी के अनुसार, मामला जगदलपुर निवासी एक बिजली मैकेनिक और उसकी पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। दोनों की शादी वर्ष 2017 में हुई थी। शादी के कुछ समय बाद ही पति-पत्नी के संबंधों में तनाव उत्पन्न होने लगा। पति ने आरोप लगाया कि पत्नी उसके साथ लगातार गाली-गलौज और मारपीट करती थी। इतना ही नहीं, कम कमाई को लेकर उसे ताने मारती थी और 'भिखारी' कहकर अपमानित करती थी। पति का आरोप था कि पत्नी उसके चरित्र पर भी संदेह करती थी। इसके अलावा वह उस पर अपनी मां से अलग रहने का दबाव बनाती थी। इन परिस्थितियों के कारण घर में लगातार विवाद होते थे और उनका वैवाहिक जीवन प्रभावित हो रहा था। पति ने अदालत में दावा किया कि पत्नी के व्यवहार से उसे मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ा।
वहीं, पत्नी ने पति द्वारा लगाए गए सभी आरोपों को गलत बताया। उसने अपने पक्ष में कहा कि पति और उसके परिवार के सदस्यों द्वारा उसके साथ दुर्व्यवहार किया जाता था। दोनों पक्षों के बीच विवाद बढ़ने के बाद मामला न्यायालय तक पहुंच गया। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(क) के तहत मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक की मांग करते हुए जगदलपुर फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने 10 दिसंबर 2022 को उसकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद पति ने इस फैसले को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के तर्कों, गवाहों के बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण किया गया। डिवीजन बेंच ने पाया कि पति-पत्नी के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा था। दोनों के बीच विश्वास की कमी थी और परिवार के सदस्यों के साथ संबंध भी तनावपूर्ण बने हुए थे। न्यायालय ने कहा कि वैवाहिक जीवन में होने वाले सामान्य मतभेदों या छोटी-मोटी कहासुनी को सीधे मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। इसके लिए पति-पत्नी के संपूर्ण व्यवहार और वैवाहिक परिस्थितियों का आकलन करना आवश्यक है।
इस मामले में अदालत ने पाया कि लगातार विवाद, आपसी अविश्वास और पारिवारिक तनाव का संयुक्त प्रभाव सामान्य वैवाहिक अनबन से अधिक गंभीर था। अदालत के अनुसार, इन परिस्थितियों ने पति को ऐसी मानसिक परेशानी पहुंचाई, जिसे क्रूरता के आधार के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। हालांकि, हाईकोर्ट ने पति की ओर से लगाए गए सभी आरोपों को प्रमाणित नहीं माना। गर्भपात, आत्महत्या की धमकी और कुछ अन्य व्यक्तिगत आरोपों के संबंध में पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं होने के कारण अदालत ने उन्हें मानसिक क्रूरता का स्वतंत्र आधार नहीं माना।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी एक आरोप या घटना के आधार पर निर्णय लेने के बजाय पूरे वैवाहिक जीवन की परिस्थितियों का मूल्यांकन करना जरूरी है। इस मामले में गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्यों से लगातार विवाद तथा संबंधों में गंभीर तनाव की पुष्टि हुई। डिवीजन बेंच ने यह भी माना कि फैमिली कोर्ट उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों के संयुक्त प्रभाव का उचित मूल्यांकन नहीं कर पाया था। इसी कारण हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करना आवश्यक समझा।
अंततः हाईकोर्ट ने पति की अपील स्वीकार करते हुए 10 दिसंबर 2022 को जगदलपुर फैमिली कोर्ट द्वारा पारित आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने मानसिक क्रूरता के आधार पर पति को तलाक की डिक्री प्रदान की। यह फैसला स्पष्ट करता है कि वैवाहिक संबंधों में लगातार अपमानजनक व्यवहार, गंभीर अविश्वास और लंबे समय तक चलने वाले विवादों का संयुक्त प्रभाव मानसिक क्रूरता के निर्धारण में महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि, हर वैवाहिक विवाद में तलाक का निर्णय संबंधित मामले के तथ्यों और साक्ष्यों पर निर्भर करेगा।
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