धान की फसल में कीट प्रबंधन के लिए कृषि विज्ञान केंद्र की महत्वपूर्ण सलाह

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Update: 2026-07-31 16:58 GMT
Narayanpur. नारायणपुर। खरीफ सीजन में धान की फसल विभिन्न प्रकार के कीटों के प्रकोप से प्रभावित होती है, जिससे उत्पादन के साथ-साथ धान की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस समस्या से किसानों को बचाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), नारायणपुर ने वैज्ञानिक सलाह जारी करते हुए कहा है कि किसान केवल रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भर न रहें, बल्कि जैविक एवं प्राकृतिक खेती आधारित एकीकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम) को अपनाएं। केंद्र ने किसानों को सलाह दी है कि खेत में कीट दिखाई देने पर तुरंत
दवा का छिड़काव
करने के बजाय पहले नियमित निरीक्षण करें और आर्थिक क्षति स्तर (ईटीएल) के आधार पर ही नियंत्रण के उपाय करें। इससे फसल उत्पादन सुरक्षित रहेगा, खेती की लागत कम होगी, पर्यावरण संरक्षण होगा तथा लाभकारी कीटों और प्राकृतिक शत्रुओं का भी संरक्षण संभव होगा। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने बताया कि धान की फसल में मुख्य रूप से तना छेदक, गंगई (राइस गॉल मिज), भूरा माहू (ब्राउन प्लांट हॉपर) तथा धान का पैनिकल माइट जैसे कीट नुकसान पहुंचाते हैं। इन कीटों की समय पर पहचान और वैज्ञानिक तरीके से नियंत्रण करने पर फसल को भारी नुकसान से बचाया जा सकता है।
तना छेदक की सूंडियां धान के तने के भीतर प्रवेश कर पौधे को अंदर से खोखला कर देती हैं। प्रारंभिक अवस्था में पौधे की मध्य पत्ती सूख जाती है जिसे डेड हार्ट कहा जाता है। बाद में बालियां निकलने पर वे सफेद एवं खाली रह जाती हैं, जिसे व्हाइट ईयर कहा जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यदि खेत में लगभग 5 प्रतिशत डेड हार्ट अथवा 2 प्रतिशत व्हाइट ईयर दिखाई दें तो तुरंत नियंत्रण उपाय शुरू कर देना चाहिए। इसके लिए प्रभावित पौधों को निकालकर नष्ट करना, ट्राइकोग्रामा जैपोनिकम जैसे जैव परजीवी का उपयोग करना, फेरोमोन ट्रैप लगाना, 5 प्रतिशत नीम बीज कर्नेल अर्क अथवा अजादिरैक्टिन का छिड़काव करना तथा नाइट्रोजन उर्वरक का संतुलित उपयोग करना प्रभावी उपाय हैं। अत्यधिक प्रकोप होने पर ही अनुशंसित रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग करना चाहिए। गंगई कीट के प्रकोप से धान के पौधों में सामान्य पत्तियों के स्थान पर चांदी जैसी नलीनुमा संरचना विकसित होती है जिसे सिल्वर शूट कहा जाता है। ऐसे पौधों में सामान्य बालियां विकसित नहीं हो पातीं। कृषि विज्ञान केंद्र ने बताया कि प्रति वर्ग मीटर एक सिल्वर शूट अथवा लगभग 5 प्रतिशत सिल्वर शूट दिखाई देने पर नियंत्रण आवश्यक है। किसानों को प्रतिरोधी किस्मों का चयन, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, 5 प्रतिशत नीम घोल का छिड़काव, प्राकृतिक शत्रुओं का संरक्षण तथा उचित फसल चक्र अपनाने की सलाह दी गई है। आवश्यकता पड़ने पर ही अनुशंसित रासायनिक नियंत्रण अपनाने को कहा गया है।
भूरा माहू धान के पौधों के तने के निचले भाग से रस चूसता है। अधिक प्रकोप होने पर पौधे सूख जाते हैं और ष्हॉपर बर्नष् की स्थिति बन जाती है। यदि प्रति पौधा 10 से 20 कीट दिखाई दें तो नियंत्रण उपाय शुरू कर देना चाहिए। इसके लिए खेत से 3-4 दिनों तक पानी निकालना, नाइट्रोजन उर्वरक का संतुलित उपयोग, मिरिड बग एवं मकड़ियों जैसे प्राकृतिक शत्रुओं का संरक्षण, लाइट ट्रैप का उपयोग तथा नीम आधारित जैव उत्पादों का प्रयोग करने की सलाह दी गई है। वैज्ञानिकों ने अनावश्यक कीटनाशकों के प्रयोग से बचने की भी सलाह दी है क्योंकि इससे प्राकृतिक शत्रु नष्ट हो जाते हैं और माहू का प्रकोप और बढ़ सकता है। धान का पैनिकल माइट मुख्य रूप से बालियों को प्रभावित करता है, जिससे दानों के भराव में कमी आती है और उपज के साथ-साथ गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। इसके नियंत्रण के लिए प्रमाणित एवं स्वस्थ बीज का उपयोग, खेत का नियमित निरीक्षण, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, खेत की स्वच्छता, प्राकृतिक शत्रुओं का संरक्षण तथा संक्रमित फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन करने की सलाह दी गई है। अधिक प्रकोप होने पर ही अनुशंसित रासायनिक दवा का प्रयोग करने की अनुशंसा की गई है। कृषि विज्ञान केंद्र, नारायणपुर ने किसानों से अपील की है कि वे सप्ताह में कम से कम एक बार अपने खेत का निरीक्षण अवश्य करें। खेत में कीटों की संख्या, प्राकृतिक शत्रुओं की उपस्थिति तथा फसल को हुई वास्तविक क्षति का आकलन करने के बाद ही नियंत्रण का निर्णय लें। केंद्र ने कहा है कि पहचान, निगरानी, ईटीएल का आकलन, जैविक एवं प्राकृतिक नियंत्रण, आवश्यकता आधारित उपचार का सिद्धांत अपनाकर किसान उत्पादन लागत कम कर सकते हैं, पर्यावरण एवं जैव विविधता का संरक्षण कर सकते हैं तथा सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण एवं अधिक उत्पादन वाली धान की फसल प्राप्त कर सकते हैं।
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