रायपुर। राजनांदगांव निवासी जनता से रिश्ता के पाठक रोशन साहू 'मोखला' ने कविता ई मेल किया है।
कितनी और कुचली जाएँगी, मासूमियत छीन ली जाएगी।
यह दुष्कर्म,दरिंदगी,वहशीपन, कब तक लील ली जाएगी।।
दो-चार बरस की उम्र महज,वह क्या जाने दुनिया -दारी।
जिन पर बीती उन लम्हों को, कभी कलम न लिख पाएगी।।
अस्पताल कोलकाता का तो, उत्तर बिहार का खेत कहीं।
होटल-रेस्तरां राजधानी का तो, राजस्थान का रेत कहीं।।
गिने न जाते घाव इतने, कभी पत्थर से कुचली जाती।
माँ-पापा की लाडली 'लाडो', निष्प्राण कहीं,अचेत कहीं।।
गरीब, दलित बेटियाँ अक्सर, होतीं उनके आसान शिकार।
गुनाह महज न मानो इसको, है सभ्यता पर प्रत्यक्ष प्रहार।।
निन्दा करने व दीप जलाने से, क्या बच पाईं नन्हीं परियाँ?
प्रतिरोधों से न बात बनेगी, लेना होगा जड़ उखाड़ प्रतिकार।।
मानवता के बने जो दुश्मन, समझो न बस यह दुराग्रह है।
आंकड़ों का आईना सचमुच, सोच से अधिक भयावह है।।
होतीं शिकार देश में हर दिन, जब सौ से ज्यादा नाबालिग।
तब सजा मिले चीन-अरब के जैसी, मन में न पूर्वाग्रह है।।
कहाँ-कहाँ हो रहा है हमला, स्कूल-विश्वविद्यालय में।
कुचली जातीं झाड़ी के पीछे,फेंक दी जातीं जलाशय में।।
हमारी बातें बस बड़ी-बड़ी,बहती नित अश्रुओं की लड़ी।
नहीं सुरक्षित बेटियाँ क्यों, अब माँ के ही गर्भाशय में।।
भरोसे के नाम पर भेड़िए, तन-मन नोच खा जाते हैं।
जला देते तेजाब से चेहरे, तन के टुकड़े कर जाते हैं।।
दरिंदगी का रूप नया है, अमानवीयता की हद से ज्यादा।
अब सौदाबाजी अंगों की, मानव तस्करी कर जाते हैं।।
पंगुपन इतना आया कैसे,खामोशियाँ इतनी छायी क्यों?
न्याय की देवी को भी न्याय में, इतनी देरी भायी क्यों?
क्यों प्राथमिकी में आनाकानी, मेडिकल समय पर नहीं?
निर्दोष नयनों की बेबसी, कोई देखे नही रुलायी क्यों?
कामातुर पिशाच अंधों को, बेटियाँ लगतीं क्यों तितली?
उन आँखों में देख मासूमियत, आत्मा नहीं क्यों पिघली?
बुद्धिजीवियों की सुनो कहनी,'ऐसे-वैसे कपड़े थी पहनीं।'
संवेदनहीनता की हद देखिए, 'रात को बाहर क्यों निकली?'
ऐसे प्रश्न उठने से पीड़िता, कई-कई बार मर जाती है।
डर,शर्म बदनामी के कारण,अनगिनत चुप रह जाती हैं।
सौ में तीन को सजा मिले,फिर कानून का डर क्या होगा?
उच्छृंखलता, उद्दंडता, पागलपन, रग-रग में भर जाती है।।
मुँह फेरते हम तो सदा ही,'यह तो मेरे घर की बात नहीं।'
कोई चॉकलेट-टॉफी हाथ धरे, बैठे लगाए हों घात कहीं।।
ऐसी घटना जहाँ कहीं घटे, मानो वास्ता है सबका सबसे।
होगा न वरना कभी सबेरा, ठहर जाए न यह रात कहीं।।