Raipur. रायपुर। नवीन अपराधिक कानूनों में पीड़ित/ पीड़िता/ केंन्द्रित पुलिसिंग को न्यायिक प्रक्रिया का अधार मान गया है। इसके अतिरिक्त मानः सर्वोच्य न्यायालय द्वारा मानव तस्करी के संबंध में कई महत्वपूर्ण निर्णय पारित किए गये है। इस परिपेक्ष्य में आज पुलिस महानिदेशक अरूण देव गौतम के भापुसे के मार्गदर्शन में मानव तस्करी विषय पर एकदिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला का आयोजन पुलिस मुख्यालय, नवा रायपुर में किया गया। कार्यक्रम के उद्घाटन अवसर पर आमंत्रित अतिथियों का स्वागत उप पुलिस महानिरीक्षक, सीआईडी रामकृष्ण साहू ने प्रतीक चिन्ह एवं पुष्पगुच्छ देकर किया। स्वागत उपरांत पुलिस महानिदेशक अरूण देव गौतम ने अपने उद्बोधन में कहा कि थाना स्तर तक इस कार्यशाला का उद्देश्य पहुंचे, यह हमारी मंशा है। मानव तस्करी के प्रकरणों में कार्यवाही केवल पुलिस विभाग से संबंधित नहीं है।
अपितु अन्य विभागों की भी भूमिका होती है। कार्यशाला में भाग ले रहे अधिकारियों से उन्होने आह्वान किया कि प्रशिक्षण के माध्यम से यह समझें कि मानव तस्करी क्या होती है। मानव तस्करी के अपराध में व्यक्ति का अनेक प्रकार का शोषण जैसे बंधुआ मजदूर बनाकर काम कराना, लैंगिक उत्पीड़न, भीख मंगवाना, घरेलू कार्यों में नियोजित किया जाता है। कार्यशाला के प्रथम सत्र की शुरूआत सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी एवं एनडीआरएफ के सेवानिवृत्त महानिदेशक तथा देश में मानव तस्करी की रोकथाम में विशेषज्ञ माने जाने वाले डॉ. पी.एम. नायर द्वारा प्रस्तुतिकरण देकर किया गया। इस दौरान उन्होने मानव तस्करी के विभिन्न पहलुओं के बारे में प्रतिभागियों को गहराई से समझाते हुए इसके रोकथाम हेतु किये जाने वाले उपायों पर प्रकाश डाला।
उन्होने कहा कि पुलिस को अपराध की सूचना मिलने का इंतजार करने के बजाय स्वयं घटनास्थल तक पहुँचना चाहिए, क्योंकि हो सकता है कि अपराध की सूचना पुलिस को न दी गई हो। अतः प्रकरण की सही तरीके से सभी पहलुओं की जाँच किया जाये, जिसमें स्रोत, पारगमन और गंतव्य क्षेत्रों में जाँच शामिल हो। साथ ही अपराध में शामिल सभी अपराधियों के विरुद्ध साक्ष्य एकत्रित करें, जिनमें निगरानी करने वाले, भर्ती करने वाले, परिवहनकर्ता, बेचने वाले, खरीदने वाले, वित्तपोषक, ग्राहक, साजिशकर्ता तथा उनके साथ इस पूरे नेटवर्क में शामिल अन्य सभी व्यक्ति हों। द्वितीय सत्र में जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (श्रत्ब्) के राष्ट्रीय सचिव ओमप्रकाश पाल एवं माननीय सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता व जे.आर.सी की प्रमुख विधि सलाहकार रचना त्यागी द्वारा मानव तस्करी में ऑनलाईन भर्ती और शोषण में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के समक्ष चुनौतियों विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि मानव तस्करी अब किसी बिचौलिए से नहीं, बल्कि एक ऑनलाईन संदेश से शुरू होती है जैसे भर्ती, सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप्स, गेमिंग प्लेटफार्म और जॉब पोर्टल आदि।
यह प्रक्रिया ऑनलाइन भर्ती से शुरू होकर विश्वास जीतने और नियंत्रण स्थापित करने, फिर आवागमन, शोषण तथा लाभ कमाने और नेटवर्क का विस्तार करने तक चलती है। वही नेटवर्क नए ऑनलाइन पहचान-चिह्नों के साथ बार-बार लौटता है, ताकि अगले व्यक्ति को निशाना बना सकें। ऐसे मामलों में केवल यह जाँच न करें कि बच्चे को कौन ले गया, बल्कि यह भी जाँच करें कि बच्चे की भर्ती किसने की, उसे किसने एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाया, उस पर किसने नियंत्रण रखा, उससे किसने लाभ कमाया और अगली बार भर्ती करने की तैयारी कौन कर रहा है और विशेष रूप से डिजिटल प्लेटफार्म पर निगरानी रखने की आवश्यकता है।
कार्यशाला के तृतीय सत्र के विषय विशेषज्ञ विपिन ठाकुर ने समय पर मानव तस्करी के संभावित पीड़ितों की पहचान कर त्वरित एवं प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने पर जोर डालते हुए कहा कि रेस्क्यू के बाद चिकित्सा सहायता, सुरक्षित आश्रय, मनोसामाजिक सहयोग, विधिक सहायता और दीर्घकालिक पुनर्वास सुनिश्चित करना आवश्यक हैै। कार्यशाला के अगले चरण में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एवं पूर्व केन्द्रीय सचिव बी. भामती सुब्रमणियम द्वारा पीड़ितों की सुरक्षा से लेकर उत्तरजीवियों के सशक्तीकरण व डिजिटल युग में मानव तस्करी के प्रति आघात-संवेदनशील दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला गया। महिला एवं बाल विकास विभाग की अपर संचालक अर्चना राणा सेठ एवं श्रम विभाग के सहायक श्रमायुक्त द्वारा मानव तस्करी के पीड़ितों के पुनर्वास हेतु राज्य में लागू योजनाओं के बारे विस्तृत जानकारी दी गई। कार्यशाला में पुलिस विभाग के एन्टी ह्यूमेन ट्रेफिकिंग यूनिट के नोडल व अन्य अधिकारी, श्रम विभाग, महिला एवं बाल विकास, अभियोजन तथा शिक्षा विभाग के अधिकारियों सहित कुल 139 प्रतिभागियों ने भाग लेकर इस प्रशिक्षण का लाभ उठाया। कार्यशाला की अनुशंसाएं तथा अतिथियों के प्रति आभार प्रदर्शन सहायक पुलिस महानिरीक्षक रवि कुमार कुर्रे ने किया।