बैगा ने आधी रात गांव बांधने की परंपरा निभाई, सवनाही परंपरा के बारे में जानिए
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भिलाई। रात के करीब 12 बज चुके थे और पूरा गांव सो रहा था, लेकिन शीतला माता मंदिर में बैगा, बुजुर्ग और ग्रामीण पूजा के लिए इकट्ठा थे। पूजा के बाद सभी नारियल और पूजन सामग्री लेकर गांव की चारों दिशाओं की ओर निकले, जबकि बाकी लोग घरों के भीतर ही रहे।
इस दौरान घरों के बाहर दीवार पर गोबर से निशान भी बनाए गए। ग्रामीणों को सिर्फ कोटवार के हांका लगाने का इंतजार था, जिससे गांव बांधे जाने की सूचना मिलती है। दुर्ग जिले के ग्राम कचांदुर में हर साल की तरह सवनाही (गांव बांधने) की परंपरा निभाई गई। मान्यता है कि इस पूजा से गांव पर देवी-देवताओं का आशीर्वाद रहता है और बीमारी, महामारी और प्राकृतिक आपदा दूर रहती है।
ग्राम पंचायत कचांदुर के सरपंच कीर्तन साहू बताते हैं कि गांव बांधने की शुरुआत सावन लगने से पहले शनिवार और रविवार की आधी रात को होती है। सबसे पहले शीतला माता मंदिर में पूजा होती है। इसके बाद बैगा गांव के बुजुर्गों के साथ गांव की चारों दिशाओं में जाते हैं। वहां छोटे-छोटे गड्ढे खोदकर नारियल, चावल, अगरबत्ती और दूसरी पूजा की सामग्री चढ़ाई जाती है। गांव की सीमा और देवी-देवताओं के स्थान पर भी पूजा होती है। कीर्तन साहू कहते हैं, यह परंपरा हमें हमारे बुजुर्गों से मिली है। गांव में सुख-शांति बनी रहे, किसी तरह का नुकसान न हो और पूरा गांव सुरक्षित रहे, इसी कामना के साथ यह पूजा की जाती है।