हिमाचल सड़क परिवहन निगम (HRTC) के ऐतिहासिक पठानकोट डिपो को बुनियादी ढांचे की कमी, अपनी जगह को लेकर अनिश्चितता और पुरानी बसों के बेड़े जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इससे अंतर-राज्यीय और स्थानीय मार्गों पर सार्वजनिक परिवहन सेवाओं की विश्वसनीयता को लेकर चिंताएं पैदा हो गई हैं। नूरपुर से लगभग 25 किमी दूर स्थित यह डिपो, राज्य के बाहर HRTC का एकमात्र चालू डिपो है।
यह निगम के अंतर-राज्यीय और अंतर-जिला परिवहन नेटवर्क में एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में काम करता है। हालांकि, रेलवे की जमीन पर स्थित होने के कारण इस डिपो का विस्तार और आधुनिकीकरण नहीं हो पाया है, जबकि बसों और कर्मचारियों की कमी ने सेवाओं को प्रभावित किया है। इस डिपो का इतिहास 1943 से जुड़ा है, जब 'कुल्लू वैली ट्रांसपोर्ट कंपनी' ने लाहौर में हुए एक 100 साल के समझौते के तहत भारतीय रेलवे से जमीन लीज पर ली थी।
बंटवारे के बाद, इस कंपनी का विलय पंजाब सरकार द्वारा स्थापित 'मंडी कुल्लू रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन' (MKRTC) में कर दिया गया। 2 अक्टूबर 1974 को अस्तित्व में आए HRTC ने अगस्त 1975 में अपना पठानकोट डिपो स्थापित किया। रेलवे की जमीन पर डिपो के कब्जे को लेकर 2023 में संकट खड़ा हो गया, जब नॉर्दर्न रेलवे ने पानी और बिजली की आपूर्ति काट दी और डिपो को खाली करने के लिए कहा। HRTC ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां से उन्हें स्टे (रोक) मिल गया, जिससे निगम को बिजली और पानी की आपूर्ति बहाल करने की अनुमति मिल गई।
स्थायी जगह का मुद्दा आज भी अनसुलझा है।
HRTC पठानकोट डिपो के क्षेत्रीय प्रबंधक विजय चौधरी के अनुसार, यह यूनिट 80 मार्गों पर 100 बसें चलाती है, जिनमें 50 अंतर-राज्यीय सेवाएं शामिल हैं। यहां 148 ड्राइवर और 157 कंडक्टर हैं। इन 100 बसों में से 36 बसें 'जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनीकरण मिशन' (JNNURM) के तहत लाई गई थीं, जो अब कंडम (खराब/उपयोग के अयोग्य) हो रही हैं। इस डिपो के बेड़े में एक भी वोल्वो बस नहीं है। चौधरी ने बताया कि हाल ही में बेड़े में पांच इलेक्ट्रिक बसें शामिल की गई हैं, और डिपो में 20 इलेक्ट्रिक बसों को रखने की क्षमता है, जिससे विभिन्न मार्गों पर सेवाओं में सुधार किया जा सकता है। हालांकि, पुरानी होती बसें एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई हैं। 100 में से 70 बसों की "जीरो बुक" वैल्यू है, जिसका अर्थ है कि उनका मूल्य पूरी तरह से खत्म (डेप्रिसिएट) हो चुका है।
इसके बावजूद, ये बसें अभी भी चल रही हैं, खासकर स्थानीय मार्गों पर, जहां यात्रियों को अक्सर बसों के खराब होने और अन्य परेशानियों का सामना करना पड़ता है। 2017 से 2022 के बीच डिपो को कोई नई बस नहीं मिली है, जिससे पुरानी बसों को बदलने और भरोसेमंद सेवाएं बनाए रखने की चुनौती और बढ़ गई है। यह स्थिति बताती है कि परिसर से जुड़े विवाद का स्थायी समाधान निकालने, समय पर पुरानी बसों को बदलने और बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) को अपग्रेड करने की सख्त जरूरत है।
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