लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर में कमी, फिर भी बड़े राज्यों में कर्नाटक सबसे आगे
मंगलुरु : देश में माध्यमिक स्तर पर लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर में लगातार सुधार देखने को मिल रहा है, लेकिन कर्नाटक के लिए स्थिति अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है। सोमवार को लोकसभा में पेश किए गए ‘यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस’ (UDISE+) 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में राज्य में लड़कियों के ड्रॉपआउट रेट में कमी जरूर आई है, लेकिन इसके बावजूद कर्नाटक बड़े राज्यों में सबसे अधिक ड्रॉपआउट रेट वाले राज्यों में बना हुआ है।
UDISE+ के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, कर्नाटक में 2025-26 के दौरान सेकेंडरी स्कूल स्तर यानी कक्षा 9वीं और 10वीं में पढ़ने वाली 13.9 प्रतिशत लड़कियों ने पढ़ाई बीच में छोड़ दी। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत 8 प्रतिशत से काफी अधिक है। आंकड़ों से पता चलता है कि राज्य में सुधार हुआ है, लेकिन यह सुधार देश के अन्य बड़े राज्यों की तुलना में धीमा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो कर्नाटक में लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर में गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2023-24 में यह दर 19.6 प्रतिशत थी, जो 2024-25 में घटकर 14.6 प्रतिशत हो गई। इसके बाद 2025-26 में इसमें और कमी आई और यह 13.9 प्रतिशत तक पहुंच गई। हालांकि गिरावट के बावजूद राज्य अभी भी राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे है।
वहीं, पूरे देश में माध्यमिक स्तर पर लड़कियों की शिक्षा को लेकर स्थिति में सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है। राष्ट्रीय स्तर पर लड़कियों का ड्रॉपआउट रेट वर्ष 2023-24 में 12.6 प्रतिशत था, जो 2024-25 में घटकर 9.6 प्रतिशत हो गया। 2025-26 में यह और कम होकर 8 प्रतिशत रह गया। इससे स्पष्ट है कि देश के कई राज्यों में लड़कियों को स्कूल में बनाए रखने के प्रयासों का असर दिख रहा है।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, लड़कियों के स्कूल छोड़ने के पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक कारण हो सकते हैं। माध्यमिक स्तर पर पहुंचने के बाद कई छात्राओं को पढ़ाई जारी रखने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इनमें आर्थिक परेशानियां, घरेलू जिम्मेदारियां, स्कूल की दूरी, परिवहन की कमी और सामाजिक दबाव जैसे कारण शामिल हैं।
कर्नाटक जैसे बड़े और आर्थिक रूप से विकसित राज्य में भी माध्यमिक स्तर पर लड़कियों के ड्रॉपआउट की ऊंची दर सरकार और शिक्षा विभाग के लिए चिंता का विषय है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल स्कूलों में नामांकन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि छात्राएं अपनी पढ़ाई पूरी करें और उन्हें बीच में स्कूल छोड़ने की स्थिति का सामना न करना पड़े।
सरकार की ओर से लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इनमें छात्रवृत्ति, स्कूलों में सुविधाओं का विस्तार, मुफ्त पाठ्य सामग्री और सुरक्षित शिक्षा वातावरण उपलब्ध कराने जैसे कदम शामिल हैं। इसके बावजूद कुछ क्षेत्रों में इन योजनाओं का लाभ पूरी तरह से नहीं पहुंच पाने के कारण ड्रॉपआउट की समस्या बनी हुई है।
UDISE+ के आंकड़े यह भी संकेत देते हैं कि राज्यों के बीच लड़कियों की माध्यमिक शिक्षा को लेकर काफी अंतर मौजूद है। जहां कई राज्यों ने ड्रॉपआउट दर को तेजी से कम किया है, वहीं कुछ राज्यों में सुधार की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है। कर्नाटक का 13.9 प्रतिशत ड्रॉपआउट रेट इसी चुनौती को दर्शाता है।
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि लड़कियों को माध्यमिक शिक्षा तक बनाए रखने के लिए स्थानीय स्तर पर विशेष योजनाओं की जरूरत है। खासकर ग्रामीण और कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों की छात्राओं पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। स्कूलों में बेहतर सुविधाएं, महिला शिक्षकों की उपलब्धता और अभिभावकों में जागरूकता बढ़ाने से स्थिति में सुधार लाया जा सकता है।
कर्नाटक में पिछले तीन वर्षों के दौरान ड्रॉपआउट रेट में लगभग छह प्रतिशत अंकों की कमी आई है, जो सुधार का संकेत है। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे तेज सुधार को देखते हुए राज्य को अपनी रणनीतियों को और मजबूत करने की जरूरत है।
कुल मिलाकर, UDISE+ 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में लड़कियों की शिक्षा की स्थिति धीरे-धीरे बेहतर हो रही है, लेकिन माध्यमिक स्तर पर पढ़ाई छोड़ने की समस्या अभी भी कई राज्यों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। कर्नाटक की स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि स्कूल में प्रवेश के साथ-साथ छात्राओं की पढ़ाई पूरी होने तक लगातार निगरानी और सहयोग की जरूरत है।