बेंगलुरु : सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की उपलब्धता को लेकर सामने आए आंकड़ों ने कर्नाटक की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। 2025-26 की UDISE+ (यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस) रिपोर्ट के अनुसार, देश में सबसे अधिक एकल शिक्षक वाले सरकारी स्कूलों की संख्या वाले राज्यों की सूची में कर्नाटक चौथे स्थान पर है। राज्य में 8,042 ऐसे स्कूल हैं, जहां केवल एक शिक्षक के भरोसे पढ़ाई चल रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इन एकल शिक्षक वाले स्कूलों में लगभग 2.10 लाख छात्र अध्ययन कर रहे हैं। यानी हजारों बच्चों की शिक्षा व्यवस्था एक ही शिक्षक के जिम्मे है। यह स्थिति ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता और छात्रों को मिलने वाली सुविधाओं को लेकर चिंता बढ़ाती है।
आंकड़ों के अनुसार, पिछले शैक्षणिक वर्ष में कर्नाटक में एकल शिक्षक वाले स्कूलों की संख्या 7,349 थी। उस समय इन स्कूलों में करीब 2.23 लाख छात्र नामांकित थे। नए आंकड़ों में ऐसे स्कूलों की संख्या बढ़कर 8,042 हो गई है, हालांकि छात्रों की संख्या में कमी दर्ज की गई है।
देशभर की स्थिति पर नजर डालें तो एकल शिक्षक वाले स्कूलों की संख्या एक लाख से अधिक है। इनमें सबसे अधिक संख्या आंध्र प्रदेश में दर्ज की गई है, जहां 16,357 स्कूल ऐसे हैं जिनमें केवल एक शिक्षक कार्यरत है। इसके बाद झारखंड में 9,827 और महाराष्ट्र में 9,269 एकल शिक्षक वाले स्कूल हैं। कर्नाटक इस सूची में चौथे स्थान पर है।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, एक शिक्षक पर पूरे स्कूल की जिम्मेदारी होने से कई तरह की समस्याएं सामने आती हैं। एक ही शिक्षक को अलग-अलग कक्षाओं के छात्रों को पढ़ाने के साथ-साथ प्रशासनिक काम भी संभालने पड़ते हैं। इससे पढ़ाई के लिए मिलने वाला समय प्रभावित हो सकता है।
प्राथमिक और ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों की पर्याप्त संख्या को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अलग-अलग कक्षाओं के लिए अलग-अलग शिक्षक होने से छात्रों को बेहतर मार्गदर्शन मिलता है और उनकी सीखने की क्षमता में सुधार होता है। लेकिन एकल शिक्षक वाले स्कूलों में यह चुनौती बनी रहती है।
कर्नाटक में बड़ी संख्या में सरकारी स्कूल ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित होते हैं। कई स्कूल ऐसे इलाकों में हैं जहां शिक्षकों की नियुक्ति और लंबे समय तक पदों को भरना चुनौतीपूर्ण रहा है। दूरदराज के क्षेत्रों में तैनाती, खाली पद और स्थानांतरण नीतियों से जुड़े मुद्दे भी शिक्षक उपलब्धता को प्रभावित करते हैं।
UDISE+ रिपोर्ट देशभर के स्कूलों में छात्रों की संख्या, शिक्षकों की स्थिति, बुनियादी सुविधाओं और अन्य शैक्षणिक आंकड़ों को दर्ज करती है। यह रिपोर्ट शिक्षा नीति बनाने और स्कूलों की स्थिति का आकलन करने के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि एकल शिक्षक वाले स्कूलों की संख्या कम करने के लिए सरकार को शिक्षक भर्ती, पदों के पुनर्वितरण और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षकों की उपलब्धता बढ़ाने पर ध्यान देना होगा। साथ ही, यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात निर्धारित मानकों के अनुरूप रहे।
कर्नाटक में पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा क्षेत्र में कई योजनाएं लागू की गई हैं, लेकिन एकल शिक्षक वाले स्कूलों की बढ़ती संख्या एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। सरकार के सामने अब यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है कि सभी स्कूलों में पर्याप्त संख्या में शिक्षक उपलब्ध हों और छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके।
शिक्षाविदों का मानना है कि केवल स्कूलों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वहां जरूरी मानव संसाधन उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। एक शिक्षक पर अधिक जिम्मेदारी होने से छात्रों के व्यक्तिगत विकास और सीखने की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।
कर्नाटक के लिए यह आंकड़ा शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत को दर्शाता है। आने वाले समय में शिक्षक नियुक्तियों और स्कूलों में संसाधनों की उपलब्धता को लेकर सरकार की रणनीति पर सबकी नजर रहेगी।