एक पूर्व मुख्यमंत्री को निशाना बनाकर किए गए कथित स्टिंग ऑपरेशन को लेकर चल रहे विवाद ने राज्य सरकार और कांग्रेस पार्टी की छवि को एक बड़ा राजनीतिक झटका दिया है। कई मंत्रियों सहित वरिष्ठ नेता इस स्थिति से पूरी तरह हैरान रह गए हैं और उन्हें इस पूरे मामले की स्पष्ट समझ नहीं है, जिसने एक के बाद एक कई राजनीतिक घटनाक्रमों को जन्म दे दिया है।
कांग्रेस के लिए यह समय सबसे खराब साबित हुआ है। इस हफ्ते की शुरुआत में, मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के उन दावों के बीच - जिनमें उन्होंने कहा था कि उन्हें और उनके कैबिनेट सहयोगियों को स्टिंग ऑपरेशन में फंसाने की कोशिश की गई है - पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से जुड़ा विवाद अचानक सामने आ गया।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक स्टिंग ऑपरेशन वीडियो से अपना नाम जोड़े जाने पर सिद्धारमैया ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने इसे अपनी छवि खराब करने के लिए चलाया गया एक दुर्भावनापूर्ण अभियान करार दिया है। शहर की एक अदालत ने एकतरफा अंतरिम आदेश (ex-parte temporary injunction) जारी करते हुए मीडिया, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को इस कथित 'स्टिंग ऑपरेशन वीडियो' को प्रकाशित करने, प्रसारित करने या साझा करने से रोक दिया है।
इसके बाद से विपक्ष, खासकर जेडीएस नेता और केंद्रीय भारी उद्योग एवं इस्पात मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी, बेहद आक्रामक हो गए हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री और गृह मंत्री प्रियांक खड़गे पर तीखा हमला बोला है। उनका कहना है कि यह पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ एक बड़ी साजिश है और उन्होंने इस मामले में कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को भी घसीट लिया है।
बेंगलुरु में हाल ही में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, पूर्व मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने एक तस्वीर जारी करते हुए दावा किया कि स्टिंग ऑपरेशन में कथित तौर पर शामिल एक व्यक्ति, एआईसीसी (AICC) महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला से मिला था।
हालांकि राजनेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवाना कोई असामान्य बात नहीं है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि सुरजेवाला के साथ मौजूद व्यक्ति कोई आरोपी है या नहीं। पूर्व मुख्यमंत्री ने कुछ लोगों के नाम लिए हैं, जिनमें एक कन्नड़ टीवी चैनल का पत्रकार भी शामिल है, और पुलिस को उन्हें गिरफ्तार करने की चुनौती दी है।
दिलचस्प बात यह है कि जहां कुमारस्वामी इस मुद्दे को लेकर आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं, वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता उनके अभियान का समर्थन करते हुए उनके पीछे खड़े हैं। ऐसा लगता है कि वे बहुत सोच-समझकर अपने राजनीतिक मुद्दों और विरोधियों को चुन रहे हैं। अपने राजनीतिक रुख में एक बड़ा बदलाव लाते हुए, राज्य में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के नेता अब सिद्धारमैया के प्रति सहानुभूति जताते दिख रहे हैं, जबकि उनका पूरा निशाना डी.के. शिवकुमार पर है। कुमारस्वामी ने कहा कि आठ साल तक मुख्यमंत्री रहे और देवराज उर्स का सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड तोड़ने वाले, साथ ही 'अहिंदा' (AHINDA) नेता सिद्धारमैया को राहत पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। इससे विपक्ष के इस आरोप को बल मिलता है कि कांग्रेस के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है।
अचानक भड़के राजनीतिक विवाद और केंद्रीय मंत्री तथा कर्नाटक के गृह मंत्री के बीच तीखी बयानबाजी ने राजनीतिक विमर्श के स्तर को काफी नीचे गिरा दिया है।
जिस तरह के शब्दों और लहजे का इस्तेमाल किया गया, वह कतई स्वीकार्य नहीं था। इसकी शुरुआत तब हुई जब कुमारस्वामी ने इस मामले में पूछताछ के लिए बेंगलुरु पुलिस द्वारा कथित तौर पर JD(S) के IT विंग के कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेने पर आपत्ति जताई; वे कमिश्नर कार्यालय के बाहर धरने पर भी बैठ गए। वहीं, प्रियांक खड़गे ने पुलिस की इस कार्रवाई का बचाव किया। हैरानी की बात यह है कि बहुत कम मंत्री इस मुद्दे पर खुलकर बोल रहे हैं।
जांच किस दिशा में आगे बढ़ेगी, यह तय करना जांच अधिकारियों का काम है। कुमारस्वामी के दावों को देखें तो, जब JD(S) के नेता सरकार द्वारा इस मामले को संभालने के तरीके का कड़ा विरोध कर रहे थे, तो क्या उनके IT विंग के कर्मचारियों के घरों पर सादे कपड़ों में पुलिस अधिकारियों को भेजने की कोई जरूरत थी? क्या पुलिस ने इसी नजरिए से जांच शुरू की थी? सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो असली था या नकली, और क्या कथित साजिशकर्ताओं से पूछताछ की गई है?
ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब अभी नहीं मिले हैं। ठोस सबूतों के बिना किसी राजनीतिक दल के सदस्यों को जांच के दायरे में लाने से मामला और उलझ जाएगा, साथ ही जांच की निष्पक्षता पर भी सवाल उठेंगे। पुलिस को बहुत सावधानी से कदम उठाने की जरूरत है, और राजनेताओं को भी संयम बरतने की आवश्यकता है।
इस विवाद को लेकर बार-बार होने वाली राजनीतिक खींचतान एक गलत संदेश देती है—खासकर ऐसे समय में जब राज्य के 240 तालुकों में से 226 को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। वहीं, गन्ने के किसान सड़कों पर उतरकर गन्ने के 'उचित और लाभकारी मूल्य' (FRP) में बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, जिनमें कुछ मंत्री भी शामिल हैं, मानते हैं कि इस विवाद से सरकार और पार्टी की छवि को नुकसान पहुंच रहा है। बेहतर होगा कि इसे जल्द खत्म किया जाए और असली मुद्दों पर ध्यान दिया जाए, क्योंकि मुख्य फोकस शासन और विकास पर होना चाहिए। वहीं, विपक्ष सरकार को घेरने के लिए ऐसे मुद्दों की तलाश में रहेगा—ठीक वैसे ही, जैसे 2023 के चुनावों से पहले कांग्रेस ने 'पे-सीएम' (PayCM) और '40% कमीशन' के आरोपों के जरिए भाजपा को घेरा था।