बिहार : कजरा क्षेत्र में स्थापित सोलर पावर प्लांट के निर्माण के बाद टाली बिशनपुर पहाड़ से निकलने वाले प्रसिद्ध टाली झरना का प्राकृतिक जलप्रवाह बाधित होने का मामला तूल पकड़ने लगा है। स्थानीय किसानों और ग्रामीणों का आरोप है कि प्लांट निर्माण के दौरान झरने के पारंपरिक जलमार्ग को अवरुद्ध कर दिया गया, जिसके कारण वर्षों से खेतों तक पहुंचने वाला पानी अब नहीं पहुंच पा रहा है। इसका सीधा असर क्षेत्र की खेती पर पड़ रहा है और हजारों एकड़ कृषि भूमि सिंचाई के अभाव में प्रभावित हो रही है।
ग्रामीणों के अनुसार टाली झरना क्षेत्र का प्रमुख प्राकृतिक जल स्रोत है, जिसका पानी वर्षों से नहरों और प्राकृतिक धाराओं के माध्यम से आसपास के गांवों के खेतों तक पहुंचता रहा है। इसी जल पर बड़ी संख्या में किसान धान सहित खरीफ की अन्य फसलों की खेती करते हैं। लेकिन सोलर पावर प्लांट के निर्माण के बाद पानी का प्राकृतिक बहाव रुक गया है, जिससे खेत सूखने लगे हैं और किसानों के सामने गंभीर सिंचाई संकट खड़ा हो गया है।
किसानों का कहना है कि इस वर्ष पर्याप्त वर्षा होने के बावजूद खेतों तक झरने का पानी नहीं पहुंच रहा है। पहले जहां झरने का पानी लगातार बहता था, वहीं अब जलधारा बीच रास्ते में ही रुक जाती है। इससे धान की रोपाई कर चुके किसानों को फसल बचाने के लिए वैकल्पिक सिंचाई व्यवस्था करनी पड़ रही है। जिन किसानों के पास निजी सिंचाई के साधन नहीं हैं, उनके सामने फसल खराब होने का खतरा मंडरा रहा है।
स्थानीय किसानों ने बताया कि धान की खेती लगातार पानी पर निर्भर रहती है। समय पर सिंचाई नहीं मिलने से पौधों की बढ़वार प्रभावित होती है और उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है। इसके अलावा मक्का, सब्जियां और अन्य खरीफ फसलें भी पानी की कमी से प्रभावित हो रही हैं। यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
ग्रामीणों का आरोप है कि सोलर पावर प्लांट के निर्माण के दौरान पर्यावरणीय प्रभाव और प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था का समुचित आकलन नहीं किया गया। उनका कहना है कि यदि निर्माण कार्य के समय झरने के प्राकृतिक मार्ग को सुरक्षित रखा जाता तो आज यह स्थिति उत्पन्न नहीं होती। किसानों ने मांग की है कि जलप्रवाह को तत्काल पूर्ववत करने के लिए आवश्यक तकनीकी उपाय किए जाएं, ताकि खेतों तक फिर से पानी पहुंच सके।
क्षेत्र के किसानों का कहना है कि प्राकृतिक जल स्रोत केवल सिंचाई का माध्यम ही नहीं, बल्कि स्थानीय जल संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे स्रोतों के बाधित होने से खेती के साथ-साथ भूजल स्तर और पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने प्रशासन से इस मामले को गंभीरता से लेने की अपील की है।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया तो वे आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे। उनका कहना है कि कई बार स्थानीय अधिकारियों को इस समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकला है। किसानों की मांग है कि प्रशासन, सिंचाई विभाग और संबंधित कंपनी के अधिकारी संयुक्त रूप से स्थल निरीक्षण करें और जल निकासी का ऐसा मार्ग तैयार करें जिससे झरने का प्राकृतिक प्रवाह बाधित न हो।
किसानों का कहना है कि सरकार एक ओर कृषि उत्पादन बढ़ाने और किसानों की आय दोगुनी करने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर यदि प्राकृतिक जल स्रोत ही प्रभावित हो जाएं तो खेती करना कठिन हो जाएगा। उनका मानना है कि विकास परियोजनाएं जरूरी हैं, लेकिन उनके निर्माण के दौरान पर्यावरण संरक्षण और किसानों के हितों का भी पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए।
क्षेत्र के लोगों ने जिला प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा है कि यदि समय रहते जलप्रवाह बहाल नहीं किया गया तो हजारों एकड़ में लगी धान की फसल बर्बाद हो सकती है। इससे न केवल किसानों को आर्थिक नुकसान होगा, बल्कि पूरे क्षेत्र के कृषि उत्पादन पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा।
फिलहाल किसान प्रशासन से शीघ्र कार्रवाई की उम्मीद लगाए हुए हैं। उनका कहना है कि टाली झरना का प्राकृतिक जलप्रवाह बहाल होने से ही सिंचाई संकट का स्थायी समाधान संभव है और क्षेत्र की कृषि व्यवस्था को बचाया जा सकता है।