कोच्चि: एर्नाकुलम की अतिरिक्त जिला एवं सत्र अदालत 5 नवंबर को उन अपीलों पर अपना आदेश सुनाएगी, जिनमें एक अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के 17 वर्षीय बेटे की जमानत रद्द करने की मांग की गई है। यह लड़का चेरानल्लूर दुर्घटना में शामिल था, जिसमें 55 वर्षीय जयाबालकृष्णन की जान चली गई थी।
सोमवार को कार्यवाही ने एक नया मोड़ ले लिया, जब अभियोजन पक्ष ने जयाबालकृष्णन के परिवार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने आरोप लगाया कि परिवार स्वतंत्र जांच में बाधा डाल रहा है और अनुचित टिप्पणियां करके अभियोजन पक्ष के काम में दखल दे रहा है। अदालत ने इन आरोपों को गंभीर माना। चूंकि इस मामले में 'कानून के साथ संघर्षरत बच्चा' (CCL) शामिल है, इसलिए अदालत ने सुनवाई बंद कमरे (इन-कैमरा) में करने का फैसला किया।
अदालत ने मामले से जुड़े दोनों पक्षों को यह भी निर्देश दिया कि वे कोई अपमानजनक टिप्पणी न करें और न ही न्यायिक कार्यवाही को लेकर कोई विवादित बयान दें।
ये अपीलें राज्य सरकार और मृतक के बच्चों द्वारा दायर की गई थीं, जिसमें किशोर न्याय बोर्ड (JJB) द्वारा CCL को दी गई जमानत को चुनौती दी गई है। जांच अधिकारी खुद अदालत में पेश हुए और केस डायरी प्रस्तुत की।
आरोपों को गंभीर मानते हुए, अदालत ने जानना चाहा कि कथित हस्तक्षेप किस तरह का था और क्या इसमें कोई धमकी या डराना-धमकाना शामिल था। अदालत ने मृतक के परिवार की ओर से पेश वकील से भी कथित बाधा के बारे में सवाल पूछे।
अदालत ने कहा, "हर किसी के अपने अधिकार हैं।" अदालत ने बताया कि जमानत मिलने से दुखी परिवार ने अपील करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल किया, जिसे अदालत ने स्वीकार भी कर लिया। अदालत ने कहा, "इसी तरह, अभियोजन पक्ष के भी अपने अधिकार हैं।"
अदालत को कुछ पक्षों की ओर से लगाए गए इन आरोपों के बारे में भी बताया गया कि अभियोजन पक्ष कार्यवाही के दौरान पूछे गए सवालों का जवाब देने में विफल रहा, और साथ ही अभियोजन पक्ष के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां भी की गईं।
अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए, अदालत ने कहा कि सरकारी अभियोजक (पब्लिक प्रॉसिक्यूटर) अदालत का ही एक अधिकारी होता है और अदालत के सवाल केवल संदेह दूर करने के लिए थे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता के वकील का काम केवल अभियोजन पक्ष की सहायता करना है।
मृतक के परिवार के वकील ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि किसी ने भी अभियोजन पक्ष के काम में कोई बाधा नहीं डाली है। वकील ने बताया कि जब अभियोजक (प्रॉसिक्यूटर) को एक दस्तावेज दिया गया, तो उन्होंने उसे लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसा दस्तावेज लेने का कोई प्रावधान नहीं है और वकील से इसे अदालत के सामने पेश करने को कहा।