कन्नूर: केरल हाई कोर्ट के निर्देशों के बावजूद जंगल की सीमा से लगे कई पंचायत क्षेत्रों में वन्यजीवों की आवाजाही रोकने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। अदालत ने जंगली जानवरों को इंसानी बस्तियों में प्रवेश करने से रोकने की योजना के तहत निजी खेतों की सफाई और रास्तों को व्यवस्थित करने का निर्देश दिया था, लेकिन स्थानीय पंचायतों की कथित उदासीनता के कारण स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है।
जंगल से सटे इलाकों में रहने वाले लोगों का कहना है कि खेतों और जंगल की सीमाओं के बीच झाड़ियां और घनी वनस्पति वन्यजीवों के लिए आसान रास्ता बन रही हैं। इसके चलते जंगली जानवर लगातार कृषि क्षेत्रों को पार करते हुए रिहायशी इलाकों तक पहुंच रहे हैं।
कई पंचायतों में बढ़ी वन्यजीवों की आवाजाही
केलकम, कनिचर, अरालम, कोलायाड, कोट्टियूर और अय्यमकुन्नु जैसी पंचायतें जंगल की सीमा से लगी हुई हैं। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोग लंबे समय से वन्यजीवों के खतरे का सामना कर रहे हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, इन इलाकों में बाघ, तेंदुए, जंगली भैंसे, जंगली सूअर, साही, बंदर, हिरण और पहाड़ी बकरियां अक्सर खेतों और बस्तियों के आसपास दिखाई दे रही हैं।
वन्यजीवों की बढ़ती गतिविधियों से किसानों में डर का माहौल है। कई किसानों की फसलें नष्ट हो रही हैं और उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
खेतों की सफाई को बताया गया था जरूरी कदम
वन्यजीवों के इंसानी क्षेत्रों में प्रवेश को रोकने के लिए हाई कोर्ट ने निजी खेतों की सफाई और झाड़ियों को हटाने जैसे उपायों पर जोर दिया था।
विशेषज्ञों का मानना है कि जंगल और आबादी वाले क्षेत्रों के बीच साफ सीमाएं होने से वन्यजीवों की आवाजाही पर कुछ हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। घनी झाड़ियां और बिना साफ किए गए खेत जानवरों को छिपने और आगे बढ़ने के लिए सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराते हैं।
हालांकि, स्थानीय निकायों की ओर से इस दिशा में पर्याप्त कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाया जा रहा है।
किसानों की बढ़ी चिंता
जंगल के किनारे खेती करने वाले किसानों के लिए जंगली जानवरों का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। जंगली सूअर और अन्य जानवर अक्सर खेतों में घुसकर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं।
कई क्षेत्रों में किसानों को रात के समय खेतों की निगरानी करनी पड़ती है। वन्यजीवों के हमले की आशंका के कारण लोगों में असुरक्षा की भावना बढ़ रही है।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि केवल मुआवजा देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। वन्यजीवों के प्रवेश को रोकने के लिए स्थायी उपाय किए जाने की जरूरत है।
सुरक्षा उपायों की मांग
क्षेत्र के लोगों ने पंचायतों और वन विभाग से प्रभावी कदम उठाने की मांग की है। उनका कहना है कि खेतों की सफाई, सुरक्षा बाड़, निगरानी व्यवस्था और वन्यजीवों की आवाजाही पर नजर रखने जैसे उपाय तुरंत लागू किए जाने चाहिए।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि अदालत के निर्देशों के बावजूद कार्रवाई धीमी है, जिससे खतरा लगातार बना हुआ है।
वन विभाग के सामने बड़ी चुनौती
जंगल और मानव बस्तियों के बीच बढ़ता टकराव केवल स्थानीय प्रशासन ही नहीं, बल्कि वन विभाग के लिए भी बड़ी चुनौती बन गया है।
वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में बदलाव, जंगलों के आसपास बढ़ती मानवीय गतिविधियां और खेती के विस्तार के कारण ऐसे संघर्ष बढ़ रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, समस्या के समाधान के लिए पंचायत, वन विभाग और स्थानीय समुदायों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।
स्थायी समाधान की जरूरत
वन्यजीवों की सुरक्षा और मानव जीवन की रक्षा के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। जहां एक ओर जंगली जानवरों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखना आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर जंगल से सटे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी।
हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी यदि स्थानीय स्तर पर प्रभावी कदम नहीं उठाए जाते हैं, तो मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
जंगल की सीमा से लगे पंचायत क्षेत्रों के लोगों को अब उम्मीद है कि प्रशासन जल्द ठोस कार्रवाई करेगा और वन्यजीवों के बढ़ते खतरे से राहत दिलाने के लिए प्रभावी योजना लागू की जाएगी।