जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सागर जिले के बीना पोस्ट ऑफिस में हुए 36.4 लाख रुपये के फर्जी नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट (NSC) और टर्म डिपॉजिट घोटाले के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने पीड़ित निवेशकों के पक्ष में निर्णय देते हुए डाक विभाग की उस दलील को खारिज कर दिया, जिसमें ग्राहकों की लापरवाही का हवाला देकर विभागीय जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की गई थी। यह फैसला डाकघर की बचत योजनाओं में निवेश करने वाले लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पोस्ट ऑफिस की बचत योजनाओं को आमतौर पर सुरक्षित निवेश का विकल्प माना जाता है। बड़ी संख्या में लोग अपनी मेहनत की कमाई को नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट, फिक्स्ड डिपॉजिट और अन्य छोटी बचत योजनाओं में जमा करते हैं। लेकिन बीना पोस्ट ऑफिस में सामने आए कथित फर्जीवाड़े ने निवेशकों के भरोसे को प्रभावित किया। मामला अदालत पहुंचने के बाद यह महत्वपूर्ण सवाल उठा कि यदि डाकघर से जुड़े लेनदेन में धोखाधड़ी होती है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
36.4 लाख रुपये के फर्जी निवेश का मामला
यह मामला बीना पोस्ट ऑफिस में नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट और टर्म डिपॉजिट के नाम पर हुए लगभग 36.4 लाख रुपये के फर्जीवाड़े से जुड़ा है। निवेशकों ने अपनी बचत को सुरक्षित रखने और निर्धारित अवधि के बाद ब्याज सहित रकम प्राप्त करने की उम्मीद से निवेश किया था।
हालांकि, बाद में निवेश से जुड़े दस्तावेजों और लेनदेन में अनियमितताओं का मामला सामने आया। इसके बाद प्रभावित निवेशकों को अपनी रकम को लेकर परेशानी का सामना करना पड़ा।
इस विवाद में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि डाक विभाग निवेशकों को हुए नुकसान के लिए किस सीमा तक जिम्मेदार है। विभाग ने अपने बचाव में ग्राहकों की लापरवाही का तर्क रखा, लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
15 अक्टूबर को हाईकोर्ट ने सुनाया महत्वपूर्ण फैसला
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति मनिंदर एस. भट्टी ने 15 अक्टूबर 2026 को इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए निवेशकों को राहत दी। अदालत के सामने यह तथ्य आया कि निवेशकों से रकम लेने वाले व्यक्ति डाक विभाग के ही कर्मचारी थे।
हालांकि, विभाग का तर्क था कि संबंधित कर्मचारी उस समय बीना शाखा में अधिकृत रूप से पदस्थ नहीं थे। इसलिए ग्राहकों को उनकी बजाय अधिकृत काउंटर कर्मचारी से संपर्क करना चाहिए था।
अदालत ने इस दलील को अस्वीकार करते हुए माना कि सामान्य ग्राहक से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह डाकघर में मौजूद कर्मचारी की आंतरिक पदस्थापना या स्थानांतरण संबंधी जानकारी रखे।
फर्जी पासबुक देकर निवेशकों से ठगी
अदालत में प्रस्तुत विवरण के अनुसार, पीड़ित निवेशक बीना पोस्ट ऑफिस में टर्म डिपॉजिट खाते खुलवाने और नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट खरीदने पहुंचे थे। इसी दौरान डाक विभाग के कर्मचारियों ने उनसे संपर्क किया और निवेश प्रक्रिया में सहायता करने की बात कही।
आरोपियों ने निवेशकों से पैसे लेकर उन्हें पासबुक और अन्य दस्तावेज उपलब्ध कराए। बाद में पता चला कि संबंधित दस्तावेज फर्जी थे और निवेशकों के नाम पर वास्तविक खाते खोले ही नहीं गए थे।
मामले की जांच में धोखाधड़ी सामने आने के बाद संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की गई। रिपोर्ट के अनुसार, कर्मचारियों को गिरफ्तार किया गया और बाद में अदालत ने उन्हें दोषी भी ठहराया। इसके बावजूद निवेशकों को अपनी रकम वापस पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी।
डाक विभाग ने ग्राहकों पर डाली थी जिम्मेदारी
धोखाधड़ी सामने आने के बाद निवेशकों ने अपनी जमा राशि वापस दिलाने की मांग की। हालांकि, डाक विभाग ने यह कहते हुए दावों को अस्वीकार कर दिया कि ग्राहकों ने अधिकृत कर्मचारी के माध्यम से निवेश नहीं किया था।
विभाग का कहना था कि जिन कर्मचारियों ने रकम ली, वे संबंधित समय पर बीना शाखा में पदस्थ नहीं थे। इसलिए विभाग को हुए नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
दूसरी ओर निवेशकों का तर्क था कि जिन लोगों ने उनसे पैसे लिए, वे डाक विभाग के कर्मचारी थे और डाकघर परिसर में मौजूद थे। ऐसे में आम ग्राहक के लिए यह जानना संभव नहीं था कि संबंधित कर्मचारी की पदस्थापना कहां है।
हाईकोर्ट ने निवेशकों की इस दलील को महत्वपूर्ण माना और कहा कि सद्भावना से लेनदेन करने वाले ग्राहकों के दावों को केवल कर्मचारी की पदस्थापना के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।
30 कार्य दिवस में आवेदन, 90 दिन में कार्रवाई का निर्देश
हाईकोर्ट ने डाक विभाग के 27 मई 2021 के परिपत्र का उल्लेख करते हुए निवेशकों के दावों पर कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
अदालत के आदेश के अनुसार, प्रभावित निवेशकों को निर्धारित प्रारूप में 30 कार्य दिवस के भीतर दावा आवेदन प्रस्तुत करना होगा। इसके बाद सक्षम अधिकारी को अगले 90 दिनों के भीतर दावों का निपटारा करना होगा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि निवेशक नियमों के अनुसार फिक्स्ड डिपॉजिट पर लागू ब्याज पाने के हकदार होंगे।
महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने दावों की जांच और निपटारे के लिए समयसीमा तय की है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी निवेशकों के खातों में तत्काल रकम जमा हो चुकी है। विभाग को निर्धारित प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
डाकघर में निवेश करने वालों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है फैसला?
यह निर्णय उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो सरकारी बचत योजनाओं में निवेश करते हैं। आमतौर पर निवेशक डाकघर परिसर में मौजूद कर्मचारियों पर भरोसा करते हैं और उनके मार्गदर्शन में वित्तीय लेनदेन करते हैं।
इस मामले में अदालत ने इसी भरोसे और ग्राहकों की सद्भावना को महत्व दिया। साथ ही यह स्पष्ट किया कि डाक विभाग की अपनी शिकायत निवारण व्यवस्था के अंतर्गत फर्जी पासबुक और बिना खाता खोले रकम लेने जैसी परिस्थितियों से निपटने का प्रावधान मौजूद है।
हालांकि, इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी होने पर विभाग बिना जांच के भुगतान करने के लिए बाध्य होगा। प्रत्येक मामले में दस्तावेजों, परिस्थितियों और लागू नियमों के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।
निवेशकों को इन बातों का रखना चाहिए ध्यान
वित्तीय विशेषज्ञों की सलाह है कि पोस्ट ऑफिस में निवेश करते समय हमेशा अधिकृत काउंटर या निर्धारित डिजिटल माध्यम का इस्तेमाल करना चाहिए।
जमा राशि की रसीद, पासबुक, खाता संख्या और अन्य दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए। निवेश करने के बाद यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि रकम संबंधित खाते में दर्ज हुई है या नहीं।
किसी दस्तावेज में गड़बड़ी मिलने या खाते का विवरण उपलब्ध नहीं होने पर तत्काल डाक विभाग में लिखित शिकायत दर्ज करानी चाहिए। शिकायत की प्रति और उसकी प्राप्ति का प्रमाण सुरक्षित रखना भी उपयोगी हो सकता है।
बीना पोस्ट ऑफिस घोटाले में हाईकोर्ट का फैसला निवेशकों को राहत देने के साथ सरकारी वित्तीय संस्थानों में जवाबदेही के महत्व को भी रेखांकित करता है। अदालत के आदेश से प्रभावित निवेशकों के लिए अपनी जमा रकम और लागू ब्याज की प्राप्ति का रास्ता खुल गया है।