MP में मूंग संकट: भंडारण बढ़ा, बाजार कमजोर फिर भी MSP की मांग तेज

Update: 2026-07-29 15:33 GMT

भोपाल। मध्य प्रदेश में ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती को लेकर किसानों और सरकार के बीच विवाद बढ़ता जा रहा है। सरकार की ओर से कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल और फसल की गुणवत्ता को लेकर किसानों को ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती से दूर रहने के लिए लगातार प्रेरित किया जा रहा है, लेकिन अधिक मुनाफे की उम्मीद में किसान अब भी बड़े स्तर पर इसका उत्पादन कर रहे हैं। दूसरी ओर, गोदामों में पहले से भारी मात्रा में मूंग का स्टॉक जमा है और गुणवत्ता को लेकर खरीदारों की रुचि कम होने से नई खरीदी को लेकर समस्या खड़ी हो गई है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में पिछले वर्षों की करीब साढ़े तीन लाख टन से अधिक मूंग गोदामों में रखी हुई है, जिसकी अनुमानित कीमत लगभग तीन हजार करोड़ रुपये बताई जा रही है। कमजोर गुणवत्ता और बाजार में सीमित मांग के कारण व्यापारी इस स्टॉक को खरीदने से बच रहे हैं। यही वजह है कि सरकार शत-प्रतिशत मूंग खरीदी को लेकर असमंजस की स्थिति में है, जबकि किसान अपनी पूरी उपज समर्थन मूल्य पर खरीदने की मांग कर रहे हैं।

सरकार का कहना है कि ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती में कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, जो मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए चिंता का विषय है। पिछले दो वर्षों से किसानों को इस फसल का रकबा कम करने और वैकल्पिक फसलों की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके तहत सरकार ने उड़द की शत-प्रतिशत खरीदी के साथ किसानों को 600 रुपये प्रति क्विंटल प्रोत्साहन राशि देने की योजना भी घोषित की है, लेकिन किसान मूंग की खेती से मिलने वाले बेहतर लाभ के कारण इसे छोड़ने को तैयार नहीं हैं।

किसानों का तर्क है कि ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती में लागत काफी अधिक आती है। फसल को तैयार करने के लिए लगातार सिंचाई करनी पड़ती है और खरपतवार नियंत्रण के साथ कई बार कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ता है। किसानों के अनुसार, मूंग की फसल में पांच से छह बार तक स्प्रे करने पड़ते हैं, जिससे उत्पादन लागत बढ़ जाती है। ऐसे में अगर सरकार पूरी उपज नहीं खरीदेगी तो किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा।

प्रदेश सरकार ने पहले ही तय कर दिया था कि समर्थन मूल्य योजना के तहत कुल उत्पादन का 25 प्रतिशत हिस्सा ही खरीदा जाएगा। केंद्र सरकार की ओर से मध्य प्रदेश के लिए करीब 4.54 लाख टन मूंग खरीदी का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। इसके बाद भी किसानों ने बड़े क्षेत्र में मूंग की खेती की। अनुमान के मुताबिक, इस साल प्रदेश में करीब 14.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ग्रीष्मकालीन मूंग की बोवनी हुई है और उत्पादन लगभग 20 लाख टन से अधिक रहने की संभावना जताई जा रही है।

किसानों की नाराजगी का बड़ा कारण सरकार द्वारा तय खरीदी सीमा भी है। किसान संगठनों का कहना है कि प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन करीब 14 से 16 क्विंटल तक होता है, लेकिन सरकारी खरीदी के लिए प्रति हेक्टेयर मात्रा काफी कम तय की गई है। उनका आरोप है कि इससे किसानों की पूरी उपज समर्थन मूल्य पर नहीं बिक पा रही है।

इसी मांग को लेकर प्रदेश में कई जगह किसान आंदोलन कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि जब सरकार मूंग उत्पादन को बढ़ावा दे रही थी, तब अब खरीदी से पीछे नहीं हटना चाहिए। उनका सवाल है कि अगर कीटनाशकों के कारण मूंग स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है तो बाजार में इन रसायनों की बिक्री पर रोक क्यों नहीं लगाई जाती।

वहीं, सरकार का पक्ष है कि अनियंत्रित उत्पादन और कमजोर गुणवत्ता के कारण भंडारण की समस्या बढ़ रही है। फिलहाल मूंग खरीदी को लेकर किसान और सरकार आमने-सामने हैं। आने वाले दिनों में इस विवाद का समाधान कैसे निकलेगा, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

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