Maharashtra महाराष्ट्र: देश के पारंपरिक मछली पकड़ने वाले समुदायों ने डीजल की बढ़ती कीमतों को लेकर एक बार फिर केंद्र सरकार से राहत की मांग उठाई है। मछुआरा संगठनों का कहना है कि ईंधन की बढ़ती लागत छोटे और पारंपरिक मछुआरों की आजीविका पर सीधा असर डाल रही है। उन्होंने सरकार से डीजल की कीमतों को तर्कसंगत बनाने और एक स्थायी सब्सिडी वाली ईंधन योजना शुरू करने की मांग की है।
इस मुद्दे को लेकर नेशनल फिशवर्कर्स फोरम (NFF) और महाराष्ट्र मछिमार कृति समिति (MMKS) के प्रतिनिधिमंडल ने बुधवार को नई दिल्ली में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने केंद्र सरकार से मछली पकड़ने वाली सहकारी समितियों को मिल रही महंगी डीजल दरों के मुद्दे पर हस्तक्षेप करने की अपील की।
डीजल कीमतों में भारी अंतर का दावा
मछुआरा संगठनों ने दावा किया कि मछली पकड़ने वाली सहकारी समितियों को डीजल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी का सामना करना पड़ रहा है। संगठनों के अनुसार, मार्च 2026 में मछली पकड़ने वाली सहकारी समितियों को बल्क डीजल कैटेगरी में शामिल किया गया, जिसके बाद उनके लिए डीजल की कीमत बढ़कर करीब 155 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई।
वहीं, संगठनों के मुताबिक, खुदरा पेट्रोल पंपों पर डीजल की कीमत लगभग 90.07 रुपये प्रति लीटर थी। प्रतिनिधियों का कहना है कि कीमतों में इस बड़े अंतर ने छोटे मछुआरों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
नाव संचालन की लागत बढ़ी
पारंपरिक मछुआरों का एक बड़ा वर्ग डीजल से चलने वाली नावों पर निर्भर है। समुद्र में मछली पकड़ने के लिए नावों को लंबे समय तक चलाना पड़ता है, जिससे बड़ी मात्रा में ईंधन की खपत होती है।
संगठनों का कहना है कि डीजल महंगा होने से मछली पकड़ने की पूरी प्रक्रिया की लागत बढ़ गई है। इसका असर न केवल मछुआरों की आमदनी पर पड़ रहा है, बल्कि छोटे स्तर पर काम करने वाले परिवारों के सामने भी आर्थिक संकट पैदा हो रहा है।
स्थायी सब्सिडी योजना की मांग
मछुआरा संगठनों ने केंद्र सरकार से मांग की है कि मछली पकड़ने वाले समुदायों के लिए एक स्थायी डीजल सब्सिडी योजना लागू की जाए। उनका कहना है कि केवल अस्थायी राहत से समस्या का समाधान नहीं होगा।
उन्होंने सरकार से ऐसी नीति बनाने की मांग की है, जिससे पारंपरिक मछुआरों को लंबे समय तक राहत मिल सके और उनकी आजीविका सुरक्षित रह सके।
सरकार से हस्तक्षेप की अपील
प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के सामने अपनी समस्याएं रखते हुए कहा कि मछुआरा समुदाय देश की अर्थव्यवस्था और खाद्य आपूर्ति व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
उन्होंने कहा कि बढ़ती परिचालन लागत के कारण छोटे मछुआरे प्रतिस्पर्धा में पीछे हो रहे हैं। ऐसे में सरकार की ओर से सहायता मिलना जरूरी है।
छोटे मछुआरों पर बढ़ रहा दबाव
संगठनों के अनुसार, ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे ज्यादा असर छोटे और पारंपरिक मछुआरों पर पड़ता है। बड़े कारोबारी जहाजों की तुलना में छोटे नाव मालिकों के पास सीमित संसाधन होते हैं, जिससे उनके लिए बढ़ी हुई लागत को संभालना मुश्किल हो जाता है।
मछुआरा प्रतिनिधियों ने कहा कि यदि डीजल पर राहत नहीं दी गई तो बड़ी संख्या में छोटे मछुआरों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो सकता है।
महाराष्ट्र समेत कई राज्यों के मछुआरे प्रभावित
NFF और MMKS के प्रतिनिधियों ने बताया कि यह समस्या केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है। देश के कई तटीय राज्यों में पारंपरिक मछुआरे महंगे ईंधन से प्रभावित हो रहे हैं।
महाराष्ट्र सहित कई राज्यों के मछुआरा समुदाय लंबे समय से डीजल सब्सिडी और ईंधन नीति में बदलाव की मांग करते रहे हैं।
आगे की नीति पर नजर
मछुआरा संगठनों की मुलाकात के बाद अब उनकी नजर केंद्र सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदमों पर है। संगठनों को उम्मीद है कि सरकार उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करेगी और जल्द कोई राहत देने वाली नीति बनाएगी।
प्रतिनिधियों का कहना है कि डीजल की कीमतों में राहत मिलने से न केवल मछुआरों की आय सुरक्षित होगी, बल्कि देश के समुद्री मत्स्य क्षेत्र को भी मजबूती मिलेगी।
मछुआरा समुदायों ने स्पष्ट किया है कि उनकी मांग केवल तत्काल राहत की नहीं, बल्कि ऐसी स्थायी व्यवस्था की है, जिससे आने वाले वर्षों तक पारंपरिक मछुआरों की आजीविका सुरक्षित रह सके।