राज्य में खेतों में पराली जलाने की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे में, 'पंजाब किसान विकास चैंबर' की एक स्टडी में बताया गया है कि पंजाब के 27,000 से ज़्यादा 'कस्टम हायरिंग सेंटर्स' (CHCs) के सामने 'वित्तीय व्यवहार्यता' (financial viability) सबसे बड़ी चुनौती है। शुक्रवार को मुख्य सचिव को सौंपी गई इस स्टडी में पाया गया है कि मशीनों का कम इस्तेमाल, केवल कुछ खास मौसमों में मांग होना और बढ़ती परिचालन लागत (operating costs) राज्य में फसल अवशेष प्रबंधन (crop residue management) से जुड़े उद्यमों की स्थिरता को कम कर रही हैं।
पंजाब के पूर्व कृषि आयुक्त बलविंदर सिंह सिद्धू द्वारा की गई इस स्टडी में, पूरे पंजाब के 100 CHCs का आकलन किया गया। इसमें सामने आया कि मशीनों का केवल कुछ खास मौसमों में इस्तेमाल होना, ज़्यादा परिचालन लागत, मज़दूरों की कमी और कार्यशील पूंजी (working capital) तक सीमित पहुंच, इन इकाइयों की स्थिरता को प्रभावित करने वाली मुख्य चुनौतियां हैं।
2018-19 से 2025-26 के बीच, पंजाब में कई योजनाओं के तहत 27,000 से ज़्यादा CHCs स्थापित किए गए। साथ ही, सुपर सीडर, हैप्पी सीडर, बेलर, स्ट्रॉ चॉपर और ज़ीरो-टिल ड्रिल जैसी मशीनें भी उपलब्ध कराई गईं। इस विस्तार से पूरे राज्य में फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों तक पहुंच बेहतर हुई। हालांकि, स्टडी में पाया गया कि इन मशीनों का प्रभावी इस्तेमाल सुनिश्चित करना और इन्हें लंबे समय तक आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाए रखना एक बड़ी चिंता बन गया है। सिद्धू ने बताया, "जिन केंद्रों का अध्ययन किया गया, वे माझा, दोआबा और मालवा क्षेत्रों के ज़िलों में स्थित हैं, जिनमें अमृतसर, गुरदासपुर, होशियारपुर, लुधियाना, बठिंडा और मुक्तसर शामिल हैं। इस मूल्यांकन में प्राथमिक सर्वेक्षण, वित्तीय विश्लेषण, परिचालन संबंधी आकलन, साक्षात्कार और केस स्टडीज़ शामिल थीं।"
आयोग ने कई तरह की सेवाएं देने वाले (multi-service) CHCs को बढ़ावा देने, क्लस्टर-आधारित कामकाज को मज़बूत करने, मौसमी ज़रूरतों के हिसाब से लचीली कार्यशील पूंजी (working capital) उपलब्ध कराने और ज़िलों के बीच मशीनों की आवाजाही को आसान बनाने की सिफारिश की है। इसके अलावा, CHCs को बायोमास सप्लाई चेन से जोड़ने और सहायता प्रणालियों (support systems) को मशीनों के इस्तेमाल और मिलने वाले नतीजों (service outcomes) से जोड़ने का भी सुझाव दिया गया है।