पंचकूला/चंडीगढ़: बुराई पर अच्छाई और असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक दशहरा मंगलवार को ट्राईसिटी में श्रद्धा, उल्लास और उत्साह के साथ मनाया गया। शहरों के अलग-अलग हिस्सों में रावण दहन के आयोजन हुए। इस दौरान पंचकूला के सेक्टर-5 स्थित शालीमार ग्राउंड में देश के सबसे ऊंचे बताए जा रहे 221 फीट के रावण के पुतले का दहन प्रमुख आकर्षण रहा। इस भव्य आयोजन को देखने के लिए स्थानीय लोगों के साथ आसपास के क्षेत्रों के लोगों में भी उत्सुकता रही। विदेश में रह रहे भारतीयों ने भी इंटरनेट मीडिया के जरिए रावण दहन का लाइव प्रसारण देखकर अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ाव महसूस किया।
221 फीट ऊंचा रावण बना आकर्षण का केंद्र
पंचकूला के शालीमार ग्राउंड में तैयार किया गया विशालकाय रावण इस बार दशहरा महोत्सव की खास पहचान बना। 221 फीट ऊंचे पुतले की विशालता ने लोगों का ध्यान खींचा। दशहरा उत्सव से पहले ही इसे देखने के लिए लोग पहुंचने लगे थे। कई लोगों ने इसके साथ तस्वीरें खिंचवाईं और इस भव्य संरचना को अपने कैमरे में कैद किया।
इतने विशाल पुतले का निर्माण करना कारीगरों के लिए आसान काम नहीं था। इसके लिए बड़े स्तर पर सामग्री, श्रम और तकनीकी तैयारी की जरूरत पड़ी। रिपोर्टों के मुताबिक, पुतले के निर्माण में लोहे, बांस और कपड़े जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया गया। कारीगरों ने कई महीनों की मेहनत से इसे तैयार किया। इसकी ऊंचाई और बनावट ने इसे इस साल के दशहरा आयोजनों में खास बना दिया। 
विदेश में बसे भारतीयों ने भी देखा लाइव प्रसारण
दशहरा केवल भारत में रहने वाले लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि विदेशों में बसे भारतीय समुदाय के लिए भी सांस्कृतिक जुड़ाव का अवसर है। आधुनिक तकनीक और इंटरनेट मीडिया ने त्योहारों को भौगोलिक सीमाओं से आगे पहुंचा दिया है। पंचकूला में हुए रावण दहन का लाइव प्रसारण देखकर विदेश में रहने वाले भारतीय भी इस उत्सव से जुड़े।
अपने देश से दूर रहने वाले लोगों के लिए ऐसे आयोजन भारतीय परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और पारिवारिक यादों को ताजा करने का माध्यम बनते हैं। इंटरनेट मीडिया के जरिए वे देश में होने वाले धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को देख सकते हैं और अपने परिवार तथा परिचितों के साथ त्योहार की खुशियां साझा कर सकते हैं। इस तरह तकनीक ने त्योहारों को मनाने और उनसे जुड़े रहने के नए अवसर उपलब्ध कराए हैं।
ट्राईसिटी में अलग-अलग स्थानों पर हुए आयोजन
पंचकूला के अलावा चंडीगढ़ में भी दशहरे को लेकर उत्साह रहा। सेक्टर-46 में रावण के पुतले के साथ अन्य प्रतीकात्मक पुतलों के दहन का कार्यक्रम रखा गया। यहां 106 फीट ऊंचा रावण का पुतला मुख्य आकर्षणों में शामिल रहा। दशहरा आयोजनों में रावण के साथ मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन भी परंपरा का हिस्सा रहा है। इन आयोजनों के जरिए लोगों को रामायण की कथा और भगवान श्रीराम की विजय का संदेश याद दिलाया गया।
दशहरा उत्सव के दौरान धार्मिक कार्यक्रमों, रामलीला और रावण दहन का विशेष महत्व होता है। रामलीला के मंचन में भगवान श्रीराम के जीवन, उनके संघर्ष और धर्म की रक्षा के प्रसंगों को प्रस्तुत किया जाता है। इसके बाद रावण दहन के जरिए बुराई के अंत और अच्छाई की विजय का प्रतीकात्मक संदेश दिया जाता है।
बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है दशहरा
दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहा जाता है, भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर माता सीता को उसके चंगुल से मुक्त कराया था। इसलिए रावण दहन को अहंकार, अन्याय और अधर्म के अंत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
हालांकि, इस पर्व का संदेश केवल पौराणिक कथा तक सीमित नहीं है। यह लोगों को जीवन में सत्य, संयम, सदाचार और न्याय के रास्ते पर चलने की प्रेरणा भी देता है। रावण के दस सिर को अक्सर मानवीय कमजोरियों और नकारात्मक प्रवृत्तियों के प्रतीक के रूप में भी समझाया जाता है। ऐसे में दशहरा लोगों को अपने भीतर मौजूद बुराइयों को पहचानकर उन्हें दूर करने का संदेश देता है।
परंपरा और आधुनिकता का संगम
ट्राईसिटी में दशहरे के आयोजन यह भी दिखाते हैं कि
पारंपरिक
त्योहार समय के साथ नए रूपों में लोगों तक पहुंच रहे हैं। एक ओर मैदानों में विशाल पुतलों का दहन और सामूहिक उत्सव लोगों को एक साथ लाते हैं, वहीं दूसरी ओर इंटरनेट मीडिया के जरिए विदेश में बसे भारतीय भी इन पलों का हिस्सा बनते हैं।
पंचकूला में 221 फीट ऊंचे रावण का दहन इस साल के उत्सव का प्रमुख आकर्षण रहा। वहीं, ऑनलाइन प्रसारण के जरिए दूर बैठे लोगों का जुड़ना इस बात का उदाहरण है कि त्योहार केवल किसी एक स्थान तक सीमित नहीं रहते। वे लोगों को अपनी संस्कृति, परंपरा और साझा विरासत से जोड़े रखते हैं।
दशहरे का मूल संदेश हर दौर में प्रासंगिक है—चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, सत्य और अच्छाई के रास्ते पर चलने का महत्व बना रहता है। इसी संदेश के साथ ट्राईसिटी में विजयादशमी का पर्व श्रद्धा और उल्लास के बीच मनाया गया।
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