New Delhi नई दिल्ली : पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2020 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के आवास के बाहर हुए प्रदर्शन से जुड़े मामले को फिर से शुरू करने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि भगवंत मान अब एक संवैधानिक पद पर हैं और उनसे जिम्मेदारी के साथ काम करने की उम्मीद की जाती है। ऐसे में पुराने मामले को दोबारा शुरू करने का कोई ठोस आधार नजर नहीं आता।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें भगवंत मान के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमे को रद्द कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान पीठ ने मामले को दोबारा शुरू करने को लेकर अपनी अनिच्छा जाहिर की।
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना ने कहा कि राजनीति में प्रदर्शन और नारेबाजी आम बात है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि वह इस मामले को फिर से शुरू करने के पक्ष में नहीं है। पीठ ने यह भी कहा कि इस घटना में किसी व्यक्ति को गंभीर चोट नहीं आई थी, इसलिए आपराधिक कार्रवाई को आगे बढ़ाने का कोई पर्याप्त कारण नहीं बनता।
दरअसल, इस मामले में चंडीगढ़ प्रशासन ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के वर्ष 2025 के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। प्रशासन की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने दलील दी कि मुख्यमंत्री भगवंत मान के खिलाफ पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट ने मामले में एक तरह से मिनी ट्रायल कर लिया और सरकार के पास केस के गुण-दोष के आधार पर मजबूत पक्ष मौजूद है।
चंडीगढ़ प्रशासन की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने पहले सुनवाई के लिए सहमति जताई थी और मामले को 20 जुलाई को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया था। हालांकि, सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मामले को आगे बढ़ाने को लेकर अपनी राय स्पष्ट कर दी।
यह मामला जनवरी 2020 का है, जब भगवंत मान आम आदमी पार्टी के नेता के रूप में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री के आवास के बाहर प्रदर्शन में शामिल हुए थे। यह प्रदर्शन बिजली दरों में बढ़ोतरी समेत कई मुद्दों को लेकर किया गया था। इस दौरान आम आदमी पार्टी के कई कार्यकर्ता भी मौजूद थे।
प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों को हल्की चोटें आने का दावा किया गया था, जिसके बाद प्रदर्शनकारियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। भगवंत मान के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 332 और 353 समेत अन्य धाराओं में केस दर्ज किया गया था। ये धाराएं सरकारी कर्मचारी को ड्यूटी के दौरान चोट पहुंचाने और सरकारी काम में बाधा डालने से संबंधित हैं।
वर्ष 2025 में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने इस मामले को रद्द कर दिया था। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि पुलिसकर्मियों को लगी चोटें गंभीर नहीं थीं और मामले में इन धाराओं के तहत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध नहीं है।
हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि प्रदर्शन के दौरान भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 144 के तहत कोई निषेधाज्ञा लागू नहीं थी। ऐसे में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मुकदमे को जारी रखने का कोई औचित्य नहीं बनता।
सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद मुख्यमंत्री भगवंत मान को राहत मिली है। हालांकि, यह मामला पंजाब की राजनीति में काफी चर्चा में रहा था, क्योंकि इसमें एक मौजूदा मुख्यमंत्री के खिलाफ पुराने आंदोलन से जुड़ी कानूनी कार्रवाई का मुद्दा शामिल था। कोर्ट के फैसले के बाद अब इस मामले में आगे कार्रवाई की संभावना लगभग खत्म होती नजर आ रही है।