धौलपुर। मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से निकलकर एक चीते के राजस्थान के धौलपुर जिले में पहुंचने की खबर से वन विभाग सतर्क हो गया है। सरमथुरा क्षेत्र के रिछरा नाले के आसपास चीते की झलक दिखाई देने की सूचना मिली है। इसके बाद वन विभाग और ट्रैकर्स की टीम उसकी गतिविधियों पर नजर रख रही है। बताया जा रहा है कि चीता कूनो नेशनल पार्क से लगभग 100 किलोमीटर का सफर तय कर राजस्थान के जंगलों तक पहुंचा है। हालांकि चीते द्वारा तय की गई वास्तविक दूरी और उसकी पहचान की आधिकारिक पुष्टि अभी स्पष्ट नहीं है।
चीते की मौजूदगी की सूचना मिलने के बाद सरमथुरा क्षेत्र के जंगलों में हलचल बढ़ गई है। स्थानीय स्तर पर वन्यजीव की गतिविधियों को लेकर सतर्कता बरती जा रही है। वन विभाग के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीते की सुरक्षित निगरानी करना और यह सुनिश्चित करना है कि उसके विचरण के दौरान किसी तरह का मानव-वन्यजीव संघर्ष न हो।
जानकारी के अनुसार, सरमथुरा के रिछरा नाले के आसपास चीते की मौजूदगी देखे जाने के बाद ट्रैकर्स को सक्रिय किया गया है। टीम चीते की गतिविधियों और उसके संभावित विचरण क्षेत्र पर नजर रख रही है। जंगलों में चीते की मौजूदगी को लेकर ग्रामीणों के बीच भी उत्सुकता बनी हुई है। हालांकि वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, चीते का एक स्थान से दूसरे स्थान तक लंबी दूरी तय करना उसके प्राकृतिक व्यवहार का हिस्सा हो सकता है।
राजस्थान के धौलपुर और करौली जिलों के जंगल मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान से जुड़े व्यापक वन्यजीव परिदृश्य का हिस्सा हैं। कूनो से निकलने वाले चीते पहले भी इन क्षेत्रों में पहुंच चुके हैं। मई 2026 में भी कूनो से निकला एक चीता करौली के मंडरायल क्षेत्र से होते हुए धौलपुर के सरमथुरा जंगलों तक पहुंचा था। उस दौरान वन विभाग ने रेडियो कॉलर और मैदानी टीमों की सहायता से उसकी निगरानी की थी।
वन विभाग के लिए यह क्षेत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व के आसपास घने जंगल, चंबल के बीहड़ और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास मौजूद हैं। जंगलों में शिकार की उपलब्धता और पानी के स्रोत किसी भी बड़े मांसाहारी वन्यजीव के विचरण को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि किसी चीते के किसी क्षेत्र में दिखाई देने का यह अर्थ नहीं है कि उसने वहां स्थायी ठिकाना बना लिया है।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, चीते अपनी जरूरतों के मुताबिक नए इलाकों की तलाश करते रहते हैं। विशेष रूप से युवा चीते अपने मूल क्षेत्र से बाहर निकलकर लंबी दूरी तय कर सकते हैं। इस दौरान वे जंगलों, घास के मैदानों और अन्य प्राकृतिक रास्तों का उपयोग करते हैं। ऐसे में कूनो से राजस्थान की ओर चीतों का बढ़ना वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
राजस्थान में चीतों की आवाजाही पहले भी चर्चा का विषय रही है। जून 2026 में कूनो से निकला केजीपी-3 नाम का चीता करीब 200 किलोमीटर की यात्रा कर भरतपुर जिले के बंध बारेठा वन्यजीव अभयारण्य तक पहुंच गया था। इस दौरान उसने करौली और धौलपुर के वन क्षेत्रों से होकर यात्रा की थी। वन अधिकारियों ने इसे चीते के प्राकृतिक क्षेत्र विस्तार से जुड़ी महत्वपूर्ण गतिविधि बताया था।
चीते की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक और मैदानी ट्रैकर्स की भूमिका बेहद अहम होती है। कूनो राष्ट्रीय उद्यान के कई चीतों को सैटेलाइट या रेडियो कॉलर लगाए गए हैं। इनकी मदद से उनकी लोकेशन का पता लगाया जाता है। हालांकि सैटेलाइट कॉलर से हर समय लगातार लाइव लोकेशन मिलना संभव नहीं होता। घने जंगल, पहाड़ी क्षेत्र और तकनीकी कारणों से लोकेशन अपडेट मिलने में अंतर आ सकता है। इसलिए ट्रैकर्स की टीमें जमीन पर भी निगरानी करती हैं।
धौलपुर के सरमथुरा क्षेत्र में चीते की मौजूदगी की सूचना वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इस इलाके में पहले से बाघ और तेंदुए जैसे वन्यजीवों की गतिविधियां भी दर्ज होती रही हैं। ऐसे में अलग-अलग वन्यजीव प्रजातियों की मौजूदगी के बीच सुरक्षित प्राकृतिक आवास बनाए रखना वन विभाग के सामने बड़ी जिम्मेदारी है।
वन्यजीवों के जंगल से बाहर निकलने या आबादी वाले क्षेत्रों के नजदीक पहुंचने की स्थिति में विशेष सतर्कता जरूरी हो जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी चीते को देखकर उसके करीब जाने, पीछा करने या तस्वीरें लेने के लिए भीड़ जुटाने से बचना चाहिए। ऐसा करने से वन्यजीव तनाव में आ सकता है और उसके स्वाभाविक व्यवहार में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को भी जंगलों में अनावश्यक आवाजाही से बचने और अपने पालतू पशुओं की सुरक्षा पर ध्यान देने की सलाह दी जाती है। यदि किसी स्थान पर चीते की मौजूदगी दिखाई दे तो वन विभाग को तत्काल सूचना देना सबसे सुरक्षित उपाय है। इससे प्रशिक्षित टीमें समय रहते संबंधित क्षेत्र की निगरानी कर सकती हैं।
कूनो से राजस्थान तक चीतों की आवाजाही ने वन्यजीव कॉरिडोर की आवश्यकता को भी महत्वपूर्ण बना दिया है। नवंबर 2024 में राजस्थान और मध्य प्रदेश के वन अधिकारियों के बीच धौलपुर से रावतभाटा तक करीब 400 किलोमीटर लंबे वन क्षेत्र में संभावित चीता कॉरिडोर विकसित करने को लेकर चर्चा हुई थी। इसका उद्देश्य विभिन्न वन क्षेत्रों के बीच चीतों के सुरक्षित विचरण की संभावनाओं का अध्ययन करना है।
भारत में चीता पुनर्स्थापना परियोजना की शुरुआत सितंबर 2022 में मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान से की गई थी। इसके तहत नामीबिया से आठ चीतों को भारत लाया गया था। इसके बाद दक्षिण अफ्रीका से भी चीते लाए गए। इस परियोजना का उद्देश्य देश में विलुप्त हो चुकी चीते की आबादी को फिर से स्थापित करना और उसके लिए उपयुक्त प्राकृतिक आवास विकसित करना है।
फिलहाल धौलपुर के सरमथुरा क्षेत्र में चीते की मौजूदगी को लेकर
ट्रैकिंग
और निगरानी सबसे अहम है। चीता आगे किस दिशा में बढ़ेगा, वह इस क्षेत्र में कितने समय तक रहेगा और क्या वापस कूनो की ओर लौटेगा, यह उसकी आगामी गतिविधियों से स्पष्ट होगा।
कूनो से राजस्थान के जंगलों तक चीतों की पहुंच वन्यजीव संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। इससे यह भी सामने आ रहा है कि चीतों के संरक्षण के लिए केवल राष्ट्रीय उद्यान की सीमा ही नहीं, बल्कि आसपास के व्यापक वन क्षेत्रों की सुरक्षा और दोनों राज्यों के वन विभागों के बीच बेहतर समन्वय भी जरूरी है।
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