मदुरै: राज्य सरकार ने बुधवार को मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ को सूचित किया कि उसने सरकारी और निजी क्षेत्रों में महिला कर्मचारियों के लिए सवैतनिक मासिक धर्म अवकाश देने की नीति तैयार करने की व्यवहार्यता की जांच करने के लिए 13 सदस्यीय सभी महिला समिति का गठन किया है।

सरकारी वकील ने न्यायमूर्ति सीवी कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर शक्तिवेल की पीठ को बताया कि समिति का गठन करने वाला एक जीओ श्रम कल्याण विभाग द्वारा 18 सितंबर, 2026 को जारी किया गया था। वकील ने मदुरै के एक सरकारी लैब तकनीशियन एम नर्मथा द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह दलील दी।

सरकारी वकील ने अदालत से समिति को अपनी रिपोर्ट दाखिल करने के लिए तीन महीने का समय देने का अनुरोध किया, जिसके बाद पीठ ने समिति को 21 जनवरी, 2027 को अगली सुनवाई तक एक रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया।

नर्मथा ने अपनी याचिका में कहा कि उन्होंने ऐसी कई कामकाजी महिलाओं को देखा है जो गंभीर मासिक धर्म की ऐंठन के इलाज के लिए आती हैं लेकिन अत्यधिक दर्द के बावजूद काम पर आती हैं और अपने पुरुष सहकर्मियों की तरह अच्छा प्रदर्शन करती हैं। उन्होंने कहा, हालांकि कर्नाटक, बिहार और ओडिशा सहित अन्य राज्यों में मासिक धर्म अवकाश नीति थी, लेकिन तमिलनाडु में कोई नीति नहीं थी।

नर्मथा ने कहा कि मानवीय और लिंग-संवेदनशील कामकाजी स्थितियां प्रदान करने में विफलता संविधान के अनुच्छेद 42 का उल्लंघन है, जो राज्य को विशेष रूप से महिलाओं के लिए काम की उचित और मानवीय स्थितियां सुनिश्चित करने का आदेश देता है। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा अवकाश ढांचा, अर्थात् आकस्मिक अवकाश और बीमार अवकाश, अपर्याप्त है, खासकर उन महिलाओं के लिए जो दर्दनाक माहवारी (कष्टार्तव) से पीड़ित हैं।

 

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