चेन्नई। तमिलनाडु में राज्य की सांस्कृतिक पहचान और भाषाई गौरव को लेकर एक नई चर्चा शुरू हो गई है। रविवार, 1 नवंबर 2026 को तमिलनाडु दिवस के अवसर पर चेन्नई में आयोजित समारोह में राज्य के लिए अलग ध्वज बनाने का प्रस्ताव सामने आया। कार्यक्रम में लोक निर्माण एवं खेल विकास मंत्री आधव अर्जुना ने कहा कि तमिलनाडु का अपना एक अलग ध्वज होना चाहिए, जो तमिल भाषा, संस्कृति और राज्य की ऐतिहासिक पहचान का प्रतिनिधित्व करे। इस अवसर पर तमिल विकास, स्कूली शिक्षा, सूचना एवं प्रचार मंत्री राजमोहन भी मौजूद रहे। हालांकि, अलग राज्य ध्वज बनाने को लेकर सरकार की ओर से अभी कोई अंतिम फैसला घोषित नहीं किया गया है।
तमिलनाडु दिवस समारोह में उठा अलग झंडे का मुद्दा
चेन्नई के एग्मोर स्थित सरकारी संग्रहालय में तमिलनाडु दिवस के अवसर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस समारोह में मंत्री राजमोहन, आधव अर्जुना, आनंद और वन्नी अरसु सहित कई प्रतिनिधि शामिल हुए। कार्यक्रम का उद्देश्य राज्य के गठन के ऐतिहासिक महत्व को याद करना और तमिल भाषा तथा संस्कृति के संरक्षण को प्रोत्साहित करना था।इसी कार्यक्रम में मंत्री आधव अर्जुना ने तमिलनाडु के लिए अलग राज्य ध्वज की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि देश के विभिन्न क्षेत्रों की अपनी सांस्कृतिक पहचान है और तमिलनाडु की समृद्ध भाषाई विरासत को भी एक विशिष्ट प्रतीक के माध्यम से प्रस्तुत किया जाना चाहिए।उन्होंने सुझाव दिया कि प्रस्तावित ध्वज में तमिल भाषा को प्रमुखता दी जाए। उनका कहना था कि राज्य का ध्वज तमिल लोगों की सांस्कृतिक एकता और गौरव का प्रतीक बन सकता है।
मुख्यमंत्री विजय के हाथों ध्वजारोहण का सुझाव
मंत्री आधव अर्जुना ने प्रस्ताव रखा कि यदि तमिलनाडु के लिए अलग ध्वज तैयार किया जाता है, तो उसे प्रत्येक वर्ष 1 नवंबर और 18 जुलाई को मुख्यमंत्री के हाथों फहराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन दोनों तिथियों का तमिलनाडु के इतिहास में विशेष महत्व है।1 नवंबर 1956 को भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के दौरान तमिल भाषी क्षेत्रों को मिलाकर तत्कालीन मद्रास राज्य का गठन हुआ था। वहीं, 18 जुलाई की तारीख राज्य का नाम तमिलनाडु करने के ऐतिहासिक प्रस्ताव से जुड़ी हुई है।मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की सरकार ने दोनों तिथियों को तमिलनाडु दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया है। इसी पृष्ठभूमि में अलग राज्य ध्वज की मांग को सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा जा रहा है।
तमिल भाषा को अनिवार्य बनाने की मांग
राज्य ध्वज के प्रस्ताव के साथ मंत्री आधव अर्जुना ने शिक्षा व्यवस्था में तमिल भाषा की भूमिका मजबूत करने की भी मांग की। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु के सभी स्कूलों में पहली से आठवीं कक्षा तक तमिल भाषा की पढ़ाई अनिवार्य की जानी चाहिए।उनके प्रस्ताव में सीबीएसई से संबद्ध विद्यालयों को भी शामिल करने की बात कही गई। मंत्री ने मातृभाषा को सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार बताया।उन्होंने कहा कि अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई करने को ही रोजगार प्राप्त करने का एकमात्र रास्ता मानने की सोच बदलनी चाहिए। तमिल भाषा के संरक्षण के साथ आधुनिक शिक्षा और रोजगार के अवसरों का विस्तार भी जरूरी है।इस दौरान उन्होंने राज्य की दो-भाषा नीति के महत्व का उल्लेख किया। उनका कहना था कि मातृभाषा से जुड़ाव बनाए रखते हुए विद्यार्थियों को आधुनिक दुनिया की जरूरतों के अनुरूप शिक्षा मिलनी चाहिए।
राजमोहन ने की कई सांस्कृतिक घोषणाएं
तमिलनाडु दिवस समारोह में मंत्री राजमोहन ने राज्य की सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं। उन्होंने बताया कि सरकारी कार्यालयों में सप्ताह में एक दिन पारंपरिक परिधान दिवस मनाया जाएगा।इसके तहत सरकारी कर्मचारियों और मंत्रियों को पारंपरिक तमिल परिधान पहनने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। पुरुषों के लिए वेष्टी और शर्ट तथा महिलाओं के लिए साड़ी जैसे पारंपरिक वस्त्रों को महत्व दिया जाएगा।राजमोहन ने कहा कि इस पहल से तमिल संस्कृति को प्रोत्साहन मिलने के साथ पारंपरिक वस्त्र उद्योग और बुनकरों को भी लाभ हो सकता है।उन्होंने यह भी घोषणा की कि मुख्यमंत्री विजय के निर्देश पर राज्य सचिवालय में तमिल संगम की स्थापना की जाएगी। पहले से मौजूद तमिल संगठनों को भी इसके साथ जोड़ने की योजना है। मुख्यमंत्री स्वयं इस संगठन के अध्यक्ष होंगे।इसके अलावा विश्व तमिल सम्मेलन को फिर से आयोजित करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तमिल भाषा तथा संस्कृति के प्रचार-प्रसार की दिशा में काम करने की घोषणा की गई।
अलग राज्य ध्वज को लेकर क्या है संवैधानिक स्थिति?
भारत में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। राज्यों के अलग ध्वज को लेकर संविधान में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जनवरी 2018 में लोकसभा में दिए गए जवाब में बताया था कि संविधान में किसी राज्य के लिए अलग ध्वज का उल्लेख नहीं है। हालांकि, अलग राज्य ध्वज की संवैधानिक और कानूनी स्थिति पर पहले भी चर्चा होती रही है।कर्नाटक में भी अलग राज्य ध्वज बनाने का प्रस्ताव सामने आ चुका है। वहां राज्य की सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक के रूप में ध्वज के डिजाइन पर विचार किया गया था।ऐसे में तमिलनाडु के लिए अलग ध्वज की मांग पर आगे कोई औपचारिक पहल होती है, तो उसके कानूनी पहलुओं और राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान से जुड़े नियमों का ध्यान रखना आवश्यक होगा।
तमिल पहचान और सांस्कृतिक विरासत पर जोर
तमिलनाडु में भाषा और सांस्कृतिक पहचान लंबे समय से सामाजिक तथा राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण विषय रही है। तमिल साहित्य, प्राचीन इतिहास, कला, संगीत और सांस्कृतिक परंपराएं राज्य की विशिष्ट पहचान का हिस्सा हैं।राज्य ध्वज का प्रस्ताव भी इसी व्यापक सांस्कृतिक विमर्श से जुड़ा हुआ है। समर्थकों का मानना है कि ऐसा प्रतीक तमिल भाषा और सांस्कृतिक विरासत के प्रति लोगों के जुड़ाव को मजबूत कर सकता है।फिलहाल अलग राज्य ध्वज बनाने का मुद्दा एक मंत्री के प्रस्ताव के रूप में सामने आया है। सरकार ने इसके डिजाइन, आधिकारिक दर्जे या लागू करने की समयसीमा के संबंध में कोई निर्णय घोषित नहीं किया है।अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मुख्यमंत्री विजय के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार इस सुझाव पर आगे किस तरह विचार करती है। तमिलनाडु दिवस पर उठी यह मांग राज्य की सांस्कृतिक पहचान, भाषाई विरासत और संवैधानिक व्यवस्था को लेकर नई चर्चा का विषय बन गई है।