मेट्टूर बांध में जल संकट गहराया

Update: 2026-07-19 04:07 GMT

मेट्टूर : कर्नाटक के बांधों से कावेरी नदी में अब तक पानी नहीं छोड़े जाने के कारण तमिलनाडु के मेट्टूर बांध की स्थिति लगातार चिंताजनक होती जा रही है। शनिवार को बांध में पानी का बहाव घटकर मात्र 30 क्यूबिक फीट प्रति सेकंड (क्यूसेक) रह गया। लगातार कम हो रहे जल प्रवाह के चलते बांध का जलस्तर भी गिरता जा रहा है, जिससे आगामी सांबा धान की खेती के लिए पानी छोड़े जाने को लेकर किसानों की चिंता बढ़ गई है।

मेट्टूर बांध तमिलनाडु की कृषि व्यवस्था की जीवनरेखा माना जाता है। राज्य के कावेरी डेल्टा क्षेत्र के 12 जिलों में लगभग 16.05 लाख एकड़ कृषि भूमि की सिंचाई इसी बांध के पानी पर निर्भर करती है। हर वर्ष हजारों किसान कुरुवई, सांबा और थालाडी जैसी प्रमुख धान की फसलों की खेती के लिए मेट्टूर बांध से छोड़े जाने वाले पानी का इंतजार करते हैं। ऐसे में जल प्रवाह में आई भारी कमी ने कृषि क्षेत्र में अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है।

परंपरा के अनुसार, यदि मेट्टूर बांध का जलस्तर लगभग 90 फीट के आसपास होता है और दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य रहता है, तो 12 जून को कुरुवई धान की खेती के लिए बांध से पानी छोड़ा जाता है। लेकिन इस वर्ष बांध में पर्याप्त जल भंडारण और कर्नाटक से अपेक्षित जल प्रवाह नहीं मिलने के कारण सरकार कुरुवई फसल के लिए पानी जारी नहीं कर सकी। इसका असर पहले ही किसानों पर पड़ चुका है और अब सांबा सीजन को लेकर भी आशंकाएं बढ़ गई हैं।

जल संसाधन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, कर्नाटक के जलाशयों से अब तक कावेरी नदी में अपेक्षित मात्रा में पानी नहीं छोड़ा गया है। इसी वजह से मेट्टूर बांध में आने वाला जल प्रवाह लगातार कम होता गया और शनिवार को यह घटकर केवल 30 क्यूसेक रह गया। दूसरी ओर, बांध से पेयजल और अन्य आवश्यक जरूरतों के लिए सीमित मात्रा में पानी छोड़ा जा रहा है, जिससे जल भंडारण पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में कर्नाटक से पानी नहीं छोड़ा गया या मानसून के कारण जल प्रवाह में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई, तो सांबा फसल के लिए समय पर पानी उपलब्ध कराना कठिन हो सकता है। सांबा धान तमिलनाडु की सबसे महत्वपूर्ण कृषि फसलों में से एक है और इसकी बुवाई तथा सिंचाई काफी हद तक मेट्टूर बांध के पानी पर निर्भर करती है।

डेल्टा क्षेत्र के किसानों ने स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पहले ही कुरुवई सीजन प्रभावित हो चुका है। यदि सांबा फसल के लिए भी समय पर पानी नहीं मिला, तो लाखों किसानों की आजीविका पर गंभीर असर पड़ सकता है। किसानों का कहना है कि खेती की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं, लेकिन सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं होने से वे असमंजस की स्थिति में हैं।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पानी की कमी का प्रभाव केवल धान उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि मजदूरों के रोजगार और खाद्य उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। डेल्टा क्षेत्र की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है और यदि सांबा सीजन प्रभावित होता है, तो इसका व्यापक आर्थिक प्रभाव देखने को मिल सकता है।

इस बीच किसान संगठनों ने राज्य सरकार से कर्नाटक के साथ जल बंटवारे के मुद्दे पर प्रभावी पहल करने की मांग की है। उनका कहना है कि कावेरी जल समझौते और संबंधित न्यायिक आदेशों के अनुसार तमिलनाडु को उसका निर्धारित हिस्सा मिलना चाहिए। साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार से भी इस मामले में हस्तक्षेप कर दोनों राज्यों के बीच समन्वय स्थापित करने की अपील की है।

जल संसाधन विभाग स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। अधिकारी बांध के जलस्तर, जल भंडारण और कावेरी नदी में आने वाले प्रवाह की प्रतिदिन समीक्षा कर रहे हैं। विभाग का कहना है कि मानसून की स्थिति और कर्नाटक से मिलने वाले पानी के आधार पर आगे की रणनीति तय की जाएगी।

मौसम विशेषज्ञों का भी मानना है कि आने वाले दिनों में यदि दक्षिण-पश्चिम मानसून सक्रिय होता है और कर्नाटक के जलाशयों में जलस्तर बढ़ता है, तो मेट्टूर बांध में पानी का प्रवाह सुधर सकता है। हालांकि फिलहाल उपलब्ध आंकड़े किसानों के लिए राहत देने वाले नहीं हैं।

राज्य सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती पेयजल आवश्यकताओं और कृषि सिंचाई के बीच संतुलन बनाए रखने की है। यदि जल संकट लंबा खिंचता है, तो प्रशासन को उपलब्ध जल संसाधनों का अत्यंत सावधानी से प्रबंधन करना होगा।

फिलहाल मेट्टूर बांध में जल प्रवाह बेहद कम होने से डेल्टा क्षेत्र के किसानों की निगाहें कर्नाटक से छोड़े जाने वाले पानी और मानसून की प्रगति पर टिकी हुई हैं। आने वाले कुछ सप्ताह यह तय करेंगे कि तमिलनाडु में सांबा धान की खेती सामान्य रूप से हो पाएगी या किसानों को एक और कठिन कृषि सीजन का सामना करना पड़ेगा।

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