आंबेडकरनगर। उत्तर प्रदेश के आंबेडकरनगर में आधी रात तीन बुलडोजर और करीब 50 से 60 नकाबपोश लोगों के पहुंचने और दस से अधिक मकान-दुकानों को गिराने का मामला सामने आया है। आरोप है कि मकान और दुकानों को गिराने का विरोध करने वाले लोगों को हथियार दिखाकर धमकाया गया। रास्ते को दोनों ओर से घेर लिया गया और प्रभावित परिवारों को अपना सामान तक बाहर निकालने का मौका नहीं दिया गया। घटना सामने आने के बाद पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
मामले की गंभीरता को देखते हुए कार्रवाई करते हुए संबंधित कोतवाल समेत पांच पुलिसकर्मियों और एक लेखपाल को निलंबित कर दिया गया है। हालांकि इस कार्रवाई के बाद भी यह सवाल बना हुआ है कि तीन बुलडोजरों और दर्जनों लोगों का इतना बड़ा जमावड़ा आधी रात को घटनास्थल तक कैसे पहुंच गया और मकान-दुकान गिराए जाने तक पुलिस-प्रशासन को इसकी जानकारी क्यों नहीं हो सकी।
तीन बुलडोजर लेकर पहुंचे थे नकाबपोश
पीड़ितों के मुताबिक, घटना आधी रात की है। अचानक तीन बुलडोजरों के साथ बड़ी संख्या में लोग इलाके में पहुंचे। आरोप है कि इनमें करीब 50 से 60 लोग शामिल थे और कई लोगों ने अपने चेहरे ढक रखे थे। इसके बाद मकानों और दुकानों को बुलडोजर से गिराना शुरू कर दिया गया।
रात के समय अचानक बुलडोजर चलते देख वहां रहने वाले परिवारों में अफरा-तफरी मच गई। लोग अपने घरों से बाहर निकले और कार्रवाई का विरोध करने की कोशिश की। पीड़ितों का आरोप है कि विरोध करने पर उन्हें असलहा दिखाकर धमकाया गया। इसके चलते लोग डर गए और बुलडोजर की कार्रवाई को रोक नहीं सके।
सामान निकालने का भी नहीं मिला मौका
पीड़ित परिवारों का कहना है कि उन्हें घर और दुकानों से अपना सामान बाहर निकालने का पर्याप्त समय तक नहीं दिया गया। बुलडोजर से निर्माण गिराए जाने के कारण घरों और दुकानों में रखा सामान भी प्रभावित हुआ।
आरोप है कि कार्रवाई के दौरान रास्ते के दोनों ओर लोगों को तैनात कर दिया गया था, जिससे कोई आसानी से घटनास्थल तक नहीं पहुंच सके। प्रभावित परिवारों का दावा है कि पूरी कार्रवाई योजनाबद्ध तरीके से की गई।
इस दौरान दस से अधिक मकान और दुकानें गिराए जाने की बात सामने आई है। हालांकि गिराए गए निर्माणों की अंतिम संख्या और नुकसान का विस्तृत आकलन प्रशासनिक जांच के बाद स्पष्ट होगा।
कोतवाल समेत पांच पुलिसकर्मी निलंबित
मामला सामने आने और प्रशासनिक स्तर पर इसकी जानकारी पहुंचने के बाद जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया शुरू की गई। प्रारंभिक कार्रवाई में संबंधित कोतवाल समेत पांच पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया है। इसके अलावा राजस्व विभाग के एक लेखपाल पर भी निलंबन की कार्रवाई की गई है।
इतनी बड़ी कार्रवाई के बाद यह संकेत मिलता है कि प्रशासन ने घटनाक्रम के दौरान निगरानी और समय पर हस्तक्षेप नहीं होने को गंभीरता से लिया है। अब यह जांच का विषय है कि स्थानीय पुलिस और राजस्व विभाग को इस गतिविधि की जानकारी कब मिली और जानकारी मिलने के बाद क्या कदम उठाए गए।
आधी रात कैसे पहुंचे तीन बुलडोजर?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल तीन बुलडोजरों और दर्जनों लोगों की आवाजाही को लेकर उठ रहा है। आमतौर पर बुलडोजर जैसे भारी वाहनों को किसी स्थान तक पहुंचने और बड़े पैमाने पर निर्माण गिराने में समय लगता है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर इसकी भनक पुलिस और प्रशासन को क्यों नहीं लगी, इसकी जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
पीड़ितों के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह भी पता लगाना जरूरी होगा कि बुलडोजर किसके थे, उन्हें किसने बुलाया था और मकान-दुकानों को गिराने के निर्देश किसने दिए थे। इसके साथ ही मौके पर मौजूद नकाबपोश लोगों की पहचान करना भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
हथियार दिखाकर धमकाने के आरोप की भी जांच
प्रभावित लोगों ने आरोप लगाया है कि विरोध करने पर उन्हें हथियार दिखाकर धमकाया गया। यदि जांच में इसकी पुष्टि होती है तो मामला केवल संपत्ति को नुकसान पहुंचाने तक सीमित नहीं रहेगा। पुलिस को यह भी पता लगाना होगा कि मौके पर हथियार लेकर कौन लोग पहुंचे थे और उनके पास मौजूद हथियार वैध थे या अवैध।
घटनास्थल और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज, मोबाइल वीडियो और अन्य डिजिटल साक्ष्य जांच में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। भारी वाहनों के आने-जाने के मार्ग की जांच से भी आरोपियों तक पहुंचने में मदद मिल सकती है।
पुलिस-प्रशासन के पहुंचने में देरी पर सवाल
घटना ने स्थानीय पुलिस की प्रतिक्रिया के समय पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। पीड़ितों का कहना है कि मकान-दुकान गिराए जाने तक पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मौके पर नहीं पहुंच सके। अब जांच में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि पहली सूचना कब दी गई, किस अधिकारी को मिली और उसके बाद पुलिस टीम कितनी देर में घटनास्थल के लिए रवाना हुई।
इसी के साथ यह भी देखा जाएगा कि क्या किसी स्तर पर लापरवाही हुई या किसी अधिकारी-कर्मचारी को पहले से इस कार्रवाई की जानकारी थी।
प्रशासनिक निगरानी पर उठे सवाल
आधी रात बड़ी संख्या में लोगों और तीन बुलडोजरों के साथ हुई इस कथित कार्रवाई ने प्रशासनिक निगरानी की व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं। कोतवाल समेत पांच पुलिसकर्मियों और लेखपाल के निलंबन के बाद अब विस्तृत जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि घटना के लिए कौन-कौन जिम्मेदार था।
फिलहाल पीड़ित परिवार नुकसान और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि इतनी बड़ी संख्या में लोग और भारी मशीनें आधी रात इलाके में कैसे पहुंचीं और पूरी कार्रवाई होने तक जिम्मेदार तंत्र को इसकी भनक क्यों नहीं लगी।