उत्तर प्रदेश : जन्म के बाद बच्चे को पहली बार मां की गोद में लेकर स्तनपान कराना मां और बच्चे दोनों के लिए बेहद खास पल माना जाता है। लेकिन प्रसव के लिए सिजेरियन यानी ऑपरेशन का सहारा लेने वाली महिलाओं के मामले में यह प्रक्रिया कई बार देर से शुरू हो रही है। बाल रोग विशेषज्ञों से जुड़े एक सर्वे में सामने आया है कि ऑपरेशन से जन्म लेने वाले करीब 90 फीसदी शिशुओं को जन्म के तुरंत बाद मां का दूध नहीं मिल पा रहा है। कई मामलों में बच्चे को पहला दूध जन्म के दो से तीन दिन बाद तक दिया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य परिस्थितियों में सिजेरियन डिलीवरी के बाद भी स्तनपान शुरू कराने में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए।
एक से सात अगस्त तक मनाए गए विश्व स्तनपान सप्ताह के दौरान 550 महिलाओं को शामिल कर किए गए सर्वे में स्तनपान से जुड़ी कई सामाजिक और व्यक्तिगत भ्रांतियां सामने आईं। सर्वे के अनुसार, बड़ी संख्या में महिलाएं और उनके परिवार स्तनपान को लेकर ऐसी धारणाओं पर भरोसा करते हैं, जिनका वैज्ञानिक आधार नहीं है। इन्हीं कारणों से बच्चे को जन्म के शुरुआती घंटों में मिलने वाला मां का दूध देर से मिल पाता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, बच्चे के जन्म के बाद शुरुआती समय में मिलने वाला पहला दूध यानी कोलोस्ट्रम बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह मात्रा में कम हो सकता है, लेकिन इसमें कई महत्वपूर्ण पोषक तत्व और प्रतिरक्षात्मक घटक मौजूद होते हैं। यही कारण है कि बच्चे को जन्म के बाद जितनी जल्दी संभव हो, स्तनपान शुरू कराने पर जोर दिया जाता है। सिजेरियन डिलीवरी के बाद भी यदि मां और बच्चा चिकित्सकीय रूप से स्थिर हैं, तो डॉक्टरों की निगरानी में जल्द स्तनपान कराया जा सकता है।
भारतीय बाल रोग अकादमी के सचिव डॉक्टर शैलेंद्र कुमार गौतम के अनुसार, समाज में स्तनपान को लेकर कई तरह की भ्रांतियां मौजूद हैं। सबसे आम धारणा यह है कि ऑपरेशन से जन्म लेने वाले बच्चे को तुरंत मां का दूध नहीं देना चाहिए। इसके अलावा कई महिलाएं खुद को सर्दी, खांसी या बुखार होने पर भी स्तनपान बंद कर देती हैं। सर्वे में करीब 70 फीसदी महिलाओं ने ऐसी स्थिति में स्तनपान रोकने की बात कही। विशेषज्ञों के अनुसार सामान्य सर्दी-खांसी जैसी परिस्थितियों में आमतौर पर स्तनपान बंद करने की आवश्यकता नहीं होती, हालांकि किसी बीमारी या दवा के इस्तेमाल की स्थिति में डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मां के दूध के जरिए बच्चे को पोषण के साथ कई प्रतिरक्षात्मक लाभ भी मिलते हैं। इसलिए बीमारी के डर से बिना चिकित्सकीय सलाह के स्तनपान रोक देना उचित नहीं माना जाता। वहीं, बच्चे के जीवन के शुरुआती छह महीनों में केवल मां का दूध देने की सलाह दी जाती है। सामान्य परिस्थितियों में छह महीने तक अलग से पानी देने की भी आवश्यकता नहीं होती।
सर्वे में स्तनपान को लेकर महिलाओं के बीच मौजूद सामाजिक और व्यक्तिगत चिंताएं भी सामने आईं। करीब 55 फीसदी महिलाओं ने माना कि उन्हें डर रहता है कि स्तनपान कराने से उनकी शारीरिक सुंदरता प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी धारणाओं के कारण मां और बच्चे के बीच स्तनपान की महत्वपूर्ण प्रक्रिया को प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए। मां के लिए संतुलित और पौष्टिक आहार लेना जरूरी है, लेकिन केवल अधिक मात्रा में दूध पीने से स्तन में दूध की मात्रा अपने आप बढ़ने की गारंटी नहीं होती।
सर्वे में करीब 40 फीसदी महिलाओं का मानना था कि यदि मां अधिक दूध पीती है तो बच्चे को भी अधिक फायदा मिलेगा। विशेषज्ञों के अनुसार मां के लिए पर्याप्त पोषण, पानी और संतुलित आहार महत्वपूर्ण हैं। साथ ही बच्चे को बार-बार और सही तरीके से स्तनपान कराना भी दूध बनने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्तनपान को लेकर परिवार के सदस्यों की भूमिका भी बेहद अहम है। खासकर सिजेरियन डिलीवरी के बाद मां को आराम, सहयोग और सही जानकारी की जरूरत होती है। दर्द, कमजोरी या टांकों पर असर पड़ने की आशंका के कारण परिवार यदि स्तनपान में देरी कराता है तो इसका असर बच्चे को मिलने वाले शुरुआती पोषण पर पड़ सकता है। ऐसे में अस्पतालों और स्वास्थ्यकर्मियों की जिम्मेदारी है कि वे प्रसव के बाद मां और परिवार को स्तनपान की सही जानकारी दें।
550 महिलाओं पर हुए इस सर्वे ने साफ किया है कि स्तनपान को लेकर केवल चिकित्सा संबंधी नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर भी जागरूकता की जरूरत है। विशेषज्ञों के मुताबिक सही जानकारी और चिकित्सकीय मार्गदर्शन के जरिए इन भ्रांतियों को दूर किया जा सकता है, ताकि मां और बच्चे को जन्म के शुरुआती समय से ही स्तनपान का लाभ मिल सके।
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