सोनभद्र। देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाली प्रमुख कोयला उत्पादक कंपनी नार्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) अब कोयला परिवहन व्यवस्था को आधुनिक और पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। कंपनी की फर्स्ट माइल कनेक्टिविटी (एफएमसी) परियोजनाओं के जरिए कोयले के सड़क परिवहन पर निर्भरता कम करने की योजना बनाई गई है। इससे न केवल प्रदूषण के स्तर में कमी आएगी, बल्कि कोयला प्रेषण की प्रक्रिया भी अधिक सुरक्षित, तेज और प्रभावी बनेगी।
एनसीएल की ओर से विकसित की जा रही फर्स्ट माइल कनेक्टिविटी परियोजनाओं के तहत खदानों के पिटहेड यानी जहां से कोयला निकाला जाता है, वहां से डिस्पैच प्वाइंट तक कोयले की पूरी प्रक्रिया को मशीनीकृत किया जा रहा है। इस व्यवस्था में आधुनिक कन्वेयर सिस्टम, क्रशिंग यूनिट और कंप्यूटरीकृत साइलो जैसी तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। इसके माध्यम से कोयले को सीधे रेल रैक तक पहुंचाने की सुविधा विकसित की जा रही है।
परंपरागत तरीके से कोयला परिवहन में बड़ी संख्या में सड़क वाहनों का इस्तेमाल होता है, जिससे धूल प्रदूषण बढ़ने के साथ-साथ सड़कों पर यातायात का दबाव भी बढ़ता है। एफएमसी परियोजनाओं के पूरी तरह लागू होने के बाद सड़क मार्ग से कोयला ढुलाई में काफी कमी आएगी। इससे सिंगरौली और आसपास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
एनसीएल वर्तमान में उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में संचालित अपनी 10 अत्याधुनिक खुली खदानों से प्रतिवर्ष 137 मिलियन टन से अधिक कोयले का उत्पादन और प्रेषण कर रही है। कंपनी लगातार अपनी उत्पादन और परिवहन क्षमता को बढ़ाने पर काम कर रही है। इसी कड़ी में फर्स्ट माइल कनेक्टिविटी परियोजनाओं को महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
कंपनी के अनुसार, वर्तमान में एफएमसी परियोजनाओं की कुल स्थापित क्षमता 116 मिलियन टन प्रतिवर्ष (एमटीपीए) है। आने वाले समय में इसमें 13.5 एमटीपीए की अतिरिक्त क्षमता जोड़ी जाएगी। इसके बाद एनसीएल की कुल एफएमसी क्षमता बढ़कर 129.5 एमटीपीए तक पहुंच जाएगी।
इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद एनसीएल अपने करीब 92 प्रतिशत कोयले का प्रेषण मशीनीकृत रेल लोडिंग प्रणाली के माध्यम से करने में सक्षम होगी। इससे कोयला परिवहन के लिए इस्तेमाल होने वाले भारी वाहनों की संख्या में कमी आएगी। इसके परिणामस्वरूप सड़कों पर दबाव कम होगा और दुर्घटनाओं की संभावना भी घटेगी।
एफएमसी प्रणाली का एक बड़ा लाभ यह भी है कि इसमें मानव हस्तक्षेप कम होता है और पूरी प्रक्रिया अधिक नियंत्रित तरीके से संचालित होती है। कन्वेयर बेल्ट और स्वचालित लोडिंग सिस्टम के कारण कोयले की आवाजाही में तेजी आती है और समय की बचत होती है। साथ ही परिवहन लागत में भी कमी आने की संभावना है।
एनसीएल का मानना है कि आधुनिक तकनीक आधारित कोयला प्रेषण व्यवस्था ऊर्जा क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव साबित होगी। कंपनी केवल उत्पादन बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षित संचालन पर भी विशेष ध्यान दे रही है।
एनसीएल देश की प्रमुख कोयला कंपनियों में शामिल है और भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रही है। कंपनी की हरित और मशीनीकृत कोयला परिवहन व्यवस्था विकसित करने की पहल आने वाले समय में कोयला उद्योग के लिए एक नया मॉडल साबित हो सकती है। फर्स्ट माइल कनेक्टिविटी परियोजनाओं के जरिए कंपनी ऊर्जा आपूर्ति के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्य को भी आगे बढ़ा रही है।