प्रयागराज/गाजियाबाद : 28 अक्टूबर 2026। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में अवैध निर्माण के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने मोहन नगर स्थित गुलमोहर ग्रीन्स आवासीय सोसाइटी में नियमों का उल्लंघन कर बनाए गए दो टावरों को पूरी तरह ध्वस्त करने का आदेश दिया है। इसके अलावा चार अन्य टावरों की दो-दो अतिरिक्त मंजिलों को भी गिराने का निर्देश दिया गया है। कोर्ट ने बिल्डर पर 25 लाख रुपये का हर्जाना लगाते हुए गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) के जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के आदेश दिए हैं।न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने 27 अक्टूबर को यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि निर्माण नियमों की अनदेखी करके फ्लैट खरीदारों के अधिकारों और सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। यह फैसला सोसाइटी के निवासियों और रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से दाखिल याचिकाओं पर सुनाया गया है।
दो महीने में गिराने होंगे अवैध टावर
हाईकोर्ट ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण को निर्देश दिया है कि गुलमोहर ग्रीन्स सोसाइटी के टावर संख्या 27 और 28 को पूरी तरह ध्वस्त किया जाए। इसके साथ ही टावर संख्या 16, 17, 18 और 19 में अवैध रूप से बनाई गई नौवीं और दसवीं मंजिल को भी हटाया जाए।अदालत ने इस कार्रवाई को पूरा करने के लिए दो महीने की समयसीमा निर्धारित की है। ध्वस्तीकरण पर आने वाला पूरा खर्च बिल्डर से वसूला जाएगा। जरूरत पड़ने पर यह राशि भू-राजस्व के बकाये की तरह वसूली जा सकेगी। जिला प्रशासन और पुलिस को कार्रवाई के दौरान प्राधिकरण को आवश्यक सहयोग और सुरक्षा प्रदान करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
बिल्डर को एक महीने में जमा करने होंगे 25 लाख रुपये
अदालत ने बिल्डर पर 25 लाख रुपये का हर्जाना लगाया है। आदेश के अनुसार, यह राशि एक महीने के भीतर गुलमोहर ग्रीन्स रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के खाते में जमा करनी होगी।हाईकोर्ट ने माना कि बिल्डर की अनियमितताओं और संबंधित अधिकारियों की लापरवाही के कारण फ्लैट खरीदारों को लंबे समय तक परेशानी झेलनी पड़ी। निवासियों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा और कानूनी लड़ाई में खर्च भी उठाना पड़ा।इसके अलावा अदालत ने जीडीए को संबंधित याचिका के प्रत्येक याचिकाकर्ता को दो महीने के भीतर 50 हजार रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है।
वर्ष 2006 में पास हुआ था परियोजना का नक्शा
इस विवाद की शुरुआत वर्ष 2006 से जुड़ी है। गुलमोहर ग्रीन्स आवासीय परियोजना के लिए 29 मई 2006 को गाजियाबाद विकास प्राधिकरण ने मूल नक्शा स्वीकृत किया था। इसमें 34 टावर और 904 फ्लैट बनाने की योजना थी।निर्माण शुरू होने के बाद हिंडन एयरफोर्स स्टेशन की ओर से जमीन के स्वामित्व को लेकर आपत्ति जताई गई। जांच में सामने आया कि परियोजना के लिए दर्शाई गई जमीन के एक हिस्से का अधिग्रहण केंद्र सरकार ने वर्ष 1962 में भारतीय वायुसेना के लिए किया था।इस विवाद के बाद 3 जुलाई 2010 को मूल नक्शा निरस्त कर दिया गया। हालांकि, इसके बाद भी निर्माण से संबंधित गतिविधियां और संशोधित नक्शों को मंजूरी देने की प्रक्रिया जारी रही।
तीसरी बार दी गई मंजूरी को कोर्ट ने किया निरस्त
मामले में वर्ष 2011 और 2015 में निर्माण के कुछ हिस्सों को शमन प्रक्रिया के तहत मंजूरी दी गई थी। इसके बाद 18 दिसंबर 2024 को तीसरी बार शमन आदेश जारी किया गया।हाईकोर्ट ने पाया कि तीसरे शमन आदेश के जरिए अतिरिक्त मंजिलों और टावरों को नियमित करने का प्रयास किया गया था। अदालत ने इस आदेश को अवैध मानते हुए निरस्त कर दिया।अदालत के अनुसार, परियोजना के फ्लोर एरिया रेशियो यानी एफएआर की गणना में भारतीय वायुसेना की 4,560 वर्गमीटर जमीन भी शामिल कर ली गई थी। इस जमीन को हटाने के बाद अतिरिक्त निर्माण को मंजूरी देने का आधार नहीं बचता था।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शमन प्रक्रिया का इस्तेमाल बार-बार नियमों के उल्लंघन को वैध बनाने के लिए नहीं किया जा सकता।
सोसाइटी के साझा हिस्से 85 लोगों को बेचने का मामला
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि बिल्डर ने सोसाइटी के साझा उपयोग वाले क्षेत्रों को 85 लोगों को बेच दिया था। अदालत ने इस मामले को गंभीर मानते हुए तीन सदस्यीय समिति गठित करने का निर्देश दिया हैसमिति इन क्षेत्रों की पहचान करेगी और वहां हुए अवैध निर्माण की जांच करेगी। यदि साझा क्षेत्रों पर अवैध निर्माण मिलता है तो उसे हटाकर संबंधित स्थान रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन को सौंपा जाएगा।अदालत ने बिल्डर को खरीदारों से ली गई रकम लौटाने और निर्धारित निर्माण लागत के साथ 10 प्रतिशत ब्याज देने का भी निर्देश दिया है। इस प्रक्रिया को छह महीने में पूरा करने के आदेश दिए गए हैं।
बिल्डर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश
हाईकोर्ट ने साझा क्षेत्रों की बिक्री और अन्य कथित अनियमितताओं को लेकर बिल्डर के खिलाफ दो सप्ताह के भीतर एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है।अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि मामले की जांच अतिरिक्त पुलिस आयुक्त से नीचे के स्तर के अधिकारी को नहीं सौंपी जाएगी। इससे पूरे मामले की विस्तृत और जिम्मेदार स्तर पर जांच सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है।
जीडीए अधिकारियों पर भी गिरेगी कार्रवाई की गाज
अदालत ने गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के अधिकारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। संबंधित उपाध्यक्ष के खिलाफ एक महीने के भीतर विभागीय जांच शुरू करने का निर्देश दिया गया है।इसके अलावा मामले में लापरवाही बरतने वाले जांच अधिकारी सुरेंद्र सिंह को निलंबित कर उनके खिलाफ विभागीय जांच कराने का आदेश दिया गया है।कोर्ट ने पूर्णता प्रमाणपत्र और अग्नि सुरक्षा संबंधी आवश्यक मंजूरी के बिना फ्लैटों का कब्जा दिए जाने पर भी चिंता जताई। अदालत के मुताबिक, ऐसे मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करना जरूरी है।
फ्लैट खरीदारों के अधिकारों के लिए महत्वपूर्ण फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला अवैध निर्माण और आवासीय परियोजनाओं में नियमों के उल्लंघन के मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे स्पष्ट हुआ है कि बिल्डर स्वीकृत नक्शे से हटकर मनमाने तरीके से अतिरिक्त निर्माण नहीं कर सकते।गाजियाबाद की गुलमोहर ग्रीन्स सोसाइटी में अब सबसे बड़ी चुनौती अदालत के आदेश के अनुसार सुरक्षित तरीके से ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पूरी करना और प्रभावित खरीदारों के हितों की रक्षा करना होगी।इस फैसले के बाद गाजियाबाद विकास प्राधिकरण को निर्धारित समयसीमा में कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही बिल्डर के खिलाफ आपराधिक और विभागीय स्तर पर निर्देशित प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाया जाएगा।
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